Home देश नरेंद्र मोदी की नई सोशल इंजीनियरिंग में ब्राहमण बाहर कर दिए गए हैं..

नरेंद्र मोदी की नई सोशल इंजीनियरिंग में ब्राहमण बाहर कर दिए गए हैं..

-शेष नारायण सिंह||
लोकसभा चुनाव २०१४ अभियान ज़ोरों पर है. इस चुनाव में सूचना क्रान्ति के दमदार असर को साफ़ देखा जा सकता है. लोकसभा चुनाव २००९ में भी इंटरनेट का इस्तेमाल हुआ था लेकिन हर हाथ में इंटरनेट नहीं था. उन दिनों यह बहस चल रही थी कि कम्प्यूटर ,टेलिविज़न सेट और सेल फ़ोन को एक ही इंस्ट्रूमेंट में रहना है ,देखें कौन जीतता है. अब यह बहस तय हो चुकी है , सेल फोन ने बाज़ी मार ली है.अब कंप्यूटर और टेलिविज़न का काम भी सेल फोन के ज़रिये हो रहा है. ज़ाहिर है एक बहुत बड़े वर्ग के पास हर तरह की सूचना पंहुंच रही है.और उसके हिसाब से फैसले हो रहे हैं. सूचना क्रान्ति का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों में बीजेपी का नंबर सबसे आगे है. प्रधानमंत्री पद के उसके दावेदार नरेंद्र मोदी की निजी वालंटियरों की सेना भी इंटरनेट का बड़े पैमाने पर प्रयोग कर रही है. हालांकि उनसे भी बेहतर प्रयोग आम आदमी पार्टी ने किया और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में नरेंद्र मोदी के निजी प्रयास के बावजूद उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर रखा.modi-still-in-pm-race

इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यही मानी जायेगी कि इस बार अधिकतम लोगों तक अधिकतम सूचना पंहुच रही है. यह भी सच है की बहुत सारी गलत सूचनाएं भी सच में बदल रही हैं. सबसे महत्वपूर्ण तो गुजरात राज्य का तथाकथित विकास है जिसको एक माडल के रूप में पेश कर दिया गया है और उसका पेटेंट नरेंद्र मोदी के नाम पर फिक्स करने की कोशिश की गयी है. सच्चाई यह है कि पहले से ही विकसित गुजरात राज्य नरेंद्र मोदी के राज में विकास के बहुत सारे पैमानों पर चला गया है लेकिन नरेंद्र मोदी की प्रचार शैली की वजह से देश में लोग उसी तरह का विकास मांगने लगे हैं. कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी के विकास के दावों की पोल खोलने की कोशिश भी की लेकिन सूचना तंत्र की कुशलता के अभाव में कोई फर्क नहीं पडा था. हाँ आम आदमी पार्टी वाले अरविन्द केजरीवाल ने यह काम बहुत ही तरीके से कर दिखाया और अब बीजेपी वाले दिल्ली जैसे उन इलाकों में गुजरात माडल के विकास की बात नहीं करते जहां आम आदमी पार्टी का भारी प्रभाव है.इसमें दो राय नहीं है कि इस बार का चुनाव सूचना तंत्र की प्रमुखता के लिए अवश्या याद किया जाएगा.

इस चुनाव की दूसरी जो सबसे अहम बात है वह यह कि भारतीय जनता पार्टी ने एक नई तरह की सोशल इंजीनियरिंग को अपनी पार्टी स्थाई भाव बनाया है. बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने जब बिहार की एक सार्वजनिक सभा में कहा कि आने वाला समय पिछड़ी और दलित जातियों की राजनीतिक प्रभुता देखेगें तो शुरू में लगा था कि बिहार में पिछड़ी जातियों के राजनीतिक महत्त्व को भांपकर नरेंद्र मोदी ने स्थानीय राजनीति के चक्कर में यह बात का दी लेकिन बाद की नरेंद्र मोदी की राजनीति को बारीकी से देखें पर बात समझ में आने लगती है. बीजेपी ने नए नेतृत्व ने शुद्ध रूप से जातियों की नयी प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं. ब्राह्मणों के प्रभुत्व वाली पार्टी ने अब उनको दरकिनार करने की योजाना पर काम शुरू कर दिया है. ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मण जाति के लोग कांग्रेस के सहयोगी हुआ करते थे. १९७७ के पहले तक पूरे देश में कांग्रेस का स्थाई समर्थन तंत्र ब्राह्मण, मुसलमान और दलित हुआ करते थे. जब १९७७ में यह समीकरण टूटा तो कांग्रेस की सरकार चली गयी ,जनता पार्टी का राज आया. जनता पार्टी का राजनीतिक प्रयोग सत्ता में बने रहने के लिहाज़ से बहुत ही बेकार साबित हुआ लेकिन जनता पार्टी के प्रादुर्भाव से यह साबित हो गया की अगर जातीय समीकरणों को बदल दिया जाए तो सत्ता हासिल करने के लिए कांग्रेस के प्रभुत्व को नकारा जा सकता है. १९७७ में कांग्रेस से अलग होने वाला प्रमुख वर्ग मुसलिम ही था लेकिन १९७८ में ही बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक , कांशीराम ने दलितों को कांग्रेस से अलग पहचान तलाशने की प्रेरणा देना शुरू कर दिया था. १९८९ आते आते यह काम भी पूरा हो गया और दलितों ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से अलग और कई बार तो कांग्रेस के खिलाफ बहुजन समाज पार्टी में अपनी पहचान तलाश ली थी. कांग्रेस के तब तक लगभग स्थाई मतदाता के रूप में पहचाने जाने वाले ब्राह्मण समुदाय ने उसके बाद से नई ज़मीन तलाशनी शुरू कर दी और जब लाल कृष्ण आडवानी का रथ में सोमनाथ से अयोध्या तक दौड़ा तो ब्राह्मणों को एक नया पता मिल गया था. उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर वर्ण व्यवस्था के शिखर पर मौजूद सबसे उच्च सामाजिक वर्ग बीजेपी का कोर वोटर बन चुका था. वह व्यवस्था अब तक चालू है. २००७ के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के दौरान मायावती ने ब्राह्मणों को साथ लेने की रणनीति अपनाई और दलित ब्राहमण एकता के बल पर सत्ता पर काबिज़ होने में सफलता पाई. उसके बाद बीजेपी और कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बहुत पिछड़ गए. तीसरे और चौथे स्थान की पार्टियों के रूप में संतुष्ट रहने को मजबूर हो गए. लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही ब्राहमण प्रभुत्व वाली पार्टियां बनी रहीं. कांग्रेस में आज भी ब्राहमणों का ऐसा दबदबा है कि किसी अन्य जाति के लोगों का अस्तित्व ब्राहमणों की कृपा से ही चलता है. नेहरू जी के समय में तो सभी बड़े नेता ब्राहमण ही हुआ करते थे. बाद में डी पी मिश्र , उमाशंकर दीक्षित और कमलापति त्रिपाठी का ज़माना आया. आजकल भी कांग्रेस के वोट बैंक के रूप में किसी भी राज्य में ब्राह्मण नहीं है लेकिन कांग्रेस में सबसे बड़े नेता ब्राहमण ही हैं और अन्य जातियों के नेताओं को ऊपर नहीं आने देते.

बीजेपी में भी वही हाल है. अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी की पार्टी के रूप में पहचान बना चुकी बीजेपी में ब्राहमण प्रभुत्व चौतरफा देखा जासकता है लेकिन अब यह बदल रहा है.नरेंद्र मोदी ने इस को बदल देने का काम शुरू कर दिया है.अटल बिहारी वाजपेयी की भांजी करूणा शुक्ला को जब पार्टी से अलग करने की योजना बन रही थी तो रायपुर में मौजूद इर रिपोर्टर को साफ़ नज़र आ रहा था कि कहीं कुछ बड़े बदलाव की तैयारी हो रही थी. अब एक बात और नज़र आ रही है कि उन लोगों को भी हाशिये पर ला दिया जाएगा जो अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के क़रीबी माने जाते हैं. नरेंद्र मोदी की नई सोशल इंजीनियरिंग में ब्राहमणों के खिलाफ अभियान सा चल रहा है. मुरली मनोहर जोशी ,सुषमा स्वराज, केशरीनाथ त्रिपाठी ,कलराज मिश्र सभी हाशिये पर हैं. नरेंद्र मोदी के नए राजनीतिक समीकरणों की प्रयोगशाला में गुजरात में यह प्रयोग जांचा परखा जा चुका है .वहां यह काम बहुत समय से चल रहा है. अब यह काम पूरे देश में किया जा रहा है २०१० में जब नितिन गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष बने थे तो उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत महत्व दिया था. सुषमा स्वराज , अरुण जेटली और अनन्त कुमार सबसे महत्वपूर्ण लोगों में थे. आज इन तीनों को हाशिये पर ला दिया गया है. अरुण जेटली को निश्चित हार का सामना करने के लिए अमृतसर भेज दिया गया है जबकि उनको राज्य सभा में आसानी से बनाए रखा जा सकता था. हो सकता है अब भी वे राज्य सभा में बने रहें लेकिन उनके ऊपर अमृतसर का बोझ लाद देने की योजना पर काम चल रहा है. सुषमा स्वराज ने खुद स्वीकार किया है कि उनकी कुछ नहीं चल रही है. उनकी मर्जी के खिलाफ ,उनके ऐलानियाँ विरोध के बाद ऐसे लोगों को टिकट दिया जा रहा है जिनसे पार्टी को नुक्सान हो सकता है लेकिन नरेंद्र मोदी की नई जातीय राजनीति में उन लोगों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सुषमा स्वराज विरोध करती हैं. ब्राहमणों को हाशिये पर लाने की नई रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में मुरली मनोहर जोशी के अलावा केशरी नाथ त्रिपाठी और कलराज मिश्र को भी औकात बताने की कोशिश की गयी है. गुजरात में हरेन पाठक का टिकट काटना भी एक बड़े बदलाव का संकेत है.

ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी को मालूम है कि ब्राहमणों को दरकिनार करके ही अन्य सामाजिक वर्गों को साथ लिया जा सकता है. शायद इसीलिए गुजरात कैडर के जिन सिविल सर्विस अफसरों को परेशान किया गया उनमें अधिकतर ब्राहमण ही हैं. संजीव भट्ट, राहुल शर्मा, प्रदीप शर्मा ,कुलदीप शर्मा आदि इसी श्रेणी में आते हैं. बीजेपी के बड़े नेता और आर एस एस के करीबी माने जाने वाले संजय जोशी के साथ जो हुआ उसको दुनिया जानती है. मुंबई में हुए किसी बीजेपी सम्मलेन के ठीक पहले उनकी आपत्तिजनक सी डी बंटवा दी गयी थी. बाद में भी उनके खिलाफ अभियान चलता रहा. ऐसा लगता है कि नए लोगों को जोड़ने के लिए बीजेपी की कोशिश है कि वह अपने को ब्राहमणद्रोही के रूप में स्थापित कर सके.

साफ़ नज़र आ रहा है कि बड़े पैमाने पर सामाजिक वर्गों की राजनीति को एक नयी दिशा देने की कोशिश हो रही है. अभी अन्य जातियों के लोगों के बीजेपी की तरफ आने की पक्की खबर तो नहीं है लेकिन इतना तय है कि लोकसभा २०१४ में ब्राह्मण नेताओं का एक वर्ग बीजेपी के नए नेताओं से नाराज़ है..यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव में यह किस तरह से असर डालता है. जानकार बताते हैं कि जिन नये वर्गों को , खासकर पिछड़े वर्गों और राजपूतों को अपने करीब खींचने में नरेंद्र मोदी अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहे हैं ,वे पहले से ही किसी अन्य राजनीतिक पार्टी के साथ हैं. अभी यह किसी को पता नहीं है कि वे इस काम में कितना सफल होंगें लेकिन यह तय है अब ब्राह्मण नरेंद्र मोदी की बीजेपी से दूर जाने की तैयारी में हैं.यह भी लग रहा है कि इन चुनावों में उसक असर भी स्पष्ट दिखेगा.

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