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ग्रीनपीस ने एस्सार के आरोपों की कटु आलोचना करते हुए वन समुदायों के अधिकारों पर जोर दिया..

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सिंगरौली, ग्रीनपीस इंडिया ने एस्सार द्वारा महान के ग्रामीणों को उकसाने के आरोपों का कटु आलोचना किया है. कंपनी ने प्रस्तावित कोयला खदान के विरोध में उठ रहे आवाज को एक बार फिर डराने का प्रयास किया है. एस्सार द्वारा जिला एवं सत्र न्यायालय वैढ़न में ग्रीनपीस और महान क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों पर मुकदमा दायर किया गया है. ग्रीनपीस अपने उपर लगाये गए आधारहीन आरोपों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया में हिस्सा लेगा.essar quit mahan

ग्रीनपीस की सीनियर अभियानकर्ता प्रिया पिल्लई ने कहा कि, “एस्सार एक बार फिर अपने विरोध में उठ रहे आवाज को दबाने की कोशिश कर रहा है लेकिन उनके आरोपों में कोई दम नहीं है. एस्सार को अदालत में मुकदमा दायर करने से पहले सही तथ्यों की जांच करनी चाहिए”.

एस्सार दूसरे चरण के पर्यावरण मंजूरी के लिए दिए गए 36 शर्तों को पूरा करने का दावा करता है लेकिन तथ्य बताते हैं कि जिस ग्राम सभा के प्रस्ताव के अधार पर मंजूरी दी गयी उसे फर्जी तरीके से पारित किया गया था.

प्रिया कहती है कि, “इस बात के सबूत हैं कि पारित प्रस्ताव में जिन लोगों के हस्ताक्षर हैं उनमें कुछ लोग सालों पहले मर चुके हैं. लोगों के लिखित गवाही भी हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि उनके नाम फर्जी तरीके से प्रस्ताव में डाले गए हैं. दूसरे चरण की मंजूरी असंवैधानिक है और इसे अदालत में चुनौति दी जाएगी”.
जिला कलेक्टर और जनजातीय मामलों के मंत्रालय का ध्यान दिलाने के बाद फर्जी ग्राम सभा प्रस्ताव के बारे में फरवरी में पुलिस में शिकायत दर्ज करायी जा चुकी है.

अमिलिया के निवासी जगनारायण शाह ने कहा कि, “हमने सिंगरौली में बड़े-बड़े कंपनियों से विस्थापित लोगों को गंभीर हालत में रहते देखा है. यह हमारे लिए असंभव है कि हम अपना जंगल और जमीन छोड़कर दस बाय दस के घर में विस्थापित जिन्दगी बितायें. अगर कंपनी खनन योजना में सफल होता है तो हम आजीविका से वंचित हो जायेंगे. हमें प्रकृति के साथ सद्भाव से रहने की वजह से सताया जा रहा है”.

इस साल के शुरुआत में एस्सार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में ग्रीनपीस पर 500 करोड़ के मानहानि तथा बोलने की आजादी पर प्रतिबंध लगाने का मुकदमा दायर किया था. इस मुकदमे में यह भी मांग की गयी थी कि ग्रीनपीस मुंबई स्थित एस्सार के मुख्यालय के 100 मीटर के भीतर कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं कर सके. ग्रीनपीस ने इसकी प्रतिक्रिया कोर्ट में पहले ही दायर कर दिया है. कंपनी ने यह मुकदमा ग्रीनपीस के 14 कार्यकर्ताओं द्वारा मुंबई में महालक्ष्मी स्थित मुख्यालय पर बैनर लहरा कर प्रदर्शन करने के बाद किया था.

ग्रीनपीस एक अलाभकारी गैर सरकारी संगठन है जो पर्यावरण और वनवासियों के अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक काम करता है. प्रिया बताती हैं कि, “ग्रीनपीस शांतिपूर्वक तरीके से काम करता है और आगे भी हम ऐसा करते रहेंगे जबतक कि महान के लोगों के साथ न्याय नहीं हो जाता. हम इन हास्यास्पद रणनीतियों से विचलित नहीं होंगे”.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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