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साबित हो गया बीजेपी की कथनी और करनी में अंतर..

By   /  March 29, 2014  /  2 Comments

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-अनुराग मिश्र||

कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगें तपाक से..
ये नये मिजाज का शहर जरा फासले से मिला करो..

मशहूर शायर बशीर बद्र की ये लाइनें मौजूदा दौर में बीजेपी पर बिलकुल सटीक बैठती है. लोकसभा चुनावों की गूंज और सत्ता के लालच में बीजेपी ने इन दिनों उनको गले लगा लिया है जिनसे न तो कभी बीजेपी का दिल मिला है और न ही उनका जिनको बीजेपी ने गले लगाया. लेकिन कहते है न कि सत्ता का लालच बडे से बडे विचारवान व्यक्ति या दल की विचारधारा को एक सिरे से खारिज़ कर देता है.narendra modi

कुछ ऐसी ही तस्वीर बीजेपी में बन रही है. पार्टी विद डिफरेंस का नारा देने वाली बीजेपी और उसके कार्यकर्ता हमेशा से ये दावा करते आये है कि बीजेपी पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक पार्टी है और इस पार्टी में कभी भी व्यक्ति विशेष की आराधना नही की गयी है. स्वंय बीजेपी अध्यक्ष व लखनऊ संसदीय सीट से पार्टी प्रत्याशी राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों लखनऊ में आयोजित एक सवांददाता सम्मेलन में कहा था कि लोकसभा चुनाव से सम्बधित हर निर्णय सेन्ट्रल इलेक्शन कमेटी, स्टेट इलेक्शन कमेटी की सिफारिशों पर करती है. उनके इस दावे की पोल तभी खुल गयी जब अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में राजनाथ ने लखनऊ के मौजूदा सासंद व पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल जी टंडन की हुकारी भराने की कोशिश की और टंडन ने बडी मुश्किल से हाँ में अपने सर का हिलाया.

कहने का तातपर्य यह कि बीजेपी में ये कैसा लोकतंत्र है जहाँ वरिष्ठों का दरकिनार कर तानाशाह की भांति उन लोगों कों जगह दी जा रही है जिनका न तो पार्टी से और न ही उसकी विचारधारा सें कोई लेना देना है. ऐसे मौकापरस्त लोग हमेशा ही ऐसे चुनावी माहौल की प्रतीक्षा करते आयें है जब वो अपने हिसाब से सौदेबाजी करके किसी भी दल में अपनी जगह बना ले. यहाँ जो सबसे गौर करने योग्य बात है वो यह कि बीजेपी और उसके नेता अच्छी तरीकें से ये जानते है कि मौजूदा समय में पार्टी में आने वाले ज्यादातर नेता मौकापरस्त राजनीति के माहिर खिलाडी है औंर ये सब इसलिए बीजेपी में आ रहे हैं क्योंकि हो सकता हो आने वाले समय बीजेपी के माध्यम से ही इन्हें सत्ता की मलाई चाटने का आसीम मौका हाथ लग जायें.

लेकिन इस तथ्य से अवगत होने के बाद भी बीजेपी निष्ठावान कार्यकर्ताओं और नेताओं की बलिवेदी पर इन मौकापरस्त नेताओं को पार्टी में शामिल कर रही है, जो बीजेपी के कथनी और करनी में अन्तर होने का सबसें बडा उदाहरण है.

बीजेपी और उसकें नेता कहतें है कि हमें सत्ता नही चाहिए बल्कि इस देश की जनता से देश की सेवा करने का एक मौका चाहिए. ये कैसी सेवा है भाई, जहाँ जिम्मेदारी मिलने से पहले ही आपने देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, और अपराधियों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया है जो आपके सत्ता में आने के बाद, सेवा के रूप में इस हिन्दुस्तान में फिरकापरस्त ताकतो को मजबूती प्रदान करने का काम करेगा.

अभी वक्त है सभल जाईयें और ऐसे लोगों को पार्टी से तुरंत बाहर निकालिये जिनके दामन पर जरा सा भी कोई दाग हो. आप स्वंय को इस देश का सबसे निष्ठावान देशभक्त कहतें है. इसलिए आपकी ये प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है कि आप ऐसे लोगों को सर उठाने से रोकें जिनका उद्देश्य सिंर्फ फिरकापरस्ती को मजबूत करना है.

एक बात और अगर 2014 के चुनाव के बाद कांग्रेस या कोई भी अन्य दल इस देश की सत्ता पर बैठता है तो ये उस दल की जीत न होकर आपकी नैतिक हार होगी.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    सब एक जैसे ही है भाई .नैतिकता की बात न करो तो ही अच्छा है. आज नैतिकता बची ही कहाँ है ?अब तक कौनसी सरकार को आप नैतिकता की कसौटी पर खरा मानते हैं?ये तो देश की जनता को इनका बोझ ढोना ही पड़ेगा.कल की बनी आप को ही देख लीजिये वहभी इनसे कहीं कमतर नहीं.

  2. सब एक जैसे ही है भाई .नैतिकता की बात न करो तो ही अच्छा है. आज नैतिकता बची ही कहाँ है ?अब तक कौनसी सरकार को आप नैतिकता की कसौटी पर खरा मानते हैं?ये तो देश की जनता को इनका बोझ ढोना ही पड़ेगा.कल की बनी आप को ही देख लीजिये वहभी इनसे कहीं कमतर नहीं.

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