नरेन्द्र मोदी का दलित चिन्तन..

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-भंवर मेघवंशी||
भारतीय जनता पार्टी की ओर से भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर दलितों का नेतृत्व बेहद आकर्षित नजर आ रहा है, ऐसा उनकी भीड़ खीचने की क्षमता की वजह से हो रहा है अथवा उनके दलित हितैषी होने की वजह से? यह अभी विचारणीय प्रश्न बना हुआ है, पर इतना तो तय है कि उनकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विगत कुछ वर्षों में अन्दर ही अन्दर काफी काम किया है, जिसका लक्ष्य था कि दलित कैसे आर.एस.एस. के साथ आयें? संघी दलितों की तो वैसे भी कमी नहीं थी, जिन बेचारों ने अपनी आंखें शाखाओं मे ही खोली, वे तो ताउम्र खाकी निकर उतार ही नहीं पायेंगे. उनके लिये तो अम्बेडकर भी सदैव ही पराये रहेंगे, वे हेडगेवार, गुरूजी गोलवलकर, बाला साहब देवरस, रज्जू भैया, कु.सी. सुदर्शन के रास्ते मोहन भागवत के चरणों में ही रह कर जीवन यापन करते रहेंगे, ऐसे सभ्य, सुसंस्कृत राष्ट्रभक्त , सकारात्मक संघी दलितो की तो हम बात ही नहीं कर रहे है. ऐसे आज्ञाकारी, स्वामीभक्त और गुलामी को गले का हार मान बैठे दलित लोग तो देश में बड़ी संख्या में मौजूद है तथा यदा कदा सामाजिक समरसता से सरोबार होकर वे अम्बेडकर चेतना को पलट देने का प्रयास भी करते है लेकिन ज्यादा सफल नहीं हो पाते है, मगर हम बात दलितों के उन कथित रहबरों की कर रहे है, जिन्हें अचानक नरेन्द्र मोदी में एक ’मुक्तिदाता’ और दलित पिछड़ों का ’महानायक’ नजर आने लगा है.narendar-modi

संघ की योजना के तह्त एक राष्ट्रवादी अम्बेडकरवादी महासभा भी बनाई गई है जो डॉ.अम्बेडकर, बाबू जगजीवन राम, के आर नारायण तथा काषीराम के फोटो लगाकर हिन्दुत्ववाद की चासनी में अम्बेडकरवाद को परोसने में लगी हुई है, ऐसी महासभाएं यही करती है, वे अम्बेडकर को हेडगेवार से मिलाने लगती है, यह दलित चेतना को समाप्त करने का एक दूरगामी ब्राह्मणवादी षडयंत्र है, जिसके प्रचारक खुद ही दलित बने बैठे है. ये वो लकड़िया है जो कुल्हाडी के साथ मिलकर अपने ही हमजात पेड़ो का नाष करने पर लग जाती है. खैर, तो ज्यादातर दलित नेता नरेन्द्र मोदी से बेहद प्रभावित नजर आ रहे है, विषेषतः 60 की उम्र के आस पास वाले दलित नेता, जो थक हार गये है तथा अब लगभग हताष व निराष है अथवा वे युवा दलित जो 25 वर्ष से नीचे की उम्र के है जिन्हें मोदी में अपना मुक्ति दाता नजर आ रहा है. ऐसा माहौल है कि जैसे मोदी हर मर्ज की दवा है, दलितों के साथ सदियों से हो रहा अन्याय अत्याचार और भेदभाव जैसी समस्याऐं मोदी राज में एक ही झटके में खत्म हो जायेगी, सब कुछ इतना अच्छा होगा कि फिर दलित तो दलित भी नहीं रहेंगे, वे भी विष्व गुरू के पद पर आसीन हो जायेंगे.

लेकिन यह जरूरी नहीं समझा जा रहा है कि इस पर विचार किया जाये कि आखिर नरेन्द्र मोदी का दलित चिन्तन क्या है? उनके दलित सरोकार क्या है? वे क्या सोचते है इस वर्ग के प्रति? षेष राजनीतिक दलों व नेताओं के दलितों के प्रति विचारों तथा उनके विचारों में क्या भिन्नता है? मोदी जी के दलितों के मध्य दिये गये प्रवचनों और किये गये कार्यो पर किषोर मकवाना द्वारा संपादित ’ सामाजिक समरसता’ नामक पुस्तक इन दिनों हर जगह उपलब्ध है, जिसमें नरेन्द्र मोदी को दलित हितैषी साबित करने की भरपूर कोषिषेें हुई है, इससे पूर्व उनकी एक पुस्तक ’कर्मयोग’ आई थी, जिसमे ’ पाखाना’ साफ करने के काम को ’ आध्यात्मिक कार्य’ मोदी जी बता ही चुके है. नवम्बर 2007 में वाल्मिकी समाज के बारे में बोलते हुये मोदी ने कहा है कि – ’’मैं नहीं मानता कि वे (वाल्मिकी) इस काम (सफाई) को महज जीवन यापन के लिये कर रहे है अगर ऐसा होता तो उन्होने पी

सुरेन्द्र नगर जिले के थानगढ़ में न्याय की मांग के लिये षांति पूर्ण प्रदर्षन करते दलितों पर की गई गुजरात पुलिस की बर्बर गोलीबारी में 3 दलित युवाओं की मौत की खबर को मीडिया ने तवज्जों ही नहीं दी, अहमदाबाद से मात्र 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धांडुका तहसील के गलसाना गांव के 500 दलितों ने लम्बा सामाजिक बहिष्कार सहा है तथा उन्हें मंदिर प्रवेष से भी प्रतिबंधित रखा गया. सांबरकाठा के दिषा गॉव के दलितों ने 54 माह तक न्याय के लिये धरना दिया है.

प्रसिद्व चिन्तक सुभाष गाताडे़ का तो यहॉ तक कहना है कि गुजरात के हजारों दलित छात्र छात्राओं को छात्रवृति तक नहीं मिल पाती है, उनकी छात्रवृति के लिये आंवटित बजट का एक अच्छा खासा हिस्सा अन्य कामों में लगा दिया जाता है. यह जानकारी ’नवसर्जन ट्रस्ट, द्वारा सूचना के अधिकार कानून के तह्त मिली सूचनाओं से प्राप्त हुई है, अकेले अहमदाबाद जिले में 3123 दलित छात्रों को छात्रवृति नहीं मिली है, 1613 छात्रों के आवेदन अब तक लम्बित है तथा कोष में कमी के नाम पर 1512 छात्रों को छात्रवृति देने से इंकार ही कर दिया गया है, जबकि तकरीबन 3 करोड़ रूपया जो छात्रवृति हेतु आवंटित था, वह अन्य कामों में लगा दिया गया है. नवसर्जन द्वारा 1600 गॉवों में छुआछूत के अध्ययन के लिये की गई ’ अण्डरस्टेंडिंग अनटचैबिलीटी’ रिपोर्ट पर नजर डाले तो पता चलता है कि गुजरात के गॉवों में से 98 प्रषित गॉवों में आज भी अस्पृष्यता देखने को मिलती है.( षुक्रवार, 21-27 मार्च 2014, पृष्ठ – 26)
गुजरात में दलितों से भेदभाव का आलम यह है कि उन्हे मरने बाद भी अलग जलाया जाता है, प्रदेष में दलितो को जीते जी तो छुआछूत का सामना करना ही पडता है. मरने के बाद भी सरकार उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार करती है ,गुजरात में सरकारी पैसे से काफी जगहों पर गॉवों मे दलितों के लिये अलग ष्मषान बनाये गये है. (हितेष चावड़ा, दलित दस्तक,मार्च 2014 पृष्ठ -11) इतना ही नहीं बल्कि गुजरात अनाथालयों में आने वाले बच्चों के नामकरण की भीे अजीब सरकारी व्यवस्था चल रही है अगर बच्चा दिखने में ’आकर्षक’ होता है तथा पूछे गये सवाल का सही जवाब देता है तो उसका नामकरण ’सवर्ण’ सूचक उपनाम से होता है जबकि बच्चा जवाब नहीं दे पाता तो है तो ’दलित पहचान’ वाले उपनाम के साथ नामकरण होता है. (लक्ष्मी पटेल, भास्कर -अहमदाबाद , 21 मार्च 2014 ) गुजरात में नहर का पानी नहीं मिलने से परेषान दलितों ने अपनी आवाजंे बुलन्द की है. नरेन्द्र मोदी की सामाजिक समरसता के तमाम दावों को ध्वस्त करते हुये विगत वर्षों मे तकरीन 5 हजार गुजराती दलितों ने सामूहिक धर्मान्तरण करके गुजरात में उनके साथ हो रहे भेदभाव को कड़ी चुनौती दी है. नरेन्द्र मोदी सरकार दावा करती है कि उनके राज्य में सिर पर मैला
दरअसल संघ हो अथवा नरेन्द्र मोदी उनका दलित चिन्तन जाति को ’वैशिष्ट्य’ मानने से प्रारम्भ होता है और उसी पर समाप्त हो जाता है, संघ ने जाति का कभी विरोध नहीं किया मगर जातिगत आरक्षण का सदा ही विरोध किया है, उसे तो अनुसूचित जातियों को दलित कहे जाने से भी आपत्ति है वह उन्हें ’दलित’ नहीं ’वंचित’ कहना पसंद करते है, क्योकि दलित प्रतिरोध और चेतना का शब्द है जो कि इस दलन के लिये गैर दलितों को जिम्मेदार ठहरा कर व्यवस्था को बदलने की मांग करता है, जबकि ’वंचित’ सिर्फ ’वंचना’ के पष्चात ’याचना’ करने के लिये प्रेरित करता हुआ षब्द है, आज भले ही दलितो के सŸाापिपासु नेता नरेन्द्र मोदी के चरणों में लौट रहे हो मगर यह तय करना है कि इस देष के दलित अम्बेडकर के प्रतिरोधी दलित होना पसंद करते है या कि नरेन्द्र मोदी के याचक वंचित, जिस दलित समाज ने गांधी के हरिजन होने को ठोकर मारी है, वह एक बार फिर मोदी का वंचित बनने को तैयार होता है तो इससे ज्यादा षर्मनाक कुछ भी नहीं हो सकता है. अभी तो सिर्फ इतना सा तय है कि नरेन्द्र मोदी और उनकी विचारधारा कभी भी न तो दलितों की हितैषी रही है और न ही रहने वाली है. .

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार है )

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. प्रश्न अच्छा है पर यह भी विचानिया है कि जो अन्य लोग दलितों के हितेषी होने का प्रमाण पत्र ले बोलते व घूमते है उन्होंने दलितों से वोट लेने के लिए क्या किया?सब दलों व नेताओं के ये ही हाल है कोई मुसलमानों का तो कोई दलितों का शुभचिंतक बने होने का ढोंग करते है लेकिन भा जपा आईएस करती है तो दूसरों को कांटे चुभने ग जाते है जब कि वे जानते है कि वे खुद भी दूध के धुले नहीं.

  2. प्रश्न अच्छा है पर यह भी विचानिया है कि जो अन्य लोग दलितों के हितेषी होने का प्रमाण पत्र ले बोलते व घूमते है उन्होंने दलितों से वोट लेने के लिए क्या किया?सब दलों व नेताओं के ये ही हाल है कोई मुसलमानों का तो कोई दलितों का शुभचिंतक बने होने का ढोंग करते है लेकिन भा जपा आईएस karti है तो दूसरों ko kante chubhne लग जाते है जब कि वे जानते है कि वे खुद भी दूध के धुले नहीं.प्रश्न अच्छा है पर यह भी विचानिया है कि जो अन्य लोग दलितों के हितेषी होने का प्रमाण पत्र ले बोलते व घूमते है उन्होंने दलितों से वोट लेने के लिए क्या किया?सब दलों व नेताओं के ये ही हाल है कोई मुसलमानों का तो कोई दलितों का शुभचिंतक बने होने का ढोंग करते है लेकिन भा जपा आईएस करती है तो दूसरों को कांटे चुभने लग जाते है जब कि वे जानते है कि वे खुद भी दूध के धुले नहीं.

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