अश्लील से श्लील होली गीतों का सफर…

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-राजेंद्र बोड़ा||

होली के नाम से ही एक उल्हास और मस्ती की अनुभूति होती है. फसल कटने के बाद घर में आई संपदा से मन प्रफुल्लित होता है और ठिठुरा देने वाली सर्द ऋतु के बाद वसंत के आगमन से लोग झूम उठते हैं. ऊंच नीच के सारे भेद भाव होली के रंगों में तिरोहित हो जाते हैं. लोग चंग की थाप पर नाच उठते है. मगर होली के त्यौहार के साथ अश्लीलता कब जुड़ गई कह नहीं सकते. मगर हमें इतना पता है कि पिछली सदी में एक दौर ऐसा भी आया जब होलिका दहन के दूसरे दिन धूलंडी के दिन अश्लील गीत गाना और अश्लील इशारे करते हुए हुड़दंग मचाना एक कर्मकांड बन गया. दिलचस्प बात यह रही कि वर्जनाओं वाले भारतीय समाज ने इस एक दिन की उछृंखल्ता को मान्यता दी.holi

मारवाड़ के पुष्करणा ब्राह्मण समाज ने होली के त्यौहार की अश्लीलता में अपना अलग ही मुकाम बनाया. होलिका दहन के दूसरे दिन को मारवाड़ी में छालोड़ी कहते हैं. मारवाड़ की राजधानी जोधपुर में छालोड़ी के दिन बड़े सवेरे छ्ह बजे ही अश्लील जश्न शुरू हो जाता था. पुष्करणा ब्राह्मण समाज की एक टोली जिसे ‘गेर’ कहते हैं सभी मोहल्लों से होकर निकलती थी जिसमें वृद्ध, युवा और बच्चे शामिल होते थे. गेर का नायक स्वांग बनाए हुए होता था. वह एक फटे हुए घाघरे को बांस के सिरे पर बांध कर उसे झंडे की तरह हाथ में लिए चलता था. उसके पीछे उसका खास शिष्य एक बहुरंगी सोटा घुमाते हुए चलता था. मूल नायक दोनों आंखों को मटकाता, आंख मारता और अश्लील गीत गाते हुए चलता था. उसके पीछे चलने वाली टोली समूह में गाती थी. गेर की यह टोली मोहल्लों में पंहुच कर बीच चौक में खड़े होकर अश्लील गीत गाते थे और समूचे मोहल्ले के लोग बाहर चबूतरों पर और औरतें छतों पर चढ़ कर गीतों का आनंद लेते थे.

इस प्रदर्शन का भी अपना पूरा कर्मकांड होता था. सबसे पहले अश्लील गीत से देवता स्वरूप ‘ईलोजी’ की आरती होती थी “पैली आरती पैली आरती आटो पीसे/फाटोडे धाबलिए में…दीसे. फिर नंदवाणा गीत होता था. गेर की टोली जहां से भी निकलती हर सामने मिलने वाले राहगीर से छिछोली करती जाती थी और उसे छेड़ती कि वह भी उनके साथ गाये और कोई नहीं गाये तो गाते “नहीं रे बोले जिणने राम दुहाई” या “नहीं रे बोले जीको लुगाई रो भाई”. इसमें और अश्लील शब्द भी जुड़ जाते थे.

हर साल होली के लिए नए नए अश्लील गीत बनाए जाते और उनके गाने की शुरुआत होली से पहले वसंत पंचमी से ही हो जाती थी.

पिछली सदी के तीसरे दशक का वह काल जब होली पर अश्लील गायन और हुड़दंग की यह परंपरा अपने चरम पर पहुंच रही थी तब पुष्करणा ब्राह्मण समाज में राजनैतिक और सामाजिक जागृति की चिंगारियां भी फूटने लगी थीं. इतिहास बताता है कि यही पुष्करणा ब्राह्मण समाज सामंती और ब्रितानवी राज के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई में आगे की पंक्ति  रहा. इस समाज में आज़ादी और समाज सुधार की लड़ाई साथ साथ चली.

मारवाड़ में आज़ादी के संघर्ष के सबसे बड़े नायक जयनारायण व्यास, जिन्हें लोग शेरे राजस्थान के नाम से याद करते हैं, अग्रणी समाज सुधारकों में से भी थे. जिन लोगों ने अश्लील ईलोजी आर ईलीजी तथा अश्लील होली गीतों का सामाजिक विरोध किया उनमें जयनारायण व्यास के साथ थे सरदारमल थानवी और रूप राम कल्ला. जोधपुर में खागल मोहल्ले में वर्ष 1919 में श्री पुष्करणा नवयुवक मण्डल का गठन किया गया जिसके जरिये संस्थागत विरोध की नींव रखी गई. इस संगठन के जरिये समाज सुधार के गीतों की छोटी बड़ी हजारों पुस्तकें छापी गईऔर वितरित की गई. इनमें अनेक गीत व्यास जी के स्वयं के रचे हुए थे.

इस संगठन के जरिये व्यास जी ने होली के अवसर पर गाये जाने वाले अश्लील गीतों को मिटाने का विशेष कार्यक्रम हाथ में लिया. उस जमाने के हालात को दहते हुए वह बहुत बड़ा प्रयास था क्योंकि परंपरा के आदि समाज में अश्लील गीतों के समर्थकों की संख्या बहुत अधिक थी. व्यास जी को लोग माडसाब कहते थे. वे खुद कवि, लेखक, गायक और अभिनेता भी थे. होली की गेर की उनकी टोली में सरदारमल थानवी, मगन राज, छगन राज आदि के अलावा सेवाराम पुरोहित जैसे समाज सुधार के काम की अलख जगाने वाले लोग होते थे जो सभी बुलंद आवाज़ में गाते भी थे. एडवोकेट स्वर्गीय मुरली मनोहर व्यास जो तब उस टोली के युवा सदस्य हुआ करते थे के एक संस्मरण के अनुसार “गुलाल से रंगे माडसाब चंग बजाते हुए अपने कार्यकर्ताओं की टोली के साथ मोहल्लों, बाज़ारों और गलियों से होकर निकलते थे तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि सुधार सेना ने अश्लीलता पर धावा बोल दिया हो. उन्होंने एक गीत ‘शिवजी भोलों’रचा था. उसको जब वे आगे-आगे और उनके साथी पीछे-पीछे गाते थे तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि भगवान शंकर अपनी टोली के साथ घूम रहे हों.”

समाज सुधारकों ने बाद में जोधपुर शहर में श्लील ‘डंडिया रास’ का आयोजन शुरू किया जो खूब सफल रहा. इसमें भक्ति रस के अलावा भी गीत होते थे. श्लील डंडिया रास के कुछ गीतों की बानगी देखिये “म्हारो मन लागो ऊदा छैल सूं/ जासूंघागड़िए री लार रे…” ,

“हां रे नखराली थारो, हां रे छंदगाली थरो, नखरो जोर बण्यो हे – वा वा रे वा वा”,

“नखराली ब्यायण जांणो रे चीणा रे खेत में/ नादानड़ी रा होला बिखर गया रेट में/चुग-चुग घालो ब्यावणजी री गोद में”.

“हां रे रंग रचियो, रंग रचियो रे – राई का बाग़ –श्री जी रे दरबार- खेलत फाग सुहावणों”

जेठमल बिस्सा द्वारा 1924 ईस्वी में प्रकाशित ‘मरुधर गीत माला-भाग 5’में संकलित कुछ श्लील होली गीत है “किरकोंटियों”, “जुलाहड़ों”, पांनों रौ बिडलो”, “जाटडौ”, “सूवरिया”, और “नणदल रो काजलियो”.

पुष्करणा ब्राह्मण समाज की समाज सुधार की इस मुहिम में अन्य अन्य समुदाय भी जुडते चले गए क्योंकि पुष्करणों की अश्लील होली में अन्य समुदाय के लोग भी उतना ही रस लेते थे.

सुधार के प्रयास में जयनारायण व्यास तथा अन्यों ने जो होली के श्लील गीत लिखे और गाये उससे समाज में जबर्दस्त बदलाव आया. उसका नतीजा यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ कर अब श्लील होली गीत ही गेर में गाये जाते हैं. मगर इसके लिए समाज सुधारकों को लंबे समय तक कड़ी  मेहनत करनी पड़ी. इस काम में अन्य कईं संगठन जुडते चले गए. संवत 1976 में श्री पुष्करणा स्वयं सेवक दल ने ‘वसंत गायन संग्रह’ शीर्षक से एक गीत पुस्तिका तैयार कर लोगों में वितरित की ताकि होली पर अश्लील गीतों की जगह लोग यह श्लील गीत गाये. उधर जे एन व्यास, देवदत्त शर्मा और मोहन लाल भट्ट की अगुवाई में श्रीमाली ब्राह्मण नवयुवक मण्डल, ब्रह्मपुरी, जोधपुर ने गीत पुस्तक ‘नवयुवक संगीतमाला’ प्रकाशित की तो हरदत्त सारस्वत ने सन 1931 में जोधपुर के बादलों का चौक से गीत पुस्तक ‘बाल उपदेश संग्रह’निकाली. इसी प्रकार वैश्य कुमार मण्डल, जोधपुर, ने भजनदास गुप्त की गीत पुस्तक ‘सुधार गीतावली’ प्रकाशित की. संवत 1988 में कायस्थ फ्रेंड्स एसोसिएशन, जिसके सचिव थे शिव शंकर माथुर, ने गीत पुस्तक ‘प्रेम प्रकाशक गीतावली’ निकाली. एक अन्य प्रमुख समुदाय रावणा राजपूत के चुहाण मोहनलाल ने ‘मोहनलाल भजनमाला’ छपवाई.

अब वृद्ध हो चले माईदास थानवी हालांकि अब भी होली पर अश्लील डंडिया गीत गाकर पुरानी परंपरा को प्रतीकात्मक रूप से जीवित रखे हुए है और उन्हें समाज में बुरा भी नहीं माना जाता मगर सर्वत्र श्लील होली गीत ही चलन में हैं. जयनारायण व्यास रचित कई गीत तो इतने प्रचलन में आए कि वे स्त्रियों द्वारा गाये जाने वाले विवाह गीतों में शामिल हो गए. कभी आप जोधपुर में पुष्करणा ब्राह्मण समाज के किसी विवाह समारोह में जायें और वहां महिला संगीत में गाये जाने वाले गीतों में गांधीजी का नाम सुनाई दे जाये तो चौकिएगा नहीं. आजादी के पहले व्यास जी के लिखे गीत का प्रचलन आज भी घर-घर में है यह जान कर गर्व कीजिये.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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