उत्तराखंड में उड़ रही पंचायतीराज की धज्जियां..

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-हरीश जोशी||

‘‘…….. अगर हिन्दुस्तान के गांवों में कभी पंचायतीराज कायम हुआ तो मैं अपनी उस तस्वीर की सच्चाई साबित कर सकूंगा जिसमें सबसे पहला एवं सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यूं कहिए कि न कोई पहला होगा न आखिरी…….’’panchayat_act_111_pkg

भारत वर्ष में स्वाधीनता प्राप्ति के बाद बतौर स्वप्नदृष्टा महात्मा गांधी द्वारा दी गयी उक्त अभिव्यक्ति से स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र में पंचायतों को बुनियादी तौर पर देखा जाना चाहिए. कदाचित यही वजह रही कि महात्मा गांधी के अवसान के कोई चालीस वर्ष बाद तत्कालीन युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पंचायती राज की महत्ता समझ में आई और 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारत व्यापी त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अमल में आई, परन्तु पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में गांधी और गांधी परिवार के कसीदे पढ़ने वाले दल की सरकार होने के बाद यहां पंचायती राज के कोई मायने नहीं होते हैं. ऐसा साबित किया है यहां पर बीते साल से लगातार लटकाये जा रहे पंचायती चुनावों ने.

दरअसल इस पर्वतीय राज्य में पंचायतें कोई स्वतंत्र इकाईयां नहीं अपितु राजनैतिक दलों की पिट्ठू साबित हुई हैं. उत्तराखंड राज्य में होने के बावजूद हरिद्वार जिले में उत्तर प्रदेश के साथ पंचायती चुनावों की प्रक्रिया को राज्य बनने के 13 साल में भी दुरूस्त न किया जाना साबित करता है कि राज्य की शासन और प्रशासन व्यवस्था राज्य में पंचायती राज की समरूपता की कतई पक्षधर नहीं है.

राज्य बनने के 13 वर्ष में दो दलों की अलग-अलग सरकारें और आठ मुख्यमंत्री अस्तित्व में आये परन्तु उत्तराखंड के लिये यहां की विशेष भौगोलिक और पर्वतीय परिस्थतियों के अनुरूप राज्य का अपना पंचायतीराज अधिनियम बनाये जाने का मुद्दा किसी एक के भी ऐजेन्डा में नहीं देखा गया. अगर ऐसा रहा होता तो राज्य का अपना स्वतंत्र पंचायतीराज एक्ट स्थापित हो गया होता. परन्तु इस राज्य का दुर्भाग्य रहा कि निर्वाचित विधायक जिनका मुख्य कार्य विधि का निर्माण होना चाहिए, विधायक निधि, मुख्यमंत्रियों की अदला-बदली के खेल और अपने वेतन-भत्तों के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. जिसका परिणाम है कि राज्य में बुनियादी विकास के लिये महत्तम रूप से जरूरी पंचायतीराज, जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, स्वास्थ्य के मुद्दे आज भी नीति निर्माण के लिये तरस रहे हैं.

यही वजह है कि ग्राम गणराज्य की स्वतंत्र इकाईयां पंचायतें राज्य में अलग-अलग सत्तासीन राजनैतिक दलों की सरकारों की विधायक निधि की मोहताज बनकर उभरी हैं. सरकारी, गैरसरकारी और स्वैच्छिक संगठनों के बड़े बजटों से संचालित प्रयासों के बावजूद पंचायती राज सशक्त नहीं हो सका है और पंचायती राज इकाईयां राजनैतिज्ञों और नौकरशाहों के हाथ की कठपुतली बन बैठी हैं. देश व्यापी पंचायती राज अधिनियम में उल्लेख है कि निर्वाचित पंचायतों का पांच साल कार्यकाल पूरा होते ही नये कार्यकाल के चुनाव हो जाने चाहिए परन्तु उत्तराखंड में सितम्बर 2013 को कार्यकाल पूरा कर चुकी पंचायतों के चुनावों को लगातार टाला जाना साबित करता है कि राज्य सरकार ग्राम गणराज्य की इन इकाइयों के प्रति कतई संजीदा नहीं है.

घटनाक्रम देखें तो सितम्बर 2013 के आपदा के कारणों का हवाला देकर त्रिस्तरीय पंचायती चुनावों को लंबित रखा गया. यह कारण कुछ हद तक वाजिब था परन्तु जब आपदा के हालत लगभग सामान्य से हो चले थे और दिसम्बर 2013 में पंचायती चुनावों की अनुकूल स्थिति बन रही थी तो राज्य सरकार द्वारा 2011 में संपन्न जनगणना के आकड़ों से इतर 2001 के आकड़ों के आधार पर परिसीमन कराना स्पष्ट करता है कि राज्य सरकार पंचायती राज के क्रियान्वयन से खिलवाड़ कर रही है. परिसीमन को लेकर न्यायालय के हस्तक्षेप से चुनाव टलने का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने राज्य में पंचायती राज की अवधारणा को बेहद कमजोर तो किया ही है साथ ही लोकतंत्र की इस बुनियादी व्यवस्था के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है.

राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री बदले जाने के राजनैतिक प्रहसन ने पंचायती राज का जमकर मजाक उड़ाया है. कांग्रेस के भीतर विजय बहुगुणा के प्रतिस्थानी हरीश रावत के लिये दरअसल यह चुनाव स्कूल में प्रवेश लेते ही तुरन्त परीक्षा जैसे साबित होते. जैसा कि जगजाहिर है हरीश रावत जोड़-तोड़ के फन के माहिर हैं और अंततः वह इस परीक्षा से बच ही गये हैं, परन्तु सवाल उठते हैं कि इस पर्वतीय राज्य में पंचायती राज की बुनियादी अवधारणा को जो आघात लगा है क्या उसकी भरपाई की जा सकेगी?  हरीश रावत के नेतृत्व वाली सरकार राज्य का अपना पंचायती राज अधिनियम स्थापित करने की दिशा में कोई कारगर कदम उठा पाती है ? उत्तराखंड में पंचायतें ठेकेदारी प्रथा के मोहपाश से उबर भी पायेंगी ?  अनन्त सवालों की इस फहरिस्त में गांधी के अग्रलिखित कथन को समझा जा सका तो राज्य की पंचायती प्रणाली के सशक्तिकरण स्वावलंबन और सुस्थापन की दिशा में कारगर कार्य हो सकेगा……

‘‘आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिये, हर एक गांव में जमहूरी सलतनत या पंचायत का राज होगा. इसके पास पूरी सत्ता व ताकत होगी. इसका मतलब यह है कि हर एक गांव को अपने पांव पर खड़ा होना होगा, अपनी जरूरतें खुद पूरी कर लेनी होंगी ताकि वह अपना सारा कारोबार खुद चला सके.’’ (महात्मा गांधी, हरिजन सेवक 28.07.1946)

लेखक स्वतंत्र पत्रकार और पंचायती राज मामलों के जानकार हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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