आखिर आ ही गया मौसम चुनाव का…

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-नितीश के सिंह||

चुनावों का मौसम आ ही गया. माननीय चुनाव आयोग ने इस बात की औपचारिक घोषणा आज कर दी और इसके साथ ही आचार संहिता भी लागू हो गयी. वैसे तो कांग्रेस और भाजपा के बीच लड़ाई में केजरीवाल तमाशा देखने वाले कम और आग में घी डालने के साथ यजमान को मंत्र बताते रहने वाले पंडित ज्यादा नज़र आ रहे हैं. लेकिन न तो कांग्रेस और न भाजपा ही समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बसपा, द्रमुक, अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों को नकारने की हालत में हैं. कम से कम हाल-फ़िलहाल के घटनाक्रम तो इसी और इशारा कर रहे हैं.bjps-man-of-the-moment-vs-man-of-the-movement

अन्ना का दीदी के लिए ममता दिखाना या तेलंगाना को स्वीकृति सभी चुनावी महासमर की ठोस तैयारियों को इंगित करती हैं. लेकिन सभी हाई कमानों के बीच असल मुद्दा बिहार और उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोगों के बीच परचम लहराने का है. सभी जानते हैं उत्तर प्रदेश की जीत सरकार बनाने में कितना योगदान देती है और बिहार में पकड़ बाकि देश में प्रभाव छोड़ने के लिए ज़रूरी है.

भाजपा, जिसकी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के कयास हर तरफ लग रहे हैं, ने इस तरफ काम शुरू करते हुए पिछड़ा कार्ड खेल दिया है और पासवान से हाथ मिला लिया है. पार्टी ने अपने गढ़-प्रदेशों में जनाधार बढ़ाने के लिए मुद्दों के परिवर्तन (रोटेशन भी कह सकते हैं) की नीति अपनाई है और पारंपरिक मुद्दों में से किसी एक को चुन कर ज्यादा “एक्सपेरिमेंट” न करते हुए “सेफ” गेम खेलने की पूरी कोशिश की है. वहीं राज्य स्तरीय आधार वाली राष्ट्रीय पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले है और गठबंधन के लिए पृष्ठभूमि तैयार रखी है.

इसी कड़ी में दो चालें खासी महत्वपूर्ण हैं. एक केजरीवाल का इस्तीफ़ा, जो वक़्त से थोडा पहले या यूं कहें की अपरिपक्व तौर पर सामने आया. वैसे कई दफे कच्चे फल भी बाज़ार में हाथों हाथ लिए जाते हैं. और दूसरी चाल, सहारा पर शिकंजा. अघोषित रूप से ही सही, सर्वविदित (और विवादित भी) है कि सभी कॉर्पोरेट और पैसे वाले संस्थान नमो के पक्ष में हैं या चाहते हैं की नमो अगले प्रधानमंत्री हों, सिवाय जय पी ग्रुप और सहारा इंडिया के जिसके सम्बन्ध फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में सत्ता पर काबिज़ और सपा सुप्रीमो नेता जी के साथ बहुत मधुर रहे हैं. जेपी ग्रुप्स बसपा के नजदीक है और ये बात मायावती ने कभी छुपायी नहीं है. अब कांग्रेस, जो कि लम्बे समय से उत्तर प्रदेश में बीमार हालत में चल रही है, किसी चमत्कार की उम्मीद कर सकती है या फिर सपा से गठबंधन की. चूंकि सपा सुप्रीमो खुद सत्तानशीन होने के ख्वाब पाले हुए हैं, ऐसे में उन्हें बोतल में उतारना आसान न होता. ऐसे में चुनावी वक़्त के लिए बचा कर रखे गए हथियारों में से एक सुप्रीम कोर्ट के विधिक उपचारों का सहारा लेते हुए कांग्रेस ने सपा पर दबाव बनाना शुरू किया और ठीक एक हफ्ते बाद चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी.

अब ये देखना खासा दिलचस्प होगा कि ऊंट यानि की सपा किस करवट बैठता है और कांग्रेस उत्तरप्रदेश का कितना फायदा उठा पाती है. सहारा श्री तो वैसे भी मोहरे ही थे, इस बार इस्तेमाल कोई और कर गया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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