पहलू बदलकर मंडलीय अड्डेबाजी..

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-शंभूनाथ शुक्ल||

पत्रकारिता के संस्मरण पार्ट-१३30_SM_P_3_MANDAL_1222366f

अगस्त, सितंबर और अक्टूबर १९९० के बहुत उमस भरे दिन थे वे। राजधानी में चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची थी। हर ओर बेचैनी थी। चाहे वे कांग्रेसी रहे हों अथवा भाजपाई या वामपंथी सब बहस करते समय बार-बार पहलू बदलते। चाय की दूकानों पर, चौराहों पर किसी भी मैदान की बेंचों पर बैठे बुजुर्गों, जवानों और महिलाओं में बस एक ही चर्चा होती कि अब क्या होगा? अखबारों ने अपनी अपनी सुविधा से अपना पाला चुन लिया था। नवभारत टाइम्स ने अपना तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपना। जनसत्ता साइलेंट मोड पर था लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी ने वीपी सिंह के खिलाफ एक मोर्चा खोल लिया था। दिल्ली विश्वविद्यालय और जनेयू में आग लगी हुई थी। रोज कोई न कोई छात्र आत्मदाह करने की कोशिश करता। हर चौराहे, बाजार और सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन। इससे निपटने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ता। एक जगह पुलिस आग बुझाती तत्काल उसके पड़ोस में लग जाती। बंद, टांसपोर्ट ठप, बाजारों में सन्नाटा पसरा रहता। रोज अखबार से गाड़ी आती, हमें ले जाती और छोड़ जाती। ऐसा पहला मौका था जब अपने ही दफ्तरों की गाड़ी के ड्राइवर से न तो हम बात करते और न ही वे वाचाल ड्राइवर हमसे। यहां तक कि नमस्कार तक नहीं होती थी।

एक वामपंथी संपादक ने मुझसे कहा कि गरीब तो ब्राह्मण ही होता है। हम सदियों से यही पढ़ते आए हैं कि एक गरीब ब्राह्मण था। हम गरीब तो हैं ही साथ में अब लतियाए भी जा रहे हैं। उन दिनों दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में लोग जातियों में बटे हुए थे बजाय यह सोचे कि ओबीसी को आरक्षण देने का मतलब अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण है न कि अन्य पिछड़ी जातियों को। मंडल आयोग ने अपनी अनुशंसा में लिखा था कि वे वर्ग और जातियां इस आरक्षण की हकदार हैं जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ गई हैं। मगर खुद पिछड़ी जातियों ने यह सच्चाई छिपा ली और इसे पिछड़ा बनाम अगड़ा बनाकर अपनी पुश्तैनी लड़ाई का हिसाब बराबर करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि इस मंडल आयोग ने तमाम ब्राह्मण और ठाकुर व बनिया कही जाने वाली जातियों को भी आरक्षण का फायदा दिया था। पर जरा सी नासमझी और मीडिया, कांग्रेस और भाजपा तथा वामपंथियों व खुद सत्तारूढ़ जनता दल के वीपी सिंह विरोधी और अति उत्साही नेताओं, मंत्रियों द्वारा भड़काए जाने के कारण उस राजीव गोस्वामी ने भी मंडल की सिफारिशें मान लिए जाने के विरोध में आत्मदाह करने का प्रयास किया जो ब्राह्मणों की आरक्षित जाति में से था। और बाद में उसे इसका लाभ भी मिला।

नवभारत टाइम्स के संपादक राजेंद्र माथुर ने चुप साध ली थी और सुरेंद्र प्रताप सिंह की टीम हमलावर मूड में थी। रोज वहां तमाम ऐसे लोगों के लेख ढूंढ़-ढूंढ़कर छापे जाते जिसमें ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों की निंदा की जाती। अथवा कहना चाहिए कि कमर के नीचे हमला किया जाता। तभी रामबिलास पासवान का एक बयान आया कि उनके कलेजे में ठंड तब पहुंचेगी जब उनके घर की महरी ब्राह्मणी होगी। अब वीपी सिंह भी लाचार थे और वे अपनी टीम पर काबू नहीं कर पा रहे थे। वीपी सिंह ने पासवान के ऐसे बयान का विरोध किया मगर खुलकर वे कुछ नहीं कह पा रहे थे। वे घिर गए थे। अपनी ही बनाई लकीर में और अपने ही लोगों ने उन्हें बंद कर दिया था। वे खुली दुनिया में नहीं आ पा रहे थे। हालांकि वे स्वयं चाहते थे कि ऐसे आग लगाऊ बयान बंद हों पर न तो वीपी सिंह इस पर काबू कर पा रहे थे न उनके टीम के अन्य लोग। दो काम हुए। इंडियन एक्सप्रेस से अरुण शौरी को हटा दिया गया। और सुरेंद्र प्रताप सिंह की पकड़ नवभारत टाइम्स में कमजोर पडऩे लगी। कारपोरेट हाउसेज ने अपना धंधा संभाला। वे जातिगत लड़ाइयों में अपना धंधा नहीं मंदा करना चाहते थे। जनसत्ता में न तो मंडल सिफारिशों के समर्थन में कोई लेख छप रहा था न विरोध में। ऐसे सन्नाटे में मैने एक लेख लिखा आरक्षण की फांस। इसमें मैने लिखा कि नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलेगा तो उसे ही जो संपन्न होगा तथा पढ़ा-लिखा होगा। अब मैकू जाटव और मैकू सुुकुल दोनों ही मेरे गांव में खेतिहर मजदूर हैं और उन दोनों को ही आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इसलिए मध्यवर्ग के सवर्णों में इसे लेकर बेचैनी है गरीब सवर्ण को तो भड़काया जा रहा है। इस लेख के छपने के बाद ही केंद्रीय मंत्री रामपूजन पटेल हमारे दफ्तर आए और प्रभाष जी के पास जाकर मुझे बुलवाया। मुझसे हाथ मिलाते हुए उन्होंने कहा कि शुक्ला जी आप पहले ब्राह्मण तो क्या सवर्ण पत्रकार हैं जिन्होंने आरक्षण के समर्थन में लेख लिखा। मैं आपका आभारी हूं।

इसी दौर में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह का एक लेख नवभारत टाइम्स में छपा जिसमें बताया गया था कि वीपी सिंह में नया करने की ललक तो है पर शऊर नहीं है।
जारी

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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