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-सुभाष गौतम||

लाइव ड्रामा-विश्व पुस्तक मेला प्रगति मैदान नई दिल्ली में सातवाँ दिन, दिनांक 21 फरवरी दिन शुक्रवार था. हाता नं 18 का आर्थर कार्नर पाथर नहीं गुलजार था. क्योंकि “बाग़-ए-बेदिल” का दिल-ए-नादान कल्बे कबीर (कृष्ण कल्पित) वहा शुक्रवार की नमाज आदा करने वाला पहला मुसलमान था. कल्बे कबीर को देखने सुनने भारी मात्र में लोगों का जुटान था लोग चिहा चिहा के “बाग़-ए-बेदिल” को देख रहे थे. यह पुस्तक पढ़ने और युद्ध में कपार फोरने दोनों में उपयोग गो सकती है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया के वामपंथी फरार थे. समय से न पहुचने वालो को नमाज अदा करने की मनाही थी. पुस्तक “बाग़-ए-बेदिल” के विमोचन का मामला था kalpit and ashokइस लिए कवी/शायर अशद जैदी को कल्बे कवीर ने कैदी बना दिया था. डिजिटल पोइट्री /वर्चुअल पोइट्री के अवजार से कल्बे कबीर ने साहित्य जगत व् पक्षकारिता के लोगों की इजरी-पिजरी से पेट-पिछवाडा ख़राब करने वाले पहले शायर/कवि हैं. दूसरी नमाज अदा करने कल्बे कबीर बाग़-ए-बेदिल पहुचे थे इसमें कोई शक नहीं वह पक्का मुसलमान हैं. जब छोटकुआ कवि अशोक पण्डे के साथ बाग़-ए-बेदिल मम्मान में बाग़-ए-बेदिल मज़ार पहुचे. मटका पीर के ओह तीर डांक के पहुचे. पुस्तक मेला में लेखक लोग आंचा-पांचा, चमड़ी-दमड़ी के जुगाड़ में लगे हुए थे औए एक पंचमंगारा बियाह जैसे पांच लोगन के उपस्थिति में कल्बे कबीर बाग़-ए-बेदिल सम्मान से अशोक पण्डे को सम्मानित कर रहे थे.

यह पुरस्कार साहित्य अकादमी के पुरस्कार से भी बड़ा था, क्योंकि इस सम्मान में अशोक पांडे को अल्कौसर, स्वेत लम्ब दंडित और “बाग़-ए-बेदिल” पुस्तक भेट दी गई. पुरस्कार वितरण के बाद इस पाक स्थल पर अशोक पण्डे को नमाज अदा कराइ गई और उन्हें एक मुसलमान का दर्जा देकर रिहा कर दिया गया. इस अवसर पर अजन्ता देव और अशोक पण्डे ने अपनी कविता भी पढ़ी. बाग़-ए-बेदिल की खोज कल्बे कबीर ही कर सकते हैं क्यों वो एक अच्छे पुरात्ववेत्ता कवि हैं. यह स्थल बहुत ही रमणीय हैं, गजोधर कवि जब कभी मौका मिले जरुर जाएँ. किताबों के ऑन लाइन बाजार पर शैलेश भारत बासी ने चर्चा की जो अभी ठीक से आँफ हि नहीं हुए ऑन होने की सोच रहे हैं. राजकमल में पिता ऑफ़ व्यापार हैं तो बेटा व्यापार ऑन होने की सोच रहा है. वाणी प्रकाशन को तो छाडी दीजिए वो बाप बेटी कब ऑन होते कब ऑफ़ यह सिर्फ पुस्तकालयों को पता होता है. इस आयोजन में रंग लगाने रंगनाथ बीबी…. सी जी भी पहुचे थे, मंच रंग रंग रहा.kalpit-bag-e-bedil

भरी दुपहरिया हाता नं 18 में अशोक बाजपेइ, मनेजर पण्डे, केदारनाथ जी “हिंदी साहित्य का अतीत और वर्तमान ” की चर्चा किया. इस चर्चा को सुनकर जनता भारी कन्फुज हो गई क्यों कि हिंदी वर्तमान है या भविष्य इसी में डिसफुज हो गई. नन्हा आलोचक/कथाकार संजीव कुमार जी इस आयोजन का संचल करते हुए कहा की मैं प्रश्न उछलूंगा और आप सभी बरिष्ठ जुझिए गा. अशोक बाजपेइ, मनेजर पण्डे, केदारनाथ जी प्रश्नो से जूझते कम कूदते ज्यादा नजर आए. नमो मूत्र औषधि भंडार से लौटते हुए संकट नोचन व्यक्ति ने मानेज पण्डे द्वारा छिनरा राम-लक्ष्मण की आलोचना करने पर भांग भभूत बन बैठा, पण्डे जी का तो जाने लेलिया होता, अगर जनता उसकी इजरी पिजरी नहीं करती. आथर कार्नर में चाकर कथाकार उदय प्रकाश साँझ के समय पालगोमरा के स्कूटर लेकर पहुच गए. एक-एक कल-पुरजा टायर से लेकर टूब तक के बारे में बता जो बेहद रोचक रहा. उन्होंने बतया की पलगोमारा का बचपन का नाम “ई” रहा, जवानी में “ऊ” रहा, गाँव में लोग “चू” कहते थे आब मैं ताल ठोक के अपने को पलगोमारा कहता हूँ. हम तो देखते भाग गए पालगोमरा का स्कूटर में सैलेंसर नहीं था. बहुत भोकार मारने वाला था.

शुक्रवार के संपादक विष्णु नगर जी के गागर से निकली पुस्तक “जीवन भी कविता हो सकता है” का विज्ञापन विश्वनाथ त्रिपाठी ने अंतिका प्रकाशन के गुमटी में किया. वर्तिका तोमर नामक कवित्री की पुस्तक का विज्ञापन वर्तिका नंदा जी ने अंतिका प्रकाशन में किया. विष्णु नागर वैश्विक ताकतों के खिलाफ व्यंग भरी कवितओं जनता जनता को खरीद फरोख्त से आगाह किया. मीडिया स्टडीज ग्रुप के फुटपाथ पर देर से पहुच, अनिल चमडिया दा ने ज्ञान मिला तो दिया पर पौड़ी के मरहूम रहना पड़ा. बाजार बेहद निराशा जनक रहा चस्पा चस्पा पुस्तक के जुगाड़ में पाठक भी देखे गए.

नोट- अगर किसी के साथ उच्च नीच हो जाए तो बनारस की ठंढई पीके भुला दीजिए. अइंचा-पइचा, इजरी -पिजरी का महिना है..

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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