लाइव ड्रामा: विश्व पुस्तक मेला..

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-सुभाष गौतम||

विश्व पुस्तक मेला प्रगति मैदान नई दिल्ली में आठवां दिन, दिनांक 22 फरवरी दिन शनिवार हाता नं 18 का आर्थर कार्नर में आगई थी हरियाली, कुछ आर्थर कतार भारी निगाह से तो कुछ कनखियां से देख रहे थे. गजोधर, चटोधर, सकोधर, भकोधर कवि लोगन पुस्तकन का लोकार्पण मानो अइसे कर रहे थे जैसे जुर्योधन द्वारा द्रोपदी माता चीरहरन. कार्नर में बैठी जनता द्रोपदी माता के इस चीरहरन पर थापर-थापर थपरी पिट रही थी.world book fair

कुछ स्त्री-पुरुष लेखक-लेखिका तो अपने साथ थपरी बजाने वालन के भी लाई रही. जिनमे खास कर उनकी नौकरानियाँ शामिल थीं. इस संग्रह में उसपर भी चार कविता भी लिखी थीं. स्त्री-पुरुष कतारबद्ध होकर खड़े थे अपना अपनी पुस्तक का ठोंगा लेके अपनी पारी के इंतजार में. अपनी कविता संग्रह का अनावरण करने के बाद एक कवीत्री ने अपनी सहेली से कहा ये सखी हम तो कुछु बोली नहीं पाए, उनको देख के लाजा गई. दूसरी तरफ अंतिका प्रकाशन के गुमटी नं 88 में ननकुआ कवि (अरविन्द जोशी) एक चित्र खीचाने के साथ मित्र को सहयोग राशी के साथ अपनी कविता संग्रह “मैं एस्ट्रोनाट हूँ” पर हस्ताक्षर के साथ अन्तरिक्ष यात्रा पर ऐसे भेज रहा था. ननकुआ कवि किताब पर शियाही वाली कलम से हस्ताक्षर कर के फूक-मार के सूखाता फिर अपने सिने में चपकाता और संग्रह को देता तो लगता था की अपनी प्रेमिका को किसी को सौप रहा है.

पुस्तक मेला के स्त्री-पुरुष कवि लेखक मंच नामक ग्रह पर बौडीया रहे थे और ननकुआ कवि अंतरीक्ष में रोकेट में बैठ के मौज मार रहा था. ननकुआ कवि के एक और परिचय उसने हमको अपना पाहून स्वीकार लिया मैंने भी लगे हाथों एक दूसरा पहाड़वाद शुरु किया हैं जिस को भी शामिल होना है इस पहाड़वाद में शामिल हो जाओ, अगला मुशायरा 21 मार्च को इंडिया हैबिटेट सेंटर में करना है, जिसमे ननकुआ कवि का बर-बरछा, तिलक-बियाह, गौऊना-दोंगा और विदाई भी करना है. क्यों कुल जमा अभी तक उत्तराखंड का यही पहाड़ी है जो मुझे अपना पाहून मानने को तैयार हुआ है, तो भाई हमको भी तो अपना रिश्ता निभाना है. वैसे ननकुआ कवि की पुस्तक का लोकार्पण रविकांत भाई और युवा कवि आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव ने अंतिका की गुमटी में किया, जितेन्द्र भाई हमरे आग्रह पर अपने बड़का भाई का फ़र्ज आदा किए. इसी गुमटी में लीलाधर मंडलोई काका ने मेरे कामरेड गुरु स्व.अरुण प्रकाश की पुस्तक “कहानी के फलक” पुस्तक का लोकार्पण किए.

साँझा को लेखक मंच पर एक कवि टंच होक चढ़े, जैसे ही अपनी कविता पढ़ने केलिए जेब से कागज निकले की पीछे से आवाज आई, ससुरा नून-मसाला, धनिया-जीरा, सोठ-हरे मग्रैल का पुरजी निकाल रहा है क्या. कविता तो ऐसे पढ़ी जैसे अलवात मेहरारू कहर रही हो. कल पूरा दिन मेला में कविता ही कविता का संसार था. हाँस्य कवि फांस कवि बन गए थे. अभी तक कविता सुना के लोगों को हंसाया करते थे पर शनिवार को उनको कवियों ने कविता सुना-सुना के पका दिया. बाग-ए-बेदिल के लेखक कल्बे कबीर पुस्तक मेला छोड़ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपनी कविता की सूक्तियां बाच रहे थे. हिंदी कवियों की कविता कल रही तेल में और ननकुआ कवि की ढेर सारी कविता संग्रह हस्ताक्षर के साथ सेल में, “या अदब तेरे कौसर में न तल्खी थी न मस्ती” इसी के साथ हिंदी साहित्य का बाजार बंद हुआ. नोट- अगर किसी के साथ उच्च-नीच हो जाए तो बनारस की ठंढई पीके भुला दीजिए. अइंचा-पइचा, इजरी-पिजरी का महिना है…

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