जनआस्था के केन्द्र जनता के प्रति जबाबदेह और पारदर्शी हों..

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उत्तराखंड में मुख्यत: दो किस्म के मंदिर हैं, एक वे जो पहाड़ी क्षेत्रीय देवी देवताओं के मंदिर हैं जो उस क्षेत्र की आम जनता की पहचान है और वर्षों से चली आ रही श्रद्धा का केन्द्र यहां शादियां भी होतीं हैं और आम जनता ही यहां जाती है. बुरा पक्ष ये है कि इन मंदिरों में कुमांउ के पंडित और कुछ जगहों पर ठाकुर पुजारी कब्जा मारे बैठे हैं. मंदिरों में दलितों को भी मुख्य पुजारी बनाया जाना चाहिए था. ये धार्मिक उदारता भी होती और सामाजिक ताने बाने की जातीय जड़ता को भी तोड़ने में अच्छी मिसाल होती. हालांकि कफल्टा कांड भी लोगों को याद हो कि कुमांउ में ही हुआ था मंदिर के सामने से जा रही दलितों की बारात पर धार्मिक विवाद में कई दलित लोग मार डाले गये.large5

दूसरे वे मंदिर जो कि आश्रम हैं. जहां मूर्तियां तो भले भव्य खड़ीं हैं पर वो मंदिर इन मूर्तियों पर नहीं बल्कि किसी खुद को स्वयंभू भगवान कहने वाले के दम पर चलते हैं. यहां का मुख्य भगवान वो ही होता है. जिसने स्थापना की अगर वो मर गया है तो माल प्रबंधन चेला चौकड़ी के हाथ है, और जो जिँदा है वो तो वाकई भगवान जैसा ही संपत्ति और सलाहियात का मालिक है. यहां क्षेत्र के चुनिंदा लोग प्रभावशाली गुंडा एलीमेंट टाईप मंदिर आश्रम की दुकान आदि सेवाओं से जुड़े हैं और क्षेत्रीय आम जनता यहां नहीं जाती. हाईटेक मंदिरों में हाईटेक भक्त आते हैं. मसाज मैडिटेशन वाले आरती नहीं गाते हैं. ये भगवान से मांगने नहीं बल्कि कुछ दिन एकांत में बिताते हैं और मंदिर और भगवान दोनों को देकर जाते हैं. इन आश्रम रूपी मंदिरों के बाहर लगी भगवान की मूर्तियां खुद याचक जैसी लगतीं हैं.

जब दो किस्म के मंदिर हैं तो जाहिर है भक्त भी अलग अलग श्रेणीगत होंगे पर आम लोगों को मंदिर में आने के लिए एक खास दिन भोजन भंडारा होता है कि बस आज आओ खाना खाओ और निकल लो फिर अगले साल इसी दिन आना.

कुछ रहस्यमय और तिलिस्मी इनके भीतर जरुर है क्योंकि यहां जनता के प्रति जबाबदेही या पारदर्शिता है ही नहीं. जब जन आस्था से कमाई की जा रही है तो इन मंदिरों और आश्रमों को जबाबदेह बनाया जाना चाहिए.

तमाम जिंदा भगवानों को खुद को अवतार घोषित करना अपराध है ईश्वर और जनता दोनों के प्रति इसलिए उत्तराखंड के तमाम आश्रमों में बैठे स्वयंभू भगवान बाबा जोगी जोगटों पर नजर रखने की जरुरत है. धर्म के नाम पर ऐसे तमाम भगवानों के खिलाफ जनता को खुद जाकर इनकी संपत्ति और तमाम अंधेरगर्दी की जांच करनी चाहिए. अगर ऐसी जांच की मांग होगी तो सबसे पहले क्षेत्रीय प्रभावशाली लोग, गुंडे, ठेकेदार और नेता टाईप लोग खिलाफत करेंगे. फिर पढ़े लिखे शिक्षाविद बोलेंगे. इनका तिलिस्म तगड़ा है पर याद रहे जो भी छिपा कर रखा जाता है वो आपराधिक मामला ही होता है. नेकी कौन छिपाएगा? वो भी आस्था के इस बाजारु युग में.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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