और नाम के साथ जुड़ गया शुक्ल..

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-शंभूनाथ शुक्ल||
पत्रकारिता के संस्मरण (पार्ट-10)

दिल्ली की पत्रकारिता कुछ अलग किस्म की थी और यहां के लोग भी उतने ही भिन्न. जब मैने पत्रकारिता शुरू की तो अपना सरनेम नहीं लिखा करता था. मेरी कहानियां और लेख शंभूनाथ के नाम से ही छपते थे. अप्रैल 1978 में जब मेरा लेख ‘अर्जक संघ उप्र का डीएमके’ रविवार साप्ताहिक में छपा तो उस पर खूब पत्र आए. यहां तक कि अर्जक संघ के संस्थापक राम स्वरूप वर्मा तक ने उस पर पत्र लिखा. लेख के समर्थन और विरोध में कई सप्ताहों तक चिट्ठियां छपती रहीं. तभी एक पत्र आया शंभुनाथ जी का. वे हावड़ा में रहते थे और कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते थे. उन्होंने लिखा कि ‘आपके और मेरे नाम में सिर्फ छोटी और बड़ी ‘ऊ’ की मात्रा का फर्क है इसलिए कन्फ्यूजन होता है. अत: आप अपना नाम बदल लो.’ मैने वह पत्र कामतानाथ जी को दिखाया. उन्होंने कहा कि उन्हें लिख दो कि ‘आप अपना नाम बदल लीजिए.’ मैने आलसवश कोई पत्र नहीं लिखा. पर नाम नहीं बदला. और धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान से लेकर दिनमान तक इसी नाम से छपता रहा. पर दिल्ली आने पर मेरा नाम बदल दिया गया. प्रभाष जी ने कहा कि आप चाहे शुकल (ध्यान रहे कि प्रभाषजी की बोलने की अपनी अदा थी किसी को वे पंडित कह कर बुलाते तो किसी को कुछ और, मुझे वे सुकल कहते) लिखो अथवा नहीं लिखो लोग जाति तो तलाश ही लेंगे. और न लिखने से एक तरह की मक्कारी दीखती है कि आप हर जगह लाभ उठाने की फिराक में पाए जाओगे.1781007_775399852473594_2025254014_o

मैने कहा ठीक है और जनसत्ता निकलने के कुछ ही दिनों बाद तेलुगू देशम पार्टी के संस्थापक टी. रामराव की ‘भारत देशम’ की कल्पना की समीक्षा करते हुए जनसत्ता के संपादकीय पेज पर मेरा एक मुख्य लेख छपा. उसमें प्रभाष जी ने शंभूनाथ के साथ शुक्ल भी जोड़ दिया. बस इसके साथ ही शुरू हो गई शंभनूाथ शुक्ल की यात्रा. मैने दो लोगों से राय ली. एक तो कमलेश्वर जी से दूसरे गोरख पांडेय से. कमलेश्वर जी ने कहा कि ‘जाने दो. पहले दुष्यंत कुमार भी दुष्यंत कुमार लिखते थे फिर परदेशी उपनाम रख लिया और मृत्यु के कुछ समय पहले दुष्यंत कुमार त्यागी हो गए. शायद यही उनका सही फैसला था.’ साथी गोरख पांडेय ने कहा कि ‘शुक्ल लिखने या नहीं लिखने से आपके प्रगतिशील विचार न तो मरते हैं न पनपते हैं इसलिए कुछ फर्क नहीं पड़ता.’ पर जब सुरेंद्र प्रताप सिंह नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक बनकर दिल्ली आए तो पहली ही मुलाकात में उन्होंने कहा कि ‘अच्छा शंभूनाथ जी अब दिल्ली आकर शंभूनाथ शुक्ल हो गए.’

दिल्ली तो अजब शहर था. शनिवार को तेल मांगते सनीचरी लोग और हर चौराहे पर घंटा-घडिय़ाल. मुझे तब लगा कि दिल्ली दरअसल दक्षिणपंथियों का ही गढ़ है. और जो वामपंथी यहां हैं वे वही हैं जो यहां महंतगीरी करने आए हैं. चाहे वे जवाहरलाल नेहरू विवि के महंत हों या दिल्ली विवि के. महंतई एक दक्षिणपंथी शब्द और व्याख्या है इसलिए यहां वामपंथ भी दक्षिणपंथ का ही पर्याय है. अजीब कन्फ्यूजन था दिल्ली में.
(जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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