छत्तीसगढ़ः दोधारी तलवार है यहां ख़बर लिखना…

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-आलोक प्रकाश पुतुल।। ( बीबीसी के लिए)

जुडूम का अभियान अपने चरम पर था. मैं उस समय एक फ़ेलोशीप के तहत नक्सल आंदोलन और औद्योगिकीकरण के बीच के रिश्ते को समझने के लिए अध्ययन कर रहा था.

एक सरकारी विज्ञप्ति में ख़बर मिली कि सलवा जुड़ूम के कैंप में रहने वाले तीन लोगों को नक्सलियों ने मार डाला है. मैंने पड़ताल की और मरने वाले तीनों लोगों के परिजनों, उनकी पत्नियों और ज़िंदा बच गए लोगों से मिल कर यह सच्चाई सामने लाया कि आदिवासियों को नक्सलियों ने नहीं, पुलिस वालों ने ही मारा था. मेरी ख़बर रायपुर के एक दैनिक अख़बार में प्रमुखता से छपी.140217110156_chattisgarh_media_swatantra_yatra_624x351_alokprakashputul

मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और इस मामले में पीड़ितों को मुआवज़ा देने के निर्देश भी दिए गए.

लेकिन ख़बर छपने के कोई सप्ताह भर बाद मैं जब एक अधिकारी से बातचीत के लिए पुलिस मुख्यालय पहुंचा तो पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मिलते ही पूछा, “आप नक्सलियों की मदद क्यों कर रहे हैं?”

मैं इस सवाल से भौंचक रह गया. मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि मैंने केवल अपने पत्रकार होने का धर्म निभाया है और सच्चाई सामने लाई है. लेकिन वह चाहते थे कि पुलिस की ऐसी गड़बड़ियां सामने न लाई जाएं. उनके अनुसार इससे पुलिस का मनोबल गिरता है.

200 से ज़्यादा अख़बार

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों और पुलिस को लेकर जब आप कोई तथ्यात्मक ख़बर लिखते हैं तो आपको दोनों का शिकार होना पड़ता है.

भारत में पत्रकारिता के हालात पर ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की ताज़ा रिपोर्ट को पढ़ते हुए ऐसे कई क़िस्से याद आ गए.

छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा पत्रकारों की हत्या और सरकारी पेड न्यूज़ की ख़बरों के बीच ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत दुनिया के देशों में 140वें पायदान पर हैं.

यह रैंकिंग वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स 2014 में दर्ज की गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल भारत में पत्रकारों के प्रति काफ़ी हिंसा का माहौल रहा और 13 पत्रकार मारे गए.

इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ और कश्मीर को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि भारत में पत्रकार सरकारी और ग़ैर-सरकारी दोनों तत्वों के निशाने पर रहे. रिपोर्ट के अनुसार भारत का कोई भी क्षेत्र पत्रकारों के लिए ख़तरे से ख़ाली नहीं, पर कश्मीर और छत्तीसगढ़ विशेष रूप से हिंसा और सेंसरशिप के गढ़ बने रहे.131110173515_chattisgarh_landmine3_624x351_bbc

छत्तीसगढ़ के जिन इलाक़ों में माओवादी हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं, वहां के पत्रकारों से इस रिपोर्ट का ज़िक्र करें तो वे छूटते ही कहते हैं, “बिल्कुल सही है. हम हिंसा भी झेलते हैं और सेंसरशिप भी.”

छत्तीसगढ़ के दो प्रमुख शहर रायपुर और बिलासपुर से प्रकाशित दैनिक अख़बारों की संख्या दो सौ से अधिक है. इनमें नई दुनिया, दैनिक भास्कर, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, नवभारत, पत्रिका, हरिभूमि और देशबंधु जैसे लोकप्रिय अख़बार भी शामिल हैं.

इन अख़बारों के स्थानीय संस्करण बस्तर, दुर्ग, अंबिकापुर से भी निकलते हैं. इसके अलावा राज्य के लगभग हर एक ज़िला मुख्यालय से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार और पत्रिकाओं की संख्या ग्यारह सौ के आसपास है.

छत्तीसगढ़, मीडिया, सुकमा
छत्तीसगढ़ में 200 से ज़्यादा अख़बार और राज्य स्तरीय कई टीवी चैनल हैं.
राज्य में सहारा समय, ज़ी टीवी, इंडिया टीवी, साधना टीवी, बंसल न्यूज़, आईबीसी 24 जैसे राज्य स्तरीय समाचार चैनल भी हैं.

सेंसरशिप

इन सभी समाचार माध्यमों के संवाददाता लगभग तहसील स्तर पर हैं. लेकिन इन संवाददाताओं के लिए न तो वेतन की ठीक-ठीक व्यवस्था होती है और न ही उनकी सुरक्षा की. संवाददाता होने का पहचान पत्र या टीवी चैनल की माइक आईडी दे कर अधिकांश समाचार माध्यम छुट्टी पा लेते हैं.

अधिकांश संवाददाताओं के लिए आय का माध्यम वह कमीशन होता है, जो विज्ञापन देने के बदले उनकी संस्था उन्हें देती है. ऐसे में आय के दूसरे स्रोत की तलाश करते कथित तौर पर ब्लैकमेलिंग करने वाले पत्रकारों के क़िस्से भी आम हैं. ठीक उसी तरह नेता, अफ़सर, पुलिस, ठेकेदार, बिल्डर, नक्सलियों, अपराधियों के गिरोह पत्रकारों को कभी उपकृत करते हैं तो कभी पत्रकार उनके निशाने पर होते हैं.

पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता कर रहे रायपुर के दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ के प्रधान संपादक सुनील कुमार का कहना है कि जो अंतरराष्ट्रीय पैमाने ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के हैं, वे किस हद तक और किस तरह से छत्तीसगढ़ में लागू होते हैं, इसका अंदाज़ा मुझे नहीं है.

सुनील कुमार कहते हैं, “हिंसक गतिविधियों वाले इलाक़े की पत्रकारिता में एक ख़तरा हमेशा बना रहता है कि जब कभी आप शुद्ध पत्रकारिता के अलावा कुछ भी और काम करते हैं तो आप अपने को ख़तरे में डालते हैं. दोनों पक्षों में से किसी एक तरफ़ के निशाने पर आप आ जाते हैं. छत्तीसगढ़ में जो पत्रकार मारे गए हैं, वे क्या अपनी पत्रकारिता की वजह से मारे गए हैं, इस तथ्य को भी हमें देखना होगा.”

छत्तीसगढ़
राज्य में सेंसरशिप जैसी बात को भी सुनील कुमार सिरे से नकारते हैं. बक़ौल सुनील कुमार, “इतने सालों की पत्रकारिता में न तो मैंने इसे देखा-सुना है और न ही कभी मुझसे किसी ने छत्तीसगढ़ में सेंसरशिप की शिकायत की है. न तो नक्सलियों की तरफ़ से और न ही सरकार की तरफ़ से.”

बस्तर के पत्रकार अविनाश प्रसाद की राय है कि बस्तर के जिन इलाक़ों में सरकार नहीं है, वहां या तो पुलिस है या फिर नक्सली. उन इलाक़ों में पत्रकारों को दोनों का ख़्याल रख कर कोई भी ख़बर लिखनी होती है.

वह कहते हैं, “रायपुर, दिल्ली के बड़े घरानों के अख़बारों में मामूली पैसों पर काम करने वाले बस्तर के पत्रकार को हर ख़बर को लिखने से पहले पचास बार सोचना पड़ता है कि इससे कौन-कौन नाराज़ हो सकता है.”

पंजाब, दिल्ली और छत्तीसगढ़ में कई प्रतिष्ठित अख़बारों के संपादक रहे रायपुर के रमेश नैयर का मानना है कि छत्तीसगढ़ में सरकार और पत्रकार संगठनों दोनों को ही सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है.

नैयर कहते हैं, “मैंने आपातकाल भी देखा है और ऑपरेशन ब्लू स्टार का दौर भी. वैसी सेंसरशिप तो छत्तीसगढ़ में नहीं है लेकिन पक्षपात तो है. सरकार के ख़िलाफ़ लिखने पर विज्ञापन पर असर तो पड़ता है.”

“बस्तर नहीं, पूरे राज्य के हालात एक जैसे हैं. आप ख़बरों पर काम कर रहे हैं तो अपनी सुरक्षा का ज़िम्मा आपको ख़ुद लेना पड़ेगा.”
हर्ष पांडेय, पत्रकार, बिलासपुर
हत्या

बिलासपुर में दिसंबर 2010 में दफ़्तर से काम ख़त्म कर लौट रहे पत्रकार सुशील पाठक की बीच शहर में हत्या कर दी गई थी. सीबीआई की जांच के बाद भी अब तक हत्यारों का पता नहीं है.

इसके अगले ही साल जनवरी 2011 में महासमुंद में पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या कर दी गई.

पिछले साल फ़रवरी में माओवादियों ने सुकमा में एक पत्रकार नेमीचंद जैन की हत्या कर दी थी. इसके बाद दिसंबर में बीजापुर में पत्रकार साईं रेड्डी को माओवादियों ने मार डाला था. इन हत्याओं के बाद पत्रकारों ने माओवादियों की ख़बरों का बहिष्कार किया था और पद यात्राएं भी निकाली थीं.

राज्य में पत्रकारों पर हमले, उन्हें कथित तौर पर मुक़दमों में फंसाने के कई मामले भी सामने आए हैं.

बिलासपुर के पत्रकार हर्ष पांडेय कहते हैं, “बस्तर नहीं, पूरे राज्य के हालात एक जैसे हैं. आप ख़बरों पर काम कर रहे हैं तो अपनी सुरक्षा का ज़िम्मा आपको ख़ुद लेना पड़ेगा.”

बस्तर में शाम के पहले अख़बार ‘हाईवे चैनल’ के संस्थापक संपादक, सुदीप ठाकुर इन दिनों ‘अमर उजाला’ दिल्ली में स्थानीय संपादक के पद पर हैं और उनका छत्तीसगढ़ आना-जाना लगा रहता है. सुदीप इस पूरे मसले को दूसरे तरीक़े से देखते हैं.

सुदीप ठाकुर
पत्रकार सुदीप ठाकुर कहते हैं कि नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद अब बस्तर के पत्रकारों पर कॉरपोरेट घरानों का भी दबाव है.
वे कहते हैं, “बस्तर में पत्रकारिता दोधारी तलवार से कम नहीं है. नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद अब बस्तर के पत्रकारों पर कॉरपोरेट घरानों का भी दबाव है. कॉरपोरेट और नक्सलियों के बीच के रिश्ते में पत्रकारों के शामिल होने के मामले हमारे सामने हैं. इसकी पड़ताल ज़रुरी है.”

राज्य में अधिकांश बड़े अख़बार किसी ने किसी उद्योग-धंधे से जुड़े हुए हैं. ‘दैनिक भास्कर’ समूह अपने पावर प्लांट और कोयला खदानों के लिए अब मशहूर हो रहा है तो कोयला खदानों से अख़बार के धंधे में आया ‘हरिभूमि’ राज्य का नंबर वन अख़बार का दावा करते हुए मैदान में है.

छत्तीसगढ़ के कई अख़बारों के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध पूरे मामले को मीडिया घरानों के दूसरे काम-धंधे और सरकार के साथ उनके व्यवसायिक रिश्ते के साथ देखने की बात करते हैं.

वह कहते हैं, “छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्ष तौर पर पत्रकारों पर कोई दबाव नहीं है. पत्रकारों पर तो उनके मालिकों का दबाव है. एक प्रमुख अख़बार ने तो अपने संपादकों को लिखित में निर्देश जारी करके श्रेणियां बनाई हैं. इनमें पहली श्रेणी में जो नाम और संस्थाएं हैं, उनके ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं लिखने का, दूसरी श्रेणी में वो नाम हैं, जिनके साथ संतुलन बना कर चलना है और तीसरी श्रेणी में ऐसे आईएएस, आईपीएस और बड़े अफ़सरों, नेताओं के नाम हैं, जिनके ख़िलाफ़ कभी-कभार लिखने के निर्देश हैं.”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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