नियमों का उल्लंघन करते हुए मोईली ने महान को पर्यावरण क्लियरेंस दिया..

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एस्सार-हिंडाल्को के पक्ष में नीचे गिरते हुए मोईली ने महान को दूसरे चरण की मंजूरी दी...

एस्सार एनर्जी ने घोषणा की है कि सिंगरौली में स्थित महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की पर्यावरण क्लियरेंस मिल गयी है. जबकि पर्यावरण व वन मंत्रालय ने इससे पहले किसी तरह की घोषणा नहीं की थी. इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा, “हमें पहले ही डर था. मोईली लगातार जल्दबाजी में पर्यावरण क्लियरेंस बांट रहे हैं उससे हजारों लोगों की जीविका खत्म हो जायेगी. वनाधिकार कानून तथा दूसरे अन्य जरुरी शर्तों के उल्लंघन के बावजूद मोईली ने महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की मंजूरी दे दी है. इस प्रोजेक्ट से करीब 500,000 पेड़ और हजारों लोगों की जीविका को नुकसान होगा. मोईली ने जनजातिय मामलों के मंत्री केसी देव द्वारा उठाये गए सरोकारों को भी नजरअंदाज कर दिया. बड़ा सवाल है कि क्या वास्तव में सरकार जंगलों के निवासी और पर्यावरण की चिंता करती है?”verrpa moily

महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता और अमिलिया निवासी कृपानाथ ने कहा कि “हमलोग इस फैसले से निराश हुए हैं. इस प्रोजेक्ट से हमारी जिन्दगी खतरे में है. हम हजारों लोग इसी जंगल पर निर्भर हैं. हमलोग अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे और अपना जंगल महान कोल ब्लॉक को नहीं देंगे. केन्द्रीय जनजातिय मामलों के मंत्री के समर्थन के बावजूद इस खबर ने हमें अचंभित किया है. क्या केन्द्र और राज्य सरकार आदिवासियों और जंगल निवासियों के लिए सही में चिंता करती है? उसी सरकार द्वारा वनाधिकार कानून लाने का क्या औचित्य है जो खुद उसके कार्यान्वयन से बचता है ?”

जूलाई 2013 में, जनजातिय मामलों के मंत्री ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल को सिंगरौली में वनाधिकार कानून के उल्लंघन के बारे में लिखा था. साथ ही, मांग की थी कि बिना वनाधिकार कानून लागू किए बिना पर्यावरण क्लियरेंस नहीं दिया जाय. वनाधिकार कानून को लागू करवाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन पर्यावरण क्लियरेंस देने से पहले केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वो वनाधिकार कानून को सुनिश्चित करे. वनाधिकार कानून लागू न करने की वजह से ही नियामगिरी में वेदान्ता और ओडिसा में पोस्को के प्रोजेक्ट आगे बढ़ने में असफल हुए.

22 जनवरी को ग्रीनपीस तथा महान संघर्ष समिति ने एस्सार के मुंबई स्थित मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया था तथा मोईली द्वारा जल्दबाजी में उद्योगों के पक्ष में दिए जा रहे निर्णय पर सवाल उठाया था. एस्सार ने ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति के ग्रामीणों पर 500 करोड़ का मानहानि तथा चुप रहने का मुकदमा किया है.

एस्सार ने ग्रीनपीस द्वारा मांगे जा रहे पर्यावरण मंत्री मोईली के इस्तीफे पर भी निषेधाज्ञा लगाने की कोशिश की थी. न्यायालय में उपस्थित ग्रीनपीस की कार्यकर्ता अरुंधती मुत्थू ने बताया कि “एक निजी कंपनी द्वारा केन्द्रीय मंत्री को बचाने की कोशिश करना बेहद संदेहास्पद था. एस्सार द्वारा तेजी से क्लियरेंस बांट रहे वीरप्पा मोईली को बचाने का मतलब अब आसानी से समझा जा सकता है. उनलोगों को पहले से ही उम्मीद थी कि यह क्लियरेंस मिलने वाला है”.

कोयला घोटाले के दौरान महान कोल ब्लॉक 2006 में एस्सार और हिंडोल्को को संयुक्त रुप से आवंटित किया गया था. फिलहाल यह कोल ब्लॉक सीबीआई की जांच के दायरे में भी है. कोल ब्लॉक के आवंटन के तरीकों पर सवाल उठ रहे हैं शुरुआत में राज्य सरकार द्वारा इस कोल ब्लॉक को एस्सार को देने का विरोध किया था और फिर सिर्फ तीन महीने के भीतर उसने अपना पाला बदल लिया.
ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति मांग करती है कि वनाधिकार कानून के उल्लंघन के सबुत के आधार पर इस क्लियरेंस को रद्द किया जाय. साथ ही वो क्लियरेंस के खिलाफ लड़ने के सभी उपायों पर विचार करेगी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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