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कितनी बार चौरासी..

By   /  February 12, 2014  /  No Comments

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-शंभूनाथ शुक्ल||

पत्रकारिता के संस्मरण (पार्ट सात)

मैं कई बार सोचता हूं कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं होती. हम किसी को भी प्यार और दुलार से समझा सकते हैं लेकिन इसके लिए धैर्य चाहिए, साहस चाहिए और निडरता भी. १९८४ का जवाब १९८४ और फिर १९८४ नहीं था. लेकिन तीन बार यह दुर्घटना घटी. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके ही दो अंगरक्षकों ने आपरेशन ब्लू स्टार के पांच महीने के भीतर ही मार दिया. उस इंदिरा गांधी को जिनके बारे में हम रोज अखबारों और रेडियो पर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी उवाच इतनी बार सुन चुके थे कि हमें कभी यह लगा ही नहीं कि इंदिरा गांधी को जाना भी पड़ सकता है. एक सर्वशक्तिशाली महिला जिसने राजाओं के ताज छीन लिए और पूंजीपतियों से उनके बैंक. वह महिला जिसके बारे में कहा जाता था कि ‘इंदिरा बहिन का है राजरानी, प्यासा न पावै हिन कहूं पानी.’ इंदिराजी के ऐसे अलौकिक गुणों को हम सब इतनी बार सुन चुके थे कि हमें यह सूचना एक अफवाह सी लगी.anti sikh roits

लेकिन ३१ अक्टूबर को सुबह ११ बजे जब मैं एक्सप्रेस बिल्डिंग पहुंचा और यह बताया गया कि इंदिरा गांधी को किसी ने गोली मार दी है तो कुछ समझ ही नहीं आया. ऐसा कैसे हो सकता है? छठे दरजे में पढ़ता था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री बनी थीं और सारी पढ़ाई व आवारगी पूरी कर नौकरी भी करने लगा लेकिन कभी यह लगा ही नहीं कि इंदिरा जी इस देश की मायने नहीं हैं. भले बीच में मोरार जी देसाई तथा चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे हों पर हरदम लगा यही कि अरे ये तो पिन्नी टाइप के नेता हैं जिनकी इंदिरा गांधी को देखते ही फूंक सरक जाया करती थी. चरण सिंह जब गृह मंत्री थे तो इंदिरा जी को गिरफ्तार करने की योजना बनाई. इंदिरा जी जाकर एक पुलिया पर धरने पर बैठ गईं तो खुद यही नेता उन्हें मनाने गए कि बहिन जी आप घर जाओ. कोई आपको नहीं पकड़ेगा. एक ऐसी महिला को कोई मार सकता है भला.

लेकिन वह अफवाह नहीं थी और सच था. बाद में पता चला कि उन्हें गोली मारने वाले उनके सिख अंगरक्षक बेअंत सिंह और सतवंत सिंह थे. मजे की बात कि इन्हें इंदिरा जी के अंगरक्षक पद से हटाने का दबाव था पर इंदिरा जी ने ऐसा नहीं होने दिया. कुछ ही देर बाद चारों ओर अंधेरा छा गया. अक्टूबर की धूप के बावजूद सूरज दोपहर में ही ढल गया. बताया गया कि जून में हुए आपरेशन ब्लू स्टार का बदला था लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ वह सोचा तक नहीं गया था. एक पूरी कौम को निशाना बनाकर हमला किया गया. इस खूरेंजी में हिंदू मुसलमान दोनों ही बराबर के शरीक थे. यहां इंदिरा जी की हत्या का बदला कम लूट की बहुतायत थी. सिख एक मेहनतकश संपन्न कौम रही है. उनके पास पैसा था और उस जमाने में ऐसी-ऐसी चीजें लूटी गईं जो आम मध्यवर्ग कल्पना नहीं कर सकता था. पूरी दिल्ली समेत सारे हिंदी भाषी इलाकों मेें सिखों के घरों को लूटा जाने लगा. और बूढ़े व बच्चों समेत सभी मर्दों की हत्या का खूनी खेल शुरू हो गया. यह कोई दंगा नहीं था बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों, खासकर हिंदी भाषी इलाकों के, की कुंठा थी. आलसी और मूर्ख लोगों का हुजूम सिखों को लूट रहा था और जो लोग कुछ कर सकते थे वह इसे निस्सहाय से देख रहे थे. लाशों की सडऩ से दिल्ली गंधा रही थी. अखबार चुप थे लेकिन जनसत्ता नहीं. आलोक तोमर ने ऐसे-ऐसे तमाम घर ढूंढ़ निकाले जहां सिर्फ विधवाएं बची थीं. नौनिहाल शिशु बचे थे या सिर्फ खंडहर. ऐसा लगता था कि राजधानी में सिख कौम खत्म कर दी गई है. एक सभ्य देश की राजधानी का यह आलम दुखद था.

1781007_775399852473594_2025254014_oइंदिरा जी के बेटे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया जो अभी कुछ साल पहले तक सिर्फ जहाज उड़ाया करते थे. इंदिरा गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय की आकस्मिक मौत के बाद उन्हें सहारे के लिए अपने साथ किया हुआ था. तब कैबिनेट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी वरिष्ठतम थे लेकिन उन्हें मौका नहीं देकर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया. राजीव घाघ राजनेता नहीं थे. भोलाभाला चेहरा और राजनीति के चौसर में एकदम सिफर. राजीव प्रधानमंत्री बने तो कारपोरेट हाउसेज ने उन्हें हाथोंहाथ लिया था. यहां तक कि इंडियन एक्सप्रेस समूह ने भी. राजीव गांधी के विरुद्ध तब कोई संपादकीय नहीं छप सकता था. और जनसत्ता में जब ऐसा ही एक संपादकीय उस समय के एक सहायक संपादक, जो सर्वोदयी थे, ने लिखा तो उसे रोक लिया गया. यह उन्हें बहुत अपमानजनक लगा और उन्होंने इस्तीफा दे दिया तथा दफ्तर आना बंद कर दिया. लेकिन यह प्रभाष जी का बड़प्पन था कि उन संपादक के घर गए और उनका इस्तीफा वापस करवा कर ही मानें.

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  • Published: 6 years ago on February 12, 2014
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  • Last Modified: February 12, 2014 @ 1:24 am
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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