ये सब्जी, फल हैं या करमों के फल हैं..

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एक तरफ हिमाचल प्रदेश है जहाँ स्थानीय फलों को प्रोसेस कर उसकी मार्केटिंग के लिए फेडरेशन खड़ा कर दिया गया और हिमाचल प्रदेश के फलों का रस, जैम इत्यादि देश के कोने कोने में फ़ैल गए.. मगर उससे लगते उत्तराखंड में कभी ऐसा प्रयास नहीं हुआ.. फल उत्तराखंड में भी लगते हैं.. रस भी होता है इन फलों में.. फिर उत्तराखंड सरकार खाद्य प्रसंस्करण के लिए घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित क्यों नहीं करती..? प्रस्तुत है इस अछूते विषय पर मीडिया दरबार पर एक श्रृंखला…

-दीप पाठक||
उत्तराखंड में फल सब्जी विपणन एक बड़ी समस्या है केदार घाटी के फाटा में आलू होता है तो बागेशवर के दूरस्थ गांव दाबू में भी गजब आलू होता है. दाबू का आलू गरुड़ अल्मोड़ा पहुंचना बड़ी बात है और फाटा का आलू श्रीनगर तक पहुंचाना आफत है दून तो दूर की बात ठहरी.strawberry-crop

मुक्तेश्वर के आड़ू,सेव,खूबानी, आलूबुखारा जैसे तैसे हल्द्वानी आ जाते हैं. अगर ठीक समय पर जब पेड़ में फल दाना आकार लेता है, ओले पड़ गये तो फल दोयम दागी हो जाता है. बाजार के लायक दाम नहीं मिलता जैम जैली में खपाने लायक तो होता ही है पर जैम जैली के भवाली के पास फरसौली मेँ फ्रुटेज नाम के एकाध जैम जैली फल उत्पाद प्रसंसकरण इकाइयां ही हैं. एक गरमपानी में है जो इलाके के फलों का पूरा जैम जूस अचार मुरब्बे में नहीं खपा सकते. शतांश भर ही ये इकाइयां उत्पाद बाजार में ला पातीं हैं. उनका अधिकांश माल डंप रहता है.पौड़ी गढ़वाल में एकमात्र परशुराम भट्ट जी ऐसा काम करते हैं. उनको तारीफ तो मिलती है पर हट्टी जम के नहीं देती.

अधिकांश बीन्स दालें भट, गहत, राजमा का भी विपणन नहीं हो पाता उनके भी औने पौने दाम मिलते हैं. अखरोट भी खूब होता है पर बाजार में उत्तराखंड के बजाय कशमीर का अखरोट बादाम दिखता है.

उत्तराखंड सरकार का यूं तो उद्यान मंत्री भी होता है पर उत्तरकाशी, मुक्तेश्वर, पिथौरागढ़, बागेश्वर की फल पट्टियां चौपट हुईं जातीं हैं मगर यह उनको नहीं दिखता. शायद ही कभी उद्यान मंत्री ने फल पट्टी के पुर्नगठन की योजना बनायी हो!अंग्रेजों के जमाने में बनीं ये फल पट्टियां इस कदर उपेक्षा का शिकार हैं कि मुक्तेश्वर के सेब आड़ू के भरपूर बगीचे के मालिक वयोवृद्ध हरक सिंह मेहता जी एक दिन अपने बागीचे के फलों से लदे पेड़ देखकर बोले-“ये फल तो हैं पर क्या करें? करमों के फल हैं!”

हरक सिंह मेहता जी की बात सारगर्भित है जिस तरह उत्तराखंड की फल सब्जी पट्टियाँ तबाह हुईं वो आगे इस श्रंखला में सिलसिलेवार पढ़ियेगा कि किस तरह किसान अपने अतिरिक्त उत्पाद पर पसीना बहाने के बाद आंसू बहाता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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