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हर सिख क्षोभ और शोक में डूबा था..

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-शंभूनाथ शुक्ल||

पत्रकारिता के संस्मरण- पार्ट छह

साल 1984. वे जून के तपते हुए दिन थे. अमृतसर का मौसम सर्दी में जितना जमा देने वाला होता है गर्मी में उतना ही गरम. लू के थपेड़ों के चलते दूकानें सूनी थीं और पीतल के बड़े-बड़े कलसों में दूध ले जाने वाले दूधिए सिख अपनी साइकिलों से बाघा बार्डर की तरफ बढ़े चले जा रहे थे. रास्ते में सेना, बीएसएफ और सीआरपी का लश्कर पूरी तरह से चाक-चौबंद होकर बढ़ रहा था. सीमा का इलाका, इसे उन्होंने एक सामान्य घटना ही समझा. लेकिन दोपहर 12.40 तक इन सेना के आदेश पर अर्धसैनिक बलों ने गुरु रामदास लंगर पर फायरिंग शुरू कर दी. आठ लोग मारे गए तो पता चला कि यहां हरमंदिर साहब में आपरेशन ब्लू स्टार आपरेशन शुरू हो चुका है. दिल्ली का माहौल भी गर्म हो चला था. किसी की समझ में नहीं आया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह कौन सा कदम उठा लिया. कनाट प्लेस में सिखों की दूकानें धड़ाधड़ बंद हो गईं और राजधानी के गुरद्वारा सीसगंज समेत सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारों में मुर्दनी छा गई. हर सिख शोक और क्षोभ में डूबा था. सिखी का इतिहास वीरता और उदारता का रहा है. उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया.1984-anti-sikh-riots

लगभग एक हफ्ते तक आपरेशन चला और अकाल तख्त पूरी तरह कब्जा हो जाने के बाद ही आपरेशन खत्म हुआ. कुछ लोगों की नजर में प्रधानमंत्री का यह कदम बेहद वीरतापूर्ण था क्योंकि सिख खाड़कुओं पर कब्जा पाने का यही अकेला और अंतिम इलाज था. लेकिन सिख इसे क्रूर सामंती कार्रवाई मान रहे थे. उन्हें लगता था कि वे मानों एकाएक 17 वीं सदी में भेज दिए गए. इंदिरा गांधी की इस कार्रवाई का चौधरी चरण सिंह समेत सारे आर्य समाजी राजनेताओं ने समर्थन किया था. इतनी बड़ी घटना हो जाने के बाद भी सिखों के अलावा किसी भी धार्मिक समुदाय के नेता अथवा विपक्ष के राजनेता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई ऐसा लग रहा था कि वे सभी भी ऐसे ही किसी कदम की अपेक्षा कर रहे थे. लेकिन अंदर ही अंदर सिख समुदाय इससे बुरी तरह आहत हुआ और देश की आंतरिक सुरक्षा देख रही एजेंसियां इसे समझ नहीं पाईं. हिंदी के सारे अखबार भी इस आग में घी ही डाल रहे थे. एक भी अखबार ने इस घटना का विरोध नहीं किया. ऐसे मौके पर प्रभाष जोशी ने सिखों के मर्म को समझा और उन्होंने इस कांड का विरोध किया तथा सिखों के क्षोभ से भरे लेख छापे गए.

ऐसे में जनसत्ता अचानक सिखों का अखबार कहा जाने लगा और यह माना गया कि व्यवस्था व सरकार का विरोध करने की क्षमता सिर्फ जनसत्ता में ही है. उधर जनसत्ता सिखों का प्रिय अखबार बन गया और जनसत्ता खरीदने के लिए पंजाब के दूर दराज के गांवों में सिखों ने हिंदी सीखी. अपने जन्म के कुल छह महीनों के भीतर ही इस अखबार की प्रसार संख्या ढाई लाख पार कर चुकी थी. प्रभाष जी के लेख पढऩे के लिए लोग इंतजार करते और दिल्ली के आसपास का सारा इलाका जनसत्ता की बढ़त के बोझ के तले दबा था. दिल्ली से छपने वाला जनसत्ता बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले इलाकों में तीसरे दिन पहुंचता और अमृतसर के गांवों में भी लेकिन लोगबाग बस अड्डों पर इंतजार करते या सांडनियों का जिनके जरिए जनसत्ता वहां पहुंचाया जाता.1781007_775399852473594_2025254014_o

पर अखबार सिर्फ संपादकीय विभाग के बूते नहीं चलता. वह मार्केट के बूते चलता है और मार्केट जनसत्ता का विरोधी होता चला गया. इसके संपादक प्रभाष जोशी को अखबार को बढ़ाने में तो सफल रहे लेकिन रेवेन्यू उगाहने में नहीं. यह सब 1984 से ही साफ होने लगा था. इस वजह से इसकी प्रसार संख्या घटाई जाने लगी. यह शायद पहला अखबार था जिसके संपादक प्रभाष जोशी ने पहले पेज पर अपनी बात लिखी जिसमें कहा कि पाठक गण कृपया जनसत्ता मिल बांट कर पढ़ें क्योंकि अब और ज्यादा इसे छाप सकने की हमारे प्रबंधन की क्षमता नहीं है.
(जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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