जिसने भी बाजार को पकड़ा वही मीर हुआ..

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-शंभूनाथ शुक्ल||

पत्रकारिता के संस्मरण- पांच (चौथे हिस्से के बाद का भाग)

१९८० के दशक को पत्रकारिता का स्वर्ण काल कहा जा सकता है. दशक की शुरुआत में ही इंदिरा गांधी का पुन: राज्यारोहण हो चुका था और गैर कांग्रेसी सरकारों से लोगों का मोहभंग होने लगा था. लेकिन इस बार सदैव से सोवियत संघ के पाले में रहीं इंदिरा गांधी का झुकाव अमेरिका की तरफ बढ़ चला था और संजय गांधी राजनीति में सबसे ताकतवर इंसान थे. संजय के चलते दक्षिणपंथी राजनीति अचानक इंदिरा गांधी के प्रति उदार हो उठी थी. लेकिन संजय गांधी भरोसेमंद नहीं थे. वे एक आक्रामक और तत्काल फल चाहने वाले राजनेता थे. तथा हर तरह का जोखिम उठाने को तत्पर. वे कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक ब्राह्मण, तुर्क व दलित के समीकरण को ध्वस्त करते चल रहे थे. इमरजेंसी के दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट की मुस्लिम आबादी को जिस तरह उन्होंने उजाड़ डाला था उससे आरएसएस समर्थक तबका तो खुश था लेकिन उदार और लेफ्ट तबका कन्फ्यूज्ड. संजय ने तेजी दिखाई और राज्यों की सरकारें ताबड़तोड़ गिरानी शुरू कर दीं. उनके पहले निशाने पर हिंदी राज्य रहे. यूपी, एमपी, राजस्थान, बिहार और हरियाणा में सरकारें गिराई गईं और वहां फिर से कांग्रेसी सरकारें फिर आ गईं. पर इस बार मुख्यमंत्री भी कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक से नहीं बने. यूपी में एक पूर्व राजा वीपी सिंह इसी तरह मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह, राजस्थान में पहले जगन्नाथ पहाडिय़ा को बनाया गया लेकिन जल्द ही उन्हें अपदस्थ कर शिवचरण माथुर नए मुख्यमंत्री बने. हरियाणा में भजन लाल को बनाया गया. पर उसी साल २३ जून को एक छोटा प्लेन उड़ाते वक्त दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई.1781007_775399852473594_2025254014_o

कांग्रेस के सारे प्रांतों के मुख्यमंत्री नाकारा साबित हुए. वजह यह थी कि हिंदी राज्यों में एक नई राजनीति पग रही थी और वह थी मध्यवर्ती और पिछड़ी कही जाने वाली जातियों को नव उभार. दूसरी तरफ पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद पनपने लगा था. पंजाब में सिख आतंकवाद इस तरह चरम पर था कि वहां से हिंदू पलायन करने लगे थे और कश्मीर से पंडित भगाए जाने लगे. इंदिरा गांधी का सोवियत लाबी से अलग होना उन्हें अनवरत कमजोर कर रहा था. देश में पूंजीवाद एक नए रूप में उभर रहा था जो कोटा कंट्रोल पद्धति से भिन्न था और पूंजीपति लगातार बेलगाम होते जा रहे थे. ट्रेड यूनियन्स कमजोर पड़ती जा रही थीं तथा आजादी के बाद से राजनीति व अर्थनीति के बाबत बनाई गई सारी मर्यादाएं तार-तार हो रही थीं. यह वह समय था कि जिसे जो कुछ बेचना हो बाजार में आए और बेचे. मीडिया एक प्रोडक्ट के रूप में सामने आ रहा था. उसकी सारी आक्रामकता और खबरें अब एक प्रोडक्ट को बाजार में लांच करने की हमलावर शैली जैसी थीं. इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी ने आकर देश के उस बाजार को पकड़ा जो अभी तक अछूता था. पहली बार भागलपुर आंख फोड़ो कांड को कवर कराया गया जहां कुछ सवर्ण पुलिस अफसरों ने पिछड़ी जाति के अपराधियों की आंखें तेजाब डालकर या सूजा घुसेड़कर फोड़ डाली थीं. इसी तरह उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अंतुले के कारनामों पर हमला बोला. इसी दौरान हुई मीनाक्षीपुरम की वह घटना जिसने सारे हिंदू समाज को स्तब्ध कर दिया. मीनाक्षी पुरम के दलितों के एक बड़े हिस्से ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपना लिया. पर हिंदी के अखबार इन सब खबरों से अनजान थे और अक्सर अरुण शौरी की इंडियन एक्सप्रेस में छपी रपटों को हिंदी में अनुवाद कर छापा करते थे.

ऐसे समय में इंडियन एक्सप्रेस समूह ने हिंदी का नया अखबार निकाला जनसत्ता. तब तक दिल्ली में दो ही हिंदी के अखबार अपनी पैठ बनाए थे. टाइम्स आफ इंडिया समूह का नवभारत टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स का हिंदी हिंदुस्तान. इसमें से हिंदुस्तान में तो रंचमात्र पत्रकारीय स्पंदन नहीं था. उसके संपादक विनोदकुमार मिश्र की स्थिति तो यह भी नहीं थी कि वे किसी उप संपादक अथवा किसी रिपोर्टर तक को भरती कर सकें. सारी भरतियां उसके कार्यकारी निदेशक नरेश मोहन करते. संपादक महज एक दिखाऊ पोस्ट थी. नवभारत टाइम्स में स्थिति कुछ अलग थी. उसके प्रबंधन ने अस्सी के बदलाव को पहचान लिया था और प्रबंधन के अपने कृपापात्र संपादकों की फौज हटाकर पहली दफे एक तेज तर्राक पत्रकार राजेंद्र माथुर को संपादक बनाया गया. राजेंद्र माथुर मूलत: आगरा के थे और इंदौर जाकर बस गए थे. वे वहां पहले अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे थे और फिर नई दुनिया के स्थानीय संपादक. राजेंद्र माथुर ने आते ही नवभारत टाइम्स का कलेवर बदल दिया और माथुर साहब ने उसे पाठकों से जोड़ा. उनके संपादकीय के लोग इस कदर दीवाने थे कि नवभारत टाइम्स की खबरों की बजाय उसके लेख पढ़े जाने लगे और माथुर साहब के संपादकीय तथा लेख. माथुर साहब की राजनीतिक समझ नेहरू जमाने की थी और उनकी मान्यताएं भी. पत्रकारिता में पुराने पर नवीन दिखने वाली इस मान्यता को खूब स्वीकार्यता मिली. पर जनसत्ता ने तो आते ही तहलका मचा दिया.

जनसत्ता की इस सफलता के दो कारण थे. एक तो इसके संपादक प्रभाष जी ने बाजार को खूब समझा और दूसरे हिंदी पत्रकारिता की सड़ी-गली आर्य समाजी नैतिकता से बोली और भाषा को निकाला. उन्होंने कठिन और आर्यसमाजी हिंदी को दिल्ली और पास के हिंदी राज्यों के अनुरूप सहज और उर्दूनुमा हिंदी को मानक बनाया. बाजार के अनुरूप उन्होंने उस समय पंजाब में लगी आग को मुद्दा बनाया और वहां से भाग रहे हिंदुओं के लिए जनसत्ता संबल बना तथा यूपी और बिहार में हिंदी को संकीर्ण बनाने वाले मानक तोड़ डाले. नतीजा यह हुआ कि हर वह व्यक्ति जनसत्ता का मुरीद हो गया जो अंदर से नए बाजारवाद का समर्थक था तथा उसके अंदर जेपी की समग्र क्रांति को लेकर कहीं न कहीं एक नरम भाव था. बाजार के इस नए लोकप्रिय और तथाकथित जनप्रियता का यह एक नया पैमाना था.

(ज़ारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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