रॉबर्ट वाड्रा ने सरहदी जिले बाड़मेर में कोई जमीन नहीं खरीदी, जिला कलेक्टर की रिपोर्ट…

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-चन्दन सिंह भाटी||

बाड़मेर, राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. राजस्व मंडल अजमेर ने सभी जिला कलेक्टर को पत्र लिख कर तत्काल उनके जिलो में रॉबर्ट वाड्रा द्वारा खरीदी गयी जमीं कि सूचना मांगी थी, राजस्व मंडल के इस पत्र पर सरहदी जिले बाड़मेर के जिला कलेक्टर ने राजस्व मंडल को एक लाइन का प्रत्युत्तर लिखा हें कि बाड़मेर जिले में रॉबर्ट वाड्रा के नाम किसी प्रकार कि जमीन नहीं खरीदी गयी. सूचना के साथ भेजे जवाब से स्पष्ट हो गया है कि रॉबर्ट वाड्रा ने इस सरहदी जिले में कोई जमीन अपने नाम से नहीं खरीदी.robert-vadra

राज्य सरकार वाड्रा के खिलाफ अगले कुछ दिनों में कोई बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. करीब एक माह पूर्व विधानसभा चुनाव में वाड्रा जमीन घोटाले को चुनाव मुद्दा बनाते हुए भाजपा ने कहा था कि सत्ता में आते ही इस पूरे मामले की जांच कराएंगे. वाड्रा के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से जुड़े जमीनी सौदों की भी जांच शुरू कराई जा रही है. केन्द्र सरकार के कम्पनी ऑफ रजिस्ट्रार से भी वाड्रा से जुड़ी कम्पनियों के बारे में जानकारी मांगी गई है.

प्रदेश के ऊर्जा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर का कहना है कि वाड्रा और उनसे जुड़ी कम्पनियों ने बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर सहित कई जिलों में जमीन खरीदी थी. इन जमीनों पर सोलर प्लांट लगाए जाने को लेकर ऊर्जा विभाग से अनुमति भी मांगी गई और कुछ में मिली भी थी. सरकार को जानकारी मिली है कि वाड्रा द्वारा जमीनें खरीदने के बाद जवाहर लाल नेहरू सोलर मिशन स्वीकृत हुआ. इससे उन जमीनों के भाव आसमान पर पहुंच गए.

वाड्रा की जमीनों पर लगे सोलर प्लांट्स पर सरकार से सब्सिडी भी मिली. वहीं कुछ जमीनें इसलिए ऊंचे दामों में बिकी क्योंकि उन पर लगने वाले प्लांट्स पर सब्सिडी मिलने वाली थी. अब तक की जांच में सामने आया है कि वाड्रा को पहले से ही इस बात की जानकारी थी कि सरकार सोलर एनर्जी के लिए जवाहर लाल नेहरू मिशन को काफी अहमियत देते हुए सब्सिडी देगी. वाड्रा ने किसानों से सस्ते दामों पर जमीन खरीदकर कुछ अन्य कम्पनियों को मोटे दामों में बेची. तत्कालीन ऊर्जा विभाग के अधिकारियों से भी मुख्य सचिव राजीव महर्षि ने जानकारी मांगी है. कुछ अधिकारियों द्वारा वाड्रा की कम्पनियों की समस्त कागजी कार्रवाई अपने स्तर पर करने की बात भी सामने आई है. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्देश पर राजस्व मण्डल के अध्यक्ष सी.एम. मीणा ने सभी जिला कलेक्टरों को पत्र लिखकर वाड्रा से जुड़े जमीनी प्रकरणों की जानकारी दस दिन में भेजने को कहा है.

गौरतलब है कि पिछली अशोक गहलोत सरकार ने करीब 50 हजार एकड़ जमीन का लैण्ड बैंक सोलर हब बनाने के लिए तैयार किया था. यह जमीन अवाप्त कर केन्द्र सरकार के जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय सोलर मिशन के तहत सोलर प्लांट्स लगाने की योजना बनाई गई थी. अवाप्ति के समय ही गहलोत सरकार ने कुछ जमीनें अवाप्त करने से छोड़ दी, बाद में इन्हीं जमीनों को वाड्रा की कम्पनियों ने खरीदा था. ये कम्पनियां दिल्ली, नोएड़ा और गुड़गांव की होने के कारण केन्द्र सरकार के कम्पनी ऑफ रजिस्ट्रार से भी इनके सम्बन्ध में जानकारी मांगी गई है. इस मामले को लेकर लम्बे समय से संघर्ष करने वाले बीकानेर सांसद अर्जुन मेघवाल का कहना है कि सीमावर्ती जिले जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर में जमीनें तत्कालीन सरकार के अधिकारियों के सहयोग से खरीदी गई थी. बिना कागजी कार्रवाई पूरी हुए ही कुछ सोलर प्लांट्स की भी अनुमति दी गई थी. कुछ दिनों पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद, राष्ट्रीय सचिव भूपेन्द्र यादव और अर्जुन मेघवाल ने मुख्यमंत्री से इस मामले की जांच की मांग की थी.

सरकार को यह भी जानकारी मिली है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत के नाम से भी बीकानेर में सोलर प्लांट लगाने के लिए जमीन खरीदी गई और यहां प्लांट लगाने की मंजूरी भी दी गई. इसमें दिल्ली के एक बड़े उद्योगपति का नाम भी सामने आया है.

अशोक गहलोत के निकटस्थ राज्य के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी द्वारा भी सोलर प्लांट लगाने की जांच भी कराई जा रही है.

वाड्रा जमीन प्रकरण को लेकर ही तीन दिन पूर्व एनपीपी विधायक किरोड़ी लाल मीणा ने सरकार से सवाल पूछा था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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