चाय, शेर और अखबार की खबर..

admin
0 0
Read Time:7 Minute, 2 Second

-अरविन्द कुमार||

मैं गहरी नींद में था. करवट लेते ही मैंने देखा कि वे मेरे सामने बैठे हैं. मैं चौंका. अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ. लेकिन वाकई वे ही थे. वही चेहरा, वही कुरता, वही जाकेट, वही करीने से काढ़े हुए बाल, वही सेक्युलर दाढ़ी, और महत्वाकांक्षा से भरी हुयी वही मुस्कान. मुझे आश्चर्य से टुकुर-टुकुर ताकता हुआ देख कर वे मुस्कुराये-कैसे हैं विरोधी भाई?narendra-modi-tea
मैंने हड़बड़ा कर इधर-उधर देखा. वे निपट अकेले थे. न कोई सुरक्षा कर्मी. और न ही चहेतों की भीड़. मैंने इत्मीनान की सांस ली. और उठ कर बैठ गया-अरे आप? इस वक़्त….मैं बिलकुल ठीक हूँ. और आप? मैंने पूछा.
-मैं तो हमेशा ठीक रहना चाहता हूँ. पर आप लोग रहने ही नहीं देते. हर बार दो हज़ार दो खड़ा कर देते हैं. अब तो न्यायालय का फैसला भी आ गया है. अब तो जान छोड़िये. चाय पीजिएगा? उन्होंने पूछा.
-नहीं, मैंने चाय छोड़ दी है.
-क्यों? पहले तो बहुत पीते थे.
-हाँ, लेकिन अब अरुचि हो गयी है.
–क्यों?
-क्योंकि अब चाय चाय नहीं रही. उसमें मिलावट होने लगी है. कभी अदरख की चाय. कभी तुलसी की चाय. कभी नींबू की चाय. कभी मसाले वाली चाय. कभी ग्रीन चाय. और अब यह पोलिटिकल नमो की चाय.
-सुना है, अब तो आप लोग भी राम-रहीम चाय ला रहे हैं.
-हाँ, शायद. इसी को कहते हैं, क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया.
कहने को तो मैंने कह दिया. पर अन्दर से काफी डर भी गया था कि कहीं वे भड़क न जायें. पर वे चुपचाप कुछ सोचते हुए चाय घुटकते रहे. और मैं डरा-सहमा निर्निमेष उनके चहरे पर आते-जाते भावों को देखता-पढ़ता रहा. चाय खत्म होते ही वे अचानक जोश में आ गए. और कुर्सी पर चढ़ कर जोशीले हो गए. और हांथों को ऊपर-नीचे व दायें-बाएं करके मैं, मैं और मैं का अपना घिसा हुआ रिकार्ड बजाने लगे.
-मैं शेर हूँ, बब्बर शेर. पूरी दुनिया मुझे गुजरात के लायन के नाम से जानती है. मैं गुजरात का गौरव हूँ. शुद्ध राष्ट्रवादी. विकास का प्रतीक. सच्चा देश भक्त. बाल ब्रह्मचारी. मैं हूँ असली लौह पुरुष. आप लोग ख्वामख्वाह जिन्ना की मजार पर जा कर कसीदा काढ़ने वाले को लौह पुरुष मानते हैं. मुझे एक बार पीएम बनाने दीजिये. फिर देखिएगा कि पूरे देश को कैसे गुजरात बनाता हूँ. गुजरात आज जो कुछ भी है, इसी छप्पन इंची सीना के कारण है. वरना गुजरात कभी गुजरात नहीं बनता.
-लेकिन…मैंने उनको बीच में रोकना चाहा.
-टोकिये मत, चुपचाप सुनिए. वे अपने असली रंग में आ गए थे-आप लोग बे वज़ह बदनाम करते हैं. अफवाहें फैलाते हैं मेरे खिलाफ. गुजरात में कहीं कुपोषण नहीं है. माताएं और बच्चे एनीमिक नहीं, जीरो फीगर बना रहे हैं. हमारी बुनियादी शिक्षा सोचनीय नहीं स्तरीय है. रोजगार वृद्धी दर शून्य नहीं उससे थोड़ा ऊपर है. यहाँ के नौजवान नौकरी की तलाश में गुजरात छोड़ कर अमेरिका और कनाडा नहीं भाग रहे. यह देश का पांचवा विकसित राज्य है. कानून -व्यवस्था की स्थिति अति उत्तम है. हरेन पांड्या के हत्यारे तुरंत पकड़े गए थे. दंगाइयों को हमने फ़ौरन जेल भेज दिया था. लड़कियां सुरक्षित हैं, क्योंकि वे हरवक्त जासूसों की निगहबानी में रहती हैं. हमारे यहाँ गाय, बकरी और जंगली जानवर एक ही घाट पर पानी पीते हैं. हर तरफ अमन है. चैन है. और स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है. किसान खुशहाल हैं. मजदूर उससे भी ज्यादे खुशहाल हैं. आपको पता है, हमारे ग्रामीण छोटे भाई ग्यारह रुपये में और शहरी मोटे भाई सत्तरह रुपयें में अमीरी के मज़े लेते हैं.
-लेकिन सरकारी, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आंकड़े तो कुछ और ही कहते हैं.
-वो सब कांग्रेसी, समाजवादी, वामपंथी और आपवादी एजेंसियां हैं. इसीलिये तो मैंने कांग्रेस मुक्त देश का नारा दिया है. ज़ल्दी ही मैं तीसरा मोर्चा मुक्त भारत का नारा देने वाला हूँ. और आखिर में आपमुक्त भारत का नारा दे दूंगा. फिर मेरा रास्ता एकदम साफ़. है न मेरी किडनी का कमाल?
वे फिस्स से हँसे और अचानक ही उठ कर चल दिए. मैं उनके साथ एक-एक मुद्दे पर प्रमाण सहित बहस करना चाहता था. मैं उन्हें बताना चाहता था कि वह पूरा सच नहीं है, जो वह दिखाना चाहते हैं. पूरा सच वो है, जो वह दिखाना नहीं चाहते. मैं उनसे यह भी कहना चाहता था कि अगर वाकई आपका सीना छप्पन इंच का है, तो सीना ठोंक कर क्यों नहीं कहते कि आपका यह पूरा अभियान और यह पूरी जद्दोजहद महज़ हिन्दू राष्ट्रवाद के लिए है? आपके लोगों का असली एजेंडा. हिम्मत है तो अपने इस एजेंडे पर वोट मांगिये. जनता खुद-ब-खुद दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी. पर मेरे लाख रोकने के बावजूद वे रुके नहीं. शायद इसलिए भी कि उनको सिर्फ सुनाने की आदत है. सुनने की नहीं. उनको लगता है कि उनकी चाय गैंग ने ट्विटर, फेसबुक और टीवी के परदे पर जो नकली लहरें पैदा कर रखीं हैं, बहसों और तथ्यों की कसौटी पर वे कभी भी शांत हो सकती हैं.
-उठिए, उठिए न. सपने में किससे बतिया रहे थे? पत्नी ने झकझोर कर जगा दिया-उठिए…देखिये न, अखबार में यह क्या निकला है?…अच्छा आपको पता है कि ये यशोदा बेन कौन हैं?

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

भारत भाजपा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद...

-दीप पाठक|| भाग – आठ संस्कृति के नाम पर उन्माद और नेता के नाम पर छिछोरे उन्मादी संघ की यही पूंजी है मोहल्ला स्तर से ब्लाक स्तर तक राज्य से राष्ट्रीय स्तर तक संघ भाजपा के लिए जो नेता चयन करता है वो या तो लचर तुक्कड़ लोकरंजक होते हैं […]
Facebook
%d bloggers like this: