सिर्फ शहरों के बूते नहीं पनपते अखबार..

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-शंभूनाथ शुक्ल||

पत्रकारिता के संस्मरण पार्ट- तीन (गतांक से आगे)
रविवार ही नहीं बगैर ग्रेजुएशन कंपलीट किए सांस्थानिक मीडिया हाउसों में नौकरी मिलने से रही और कालेज जाकर पढ़ाई करने का मन नहीं करता था। वहां जो प्रोफेसर थे वे कभी मेरे साथ पढ़ चुके थे। उम्र करीब २५ साल हो आई थी और पुत्री का पिता भी बन चुका था। फ्रीलांसिंग में पैसा तो था पर स्थायित्व नहीं। इसलिए नौकरी कर लेने की ठानी। मैने एक कहानी लिखी वंश हत्या, जो दैनिक जागरण के साप्ताहिक परिशिष्ट में छपी। यथार्थवादी समानांतर कहानी का युग था। उसके छपते ही हंगामा मच गया और दैनिक जागरण के समाचार संपादक हरिनारायण निगम ने मुझसे पूछा कि नौकरी करोगे? मैने कहा जी तो बोले कि ठीक कल आ जाना। 1781007_775399852473594_2025254014_oअगले दिन उन्होंने मुझे दैनिक जागरण के मालिक संपादक नरेंद्र मोहन जी से मिलवाया। जिन्हें वहां सब मोहन बाबू कहते थे। वहां एक और सज्जन, जो भी शायद कोई शुक्ला ही थे वे टोपी तो नहीं लगाए थे लेकिन अपने कुरते की आधी बाजू समेटे हुए थे, को भी इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। वे श्रीमान शुक्ल जी हाई स्कूल से लेकर एमए हिंदी तक प्रथम श्रेणी में थे तथा पी एचडी कर रहे थे। मोहन बाबू ने मेरे सामने ही उनसे पूछा कि एक निजी कार और टैक्सी में क्या फर्क है? वे बोले- टैक्सी काली-पीली होती है। मोहन बाबू उनके जवाब से खुश नहीं हुए और यही सवाल मुझसे दोहरा दिया। जाहिर है एक जवाब मुझे मिल ही चुका था। और अब उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं था इसलिए मैने कहा कि टैक्सी की नंबर प्लेट सफेद पर उसकी लिखावट काली होती है और प्राइवेट कार की नंबर प्लेट काली पर नंबर सफेद से लिखे जाते हैं। मालूम हो तब तक ऐसा ही होता था। अब तो निजी कार की नंबर प्लेट सफेद और नंबर काले होते हैं। मोहन बाबू खुश और चयन तय। न उन्होंने पूछा कि ग्रेजुएट हो या नहीं न मैने बताया। और यह बात मैने हरिनारायण निगम साहेब को भी नहीं बताई थी। मेरा चयन हो गया पर कार्मिक विभाग ने जब मेरी पढ़ाई लिखाई का ब्यौरा मांगा तो मैने अपने को स्नातक बता दिया। लेकिन डिग्री या माक्र्सशीट कहां से लाऊँ? अंत में मैने वहां पर तब मैगजीन एडिटर विजय किशोर मानव से सलाह ली और न्यूज एडिटर हरिनारायण निगम को सारा किस्सा बता दिया। मोहन बाबू ने कहा कि ठीक है नौकरी चलती रहेगी लेकिन होगी ठेके पर। जब तक स्नातक नहीं कर लेते ग्रेड नहीं मिलेगा। साढ़े चार सौ रुपये महीने की पगार तय हुई। लेकिन यह ठेके की नौकरी मेरे लिए मुफीद हो गई। इसमें न तो कोई हाजिरी का झंझट था न समय का और खूब लिखने-पढऩे तथा फ्रीलांसिंग की पूरी आजादी। यहां तक कि जो कुछ मेरा दैनिक जागरण में भी छपता उसका भी पैसा मिलता। तब मोहन बाबू हर सोमवार को संपादकीय विभाग की एक बैठक करते और कुछ सवाल पूछते जो उसे बता देता उसकी जय-जय। कुछ ऐसा हुआ कि पहली ही बैठक में मोहन बाबू ने पूछा कि बताओ फाकलैंड कहां है? उन दिनों फाकलैंड पर कब्जे को लेकर अर्जेंटीना और ग्रेट ब्रिटेन में युद्ध चल रहा था। मैं चूंकि फ्री लांसिंग के चक्कर में इंडियन एक्सप्रेस घर पर मंगाया करता था इसलिए इस सवाल का जवाब दे दिया। बाकी के सब मुँह ताकते रहे। मोहन बाबू बड़े खुश हुए और मेरा उसी रोज से पचास रुपये महीने मेहनताना बढ़ गया। जब मैं जागरण में भरती हुआ तब दिसंबर १९७९ चल रहा था। अपने राजनीतिक गुरु डॉक्टर जेबी सिंह के आग्रह पर मैने कालेज में एडमिशन ले लिया और १९८१ की जुलाई में मेरा ग्रेजुएशन कंपलीट। लेकिन तब कानपुर विश्वविद्यालय का सत्र इतना लेट चल रहा था कि रिजल्ट आते-आते १९८२ आ गया और तब मुझे मिल पाया दैनिक जागरण में सब एडिटर का ग्रेड। लेकिन इस बीच भले मैं ठेके पर काम करता रहा पर मोहन बाबू और निगम साहेब ने मुझसे हर तरह की रिपोर्टिंग कराई। खूब बाहर भेजा और गांव-गांव जाकर मैने मध्य उत्तर प्रदेश की दस्यु समस्या और गांवों में उभरते नए जातीय समीकरण तथा नए प्रतीकों पर शोध ही कर डाला।
इसी दौरान में मैं मैनपुरी एटा के दस्यु छविराम यादव उर्फ नेताजी से मिला। इटावा के मलखान सिंह से मिला, बाबा मुस्तकीम से मिला। तब तक शायद डकैतों से मिलना आसान नहीं हुआ करता था और डाकुओं के बारे में वैसी ही अफवाहें हुआ करती थीं जैसी कि सुनील दत्त की फिल्में देखकर लोग बनाया करते थे। लेकिन हर डकैत से मैं गांवों के बीचोबीच उनके ठिकानों पर ही मिला और पूरा गांव जानता था कि ये पत्रकार किसके घर जा रहा है। इसके बाद मैने बुंदेलखंड पर ध्यान फोकस किया और वहां की सामाजिक समस्याओं पर लिखा।
एक दिन मैं जागरण के सर्वोदय नगर स्थित दफ्तर से रात करीब नौ बजे निकलकर घर जा रहा था। पैदल ही था और सोचा कि कुछ दूर आई हास्पिटल से टैंपू पकड़ लूंगा। लेकिन दफ्तर से और आई हास्पिटल तक का करीब आधे किमी का रास्ता एकदम सूना और बीच में खूंखार कुत्तों का इलाका था। मैं गेट से निकलकर कुछ ही कदम बढ़ा था कि एक लंबी सी कार मेरी बगल से गुजरी। कार मोहन बाबू की थी। मेरे मन में एक ख्याल कौंधा कि काश मुझे भी इस कार में बैठने का मौका मिले। आश्चर्य कि वह कार अचानक बैक होने लगी और मेरे बगल में आकर रुकी। अंदर मोहन बाबू बैठे थे। उन्होंने खिड़की का सीसा खोला और बोले- अंदर आ जाओ शंभूनाथ। मैं उनकी सौजन्यता से अभिभूत था। मैने कहा नहीं भाई साहब मैं चला जाऊँगा। पर मेरी नकार के बावजूद उन्होंने मुझे कार में बिठा लिया। मैने उनसे कहा कि भाई साहब मेरा गांव यहां से कुल तीस किमी है पर अपना अखबार वहां तीन दिन बाद पहुंचता है। ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए कि अखबार वहां भी रोज का रोज पहुंचे। लोग अखबार पढऩा चाहते हैं। इस एक बात ने पता नहीं क्या असर डाला मोहन बाबू पर कि अगले ही रोज उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि शंभूनाथ कल से तुम कानपुर से लेकर एटा तक और दूसरी तरफ सुल्तानपुर तक और बुंदेलखंड में महोबा तक खूब दौरा करो और स्टोरी निकाल कर लाओ अखबार मैं गांव-गांव पहुंचा दूंगा। और इसके बाद मैं हो गया दैनिक जागरण का रोविंग करस्पांडेंट।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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