अराजकता की ओर एक कदम..

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-मदन मोदी||
संसदीय समिति ने कल सरकारी नौकरियों में रिटायरमेंट की उम्र 60 से बढाकर 65 करने का सुझाव दिया है. समिति ने इसका आधार औसत उम्र बढने को बनाया है. लोकसभा में पेश समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में सीनियर सिटीजन की संख्या लगातार बढ रही है. इसलिए सरकार को रिटायरमेंट की उम्र बढाने पर विचार करना चाहिए. रिटायर्ड व्यक्तियों के लिए री-इम्पलॉयमेंट की व्यवस्था करनी चाहिए. संसदीय समिति का यह सुझाव नोजवानों के साथ बेहद घटिया मजाक है. क्या संसदीय समिति को देश में बेरोजगार युवकों की हालत दिखाई नहीं देती? क्या रिटायर्ड कर्मचारी भूखों मर रहे हैं कि उनके री-इम्पलॉयमेंट का वह सुझाव दे रही है? हर रिटायर्ड कर्मचारी को रिटायर होते समय इतनी ग्रेज्युटी मिलती है कि उसका ब्याज और उसे मिलने वाली पेंशन को जोडा जाए तो वह उसके वेतन से भी अधिक बनता है, फिर संसदीय समिति ऐसी सिफारिश कर युवकों को और पांच साल पीछे क्यों धकेलना चाहती है? क्या युवकों को अपराध और अराजकता की आँधी में धकेलने के लिए?india-unemployment

नेताओं और अफसरों को देश सेवा से कोई सरोकार नहीं, ये कैसे अपनी कुर्सी पर जमे रहें और कैसे अधिकतम धन-सम्पत्ति बटोर सकें, इसी उधेडबुन में ये लगे रहते हैं. सेवा निवृत्ति की आयु पहले 55 साल थी. कर्मचारी रिटायर होता, नौजवान को मौका मिलता. कर्मचारी चूंकि मरते दम तक कुर्सी छोडना नहीं चाहता, इसलिए चालाकी से उसने अपनी सेवा निवृत्ति की आयु बढवा ली. 55 से 57, फिर 58 और फिर 60 साल; अब वह 65 करवाने की जोडतोड में लगा है. इस बीच मर जाएंगे तो बच्चे को अनुकम्पा नौकरी मिल जाएगी, कब्जा बना रहेगा. अपनी वेतन वृद्धियां भी नेता और कर्मचारी आराम से करवा लेते हैं, क्योंकि मंहगाई सिर्फ उन्हीं को सताती है. क्या यह अराजकता को और बढावा नहीं देगा?

नई भर्तियां रोक दी गईं. कर्मचारी कुछ मर-खप गए तो कुछ को रिटायर होना ही पडा, लेकिन नेताओं और कर्मचारियों ने सरकार को इतना दिवालिया कर दिया कि पद रिक्त होने के बावजूद जहां-जहां और जितना नई भर्तियों को टाल सकती थी टालती रही. अब जब सरकारी काम और सरकार लडखडाने लगे तो इन्होंने शोषण का नया फण्डा तैयार किया, जिसने दुष्टता की, निर्दयता की शोषण की सारी हदें लांघ दी है. पिछले 8-10 वर्षों में सरकार ने गैर सरकारी संगठनों के पेटर्न पर संस्थाएं बनाकर काम शुरू किया. जैसे नाको, एड्स कंट्रोल सोसायटी, एनआरएचएम, आदि-आदि. इसमें ऊपर के स्तर पर कुछ सरकारी अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर बैठ गए और नीचे के स्तर पर संविदा के आधार पर मामूली वेतन पर कर्मचारी रखे जाते हैं. अफसर मजे कर रहे हैं, नेताओं को कमीशन देकर घोटाले भी कर रहे हैं, विदेश यात्राएं भी कर रहे हैं और उनकी वेतन वृद्धियां तो रूटीन में हो ही रही हैं. नीचे संविदाकर्मियों की तरफ देखने की जरूरत ही नहीं, चां-चूं करेंगे तो नौकरी से निकाल देंगे. कैसी है यह दुष्ट मनोवृत्ति?

पिछले कई वर्षों से स्थाई कर्मचारियों के वेतन में हर छः माह में मंहगाई भत्ते के रूप में अच्छी खासी बढोतरी होती रही है, किन्तु क्या यह मंहगाई केवल स्थाई कर्मचारियों के लिए ही बढती है? इस मंहगाई से क्या केवल उनके बच्चे ही भूखे मरते हैं? संविदाकर्मियों की हालत का सरकार ने क्यों कभी विचार नहीं किया? क्या असंगठित व्यक्ति को मानवीय गरिमा से जीने का, अपनी उदरपूर्ति का, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने का अधिकार नहीं है? सरकार इस प्रकार का भेदभाव कर क्या संदेश देना चाहती है?
एक आठवीं पास चपरासी से कम वेतन है एक व्याख्याता का. एक क्लीनर (सफाई कर्मी) से कम वेतन है एक डॉक्टर, जिला कार्यक्रम अधिकारी, काउंसलर, नर्स व लेब टेक्नीशियन का. एक दिहाडी मजदूर से कम वेतन है डाटा ऑपरेटर व अकाउन्टेंट का. कारण यह है कि एक स्थाई राजकीय कर्मचारी है और दूसरा संविदा पर, यानी सरकार की और अफसरों की मेहरबानी से ठेके पर काम करने वाला. स्त्री का जैसे देवी कहकर दासी की तरह इस्तेमाल किया जाता है, वैसी ही हालत संविदाकर्मियों की है. बेरोजगारी का सबसे ज्यादा लाभ कोई उठा रहा है तो वह है कल्याणकारी राज्य का दावा करने वाली सरकारें. स्थाई कर्मचारियों की तुलना में संविदा पर रखे गए कर्मचारियों से चार गुना अधिक काम लेकर चौथाई वेतन देना और इस बात का दावा करना कि इतने लोगों को रोजगार दिया जा रहा है. शोषण की यह त्रासदी बहुत भयावह है. अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढाना तो दूर का सपना है, संविदाकर्मी दो वक्त का भोजन भी ठीक से न कर सकें इतनी ही उनकी तनख्वाह है. ये हालात अराजकता फैलाने वाले नहीं हैं क्या? सेवा निवृति की उम्र 65 वर्ष करने पर शोषण का यह दुश्चक्र और नहीं बढ़ेगा क्या?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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