क्या ठगी का धंधा चल रहा है शॉप क्लूज़ पर…

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आज भारत पूरे विश्व में सभी बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए सबसे पसंदीदा बाजार के रूप उभर के सामने आया है. आज हमारे देश में सभी कंपनियां अपना उत्पाद बेचना चाहती हैं और बेचती भी हैं. वर्तमान युग इंटरनेट का है और इंटरनेट की उपयोगिता को इन सभी कंपनियों ने खूब समझा है. लेकिन इंटरनेट की इस शक्ति का इस्तेमाल इन कंपनियों के उत्पाद को बेचने के लिए इनसे ज्यादा अगर किसी ने उपयोग किया है तो वो हैं सामान बेचने वाली वेब साइट्स.ShopClues home

आज आपको इंटरनेट की इस अनंत दुनिया में तमाम ऐसी वेब साइट्स मिल जाएंगी जो कि इन सभी बड़ी-बड़ी कंपनियों का उत्पाद बेचती हैं. मसला केवल सामान बेचने तक का नहीं है, बल्कि आपको जो सामान खुदरा बाजार में 1000 रुपए में मिलेगा, इस प्रकार की सामान बेचने वाली साइट्स आपको वही सामान 300 रुपए में आपके घर तक पहुंचाएगी. अब ऐसे में मन में एक ख्याल आता है कि ऐसा कैसे मुमकिन है कि जो सामान हमें बाजार में 1000 रुपए में मिल रहा है, और वही सामान हमें इस प्रकार की वेब साइट्स बड़े ही औने-पौने दामों में देने का दावा करती है. केवल दावा ही नहीं बल्कि सामान भी देती हैं, पर इनके दामों में इतना अंतर कैसे रहता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि देश में इस प्रकार की सामान बेचने वाली वेब साइट्स ने नकली माल बेच कर लोगों को अपनी ठगी का शिकार बनाना शुरू कर दिया है?

मीडिया दरबार अब इस धंधे के पीछे छूपे राज को सबके सामने लाने की एक कोशिश कर रहा है. मीडिया दरबार ने एक ऐसे ही वेब साइट को खोज के निकाला जो खुद को भारत की अकेली व्यवस्थित मार्केट प्लेस बताने का दावा करती है और यह साइट है “शॉप क्लूज़”. मीडिया दरबार ने जब इस वेब साइट की छान-बीन की तो यह पाया, २०११ में लांच हुई शॉप क्लूज़ ने जल्द मशहूर होने के लिए क्रैकर डील, संडे फ्ली मार्केट और ज़ा ड्रोपिंग डील जैसे ललचा देने वाले ऑफर दिए. इन ऑफ़र में सौ सवा सौ रुपए की वस्तु तीस-चालीस रूपए और उन्नीस या चौबीस रुपए शिपिंग चार्जेज में घर बैठे उपलब्ध करवाना शुरू किया. जो कि अपने वास्तविक मूल्य से आधी से कम कीमत में हासिल होने लगी. शॉप क्लूज़ इन ऑफ़र के ज़रिए ऑनलाइन ग्राहकों के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हो गया और दूरदराज के शहरों में बैठे खरीददार शॉप क्लूज़ से अन्य उत्पाद भी खरीदने लगे.

साठ कर्मचारियों के बूते चल रहे इस पोर्टल पर यकायक इतने खरीददार आ गए कि शॉप क्लूज़ के करता-धर्ताओं से इसे व्यवस्थित रखना ही मुश्किल हो गया. जैसे-जैसे शॉप क्लूज़ की प्रसिद्धि बढ़ी तो कई शहरों से फुटकर विक्रेता भी शॉप क्लूज़ से जुड़ते गए और इनकी संख्या हजारों में जा पहुंची. मगर इन विक्रेताओं पर शॉप क्लूज़ का कोई नियंत्रण नहीं है और इसी का फायदा उठा कर अधिकांश विक्रेता शॉप क्लूज़ से खरीददारी करने वालों को अलग-अलग तरीकों से चूना लगा रहे हैं. इनकी शिकायत करने पर शॉप क्लूज़ द्वारा इन ठग और धोखेबाज़ विक्रेताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं की जाती है. यहाँ तक कि शॉप क्लूज़ पर किसी भी नामचीन कम्पनी के महंगे ब्रांड का नकली सामान बिकना आम बात है.

कुछ ग्राहकों की तो शिकायत यहाँ तक है कि विक्रेता के सेल्स पेज पर स्टॉक में बताया गया उत्पाद उसके पास होता ही नहीं है और आर्डर एकत्र होने के बाद इधर-उधर से उत्पाद का इंतजाम किया जाता है. जो कि सेल्स पेज पर दिखाए गए उत्पाद से परे होता है और क्वालिटी भी घटिया होती है. यही नहीं हमने स्वयं इस वेब साइट से एक सामान मंगवाया जिसका ऑडर संख्या 8265977 को पहले तो प्रोसेस ही नहीं किया गया और जब हमने इसकी शिकायत की तो हमें बताया गया कि हमारा ऑर्डर कोरियर से भेज दिया गया है और तो और हमें एक फर्जी ट्रैकिंग नम्बर भी दे दिया गया. जब इसकी शिकायत की गई तो खुद शॉप क्लूज़ ने माना कि ऐसा हो गया है.
(जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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