थप्पड़ों का रविवार…

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-मदन मोदी||
रविवार को कई जगह थप्पड़ पडे, कुछ जगह वह दिखाई दिए, लेकिन कई जगह उनकी गूंज ही सुनाई दी. कुछ साल पहले इसी प्रकार जूते मारने (फेंकने) का सिलसिला चला था. अमरीका के राष्ट्रपति, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, हमारे देश के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और कई न्यायमूर्तियों पर ये जूते फेंके गए थे, लेकिन इनसे व्यवस्थापकों ने कोई सबक नहीं लिया और न ही इसके मनोविज्ञान को समझकर उन कारणों को दूर करने के प्रयास किए, जिन कारणों की वजह से जूता फेंकने की मानसिकता ने जन्म लिया. इसके विपरीत अपनी सुरक्षा को और चाकचौबन्द कर दिया.slap

AppleMarkअब यह थप्पड़ का सिलसिला चला है. उत्तराखण्ड के नए मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुख्यमंत्री बनते ही अपने कार्यकर्ता को थप्पड़ मारा, यह थप्पड़ कार्यकर्ता को मर्यादा का पाठ पढाने के लिए था, लेकिन रविवार को हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्रसिंह हुड्डा को पानीपत (के मैदान) में उद्घाटन-भाषण-चाटण के दौरान एक रोड शो में नौकरी के अभाव में अवसाद ग्रस्त एक थके-हारे युवक कमल माखिजा ने थप्पड़ रसीद करने का प्रयास किया. पुलिस और हुड्डा समर्थकों ने मरे हुए को खूब मारा.

उधर रविवार को ही दिल्ली के संगम विहार इलाके में एक महिला ने “आप” विधायक दिनेश मोहनिया को पानी के लिए एक महिला ने थप्पड़ मारा. आरोप यह है कि संगम विहार में पानी की किल्लत है, टेंकर माफिया केजरीवाल सरकार द्वारा नकेल कसे जाने के कारण ‘आप’ का दुश्मन बना हुआ है और भाजपा ‘आप’ को किसी तरह विफल करार देने के लिए बेकरार है. तो इस महिला ने भाजपा के उकसावे में बहते पानी में अपना हाथ साफ कर लिया.

जूते फेंकने की घटनाएं हों या थप्पड़ मारने की; यह अराजकता की निशानियां हैं. क्या ये जूते और थप्पड़ हमारी सडी-गली भ्रष्ट व्यवस्था पर नहीं हैं? क्या इन थप्पड़ों के लिए सियासी पार्टियां जिम्मेदार नहीं है? सत्ता हथियाने और सत्ता पर काबिज बने रहने के लिए चाहे जैसी भाषा का इस्तेमाल करना, झूठ बोलना और झूठ को लच्छेदार भाषा में झट-झट व जोर-जोर से बोलना ताकि वह झूठ सच लगने लगे और दूसरे के हृदय को छलनी कर देने वाले शब्दों के तीर चलाना; यह सब क्या इस अराजकता को बढाने वाला नहीं है? इसके विपरीत देश की इस सडी-गली भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने के लिए आम आदमी में से कुछ लोग आगे निकल कर आएं तो अपने आपको सुधारने की बजाय उन पर अराजकता की तोहमद लगाकर उन्हें कुचलने, पीटने और पिटवाने के लिए रोज चीरहरण, चरित्र हनन को कोई नया दांव चलना, पुराने गडे मुर्दे उखाडकर लाना, बौखला जाना और उन्हें तोडने का प्रयत्न करना ताकि जनता अपनी सत्ता की जागीर कहीं अपने हाथ में न लेले; क्या सियासी पार्टियों का यह तमाशा अराजकता को और बढावा नहीं देगा?

एक आठवीं पास चपरासी से कम वेतन है एक व्याख्याता का. एक क्लीनर (सफाई कर्मी) से कम वेतन है एक डॉक्टर, जिला कार्यक्रम अधिकारी, काउंसलर, नर्स व लेब टेक्नीशियन का. एक दिहाडी मजदूर से कम वेतन है डाटा ऑपरेटर व अकाउन्टेंट का. कारण यह है कि एक स्थाई राजकीय कर्मचारी है और दूसरा संविदा पर, यानी सरकार की और अफसरों की मेहरबानी से ठेके पर काम करने वाला. स्त्री का जैसे देवी कहकर दासी की तरह इस्तेमाल किया जाता है, वैसी ही हालत संविदाकर्मियों की है. बेरोजगारी का सबसे ज्यादा लाभ कोई उठा रहा है तो वह है कल्याणकारी राज्य का दावा करने वाली सरकारें. स्थाई कर्मचारियों की तुलना में संविदा पर रखे गए कर्मचारियों से चार गुना अधिक काम लेकर चौथाई वेतन देना और इस बात का दावा करना कि इतने लोगों को रोजगार दिया जा रहा है. शोषण की यह त्रासदी बहुत भयावह है. अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढाना तो दूर का सपना है, संविदाकर्मी दो वक्त का भोजन भी ठीक से न कर सकें इतनी ही उनकी तनख्वाह है. ये हालात अराजकता फैलाने वाले नहीं हैं क्या?
ऐसे ही एक कमल मुखिजा ने मुख्यमंत्री को थप्पड मारने के लिए हाथ उठा दिया तो इस हालत के लिए आप जिम्मेदार किसे ठहराएंगे? मैं इस प्रकार की हिंसा या अराजकता के सख्त खिलाफ हूं और ऐसी घटनाओं की भर्त्सना करता हूं; किन्तु इसके लिए जिम्मेदार कौन है, यह तय होने का वक्त अब आ गया है. सियासी पार्टियां नफरत की राजनीति करने, जहर की खेती करने और जहर चखने व आरोप-प्रत्यारोप करने में ही मशगूल हैं. यह आम आदमी के दर्द, रोष और अराकता का इलाज नहीं, बल्कि यह तो इस दर्द, रोष और अराजकता को बढाने वाला ही है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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