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-मदन मोदी||
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने आज विभिन्न राजनीतिक दलों में भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं की सूची बनाते हुए घोषणा की कि इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनावों में अपने सशक्त उम्मीदवार खडे करेगी और इन्हें चुनावों में पटखनी देने का प्रयास करेगी, ताकि संसद की गौरव-गरिमा को बहाल किया जा सके.kejriwal_reuters_360x270_12

भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं की इस सूची में उन्होंने कांग्रेस, भाजपा, एनसीपी, समाजवादी पार्टी, बहुजन पार्टी आदि के बडे नेताओं नितिन गडकरी, सुरेश कलमाड़ी, वीरप्पा मोइली, सुशील कुमार शिंदे, पी, चिदंबरम, अलागिरी, कनिमोई, सलमान खुर्शीद, मायावती, मुलायम सिंह यादव, श्रीप्रकाश जायसवाल, जगनमोहन रेड्डी, कपिल सिब्बल, कमलनाथ, अनुराग ठाकुर, पवन बंसल, फारूक अब्दुल्ला सहित कई अन्य नेताओं का नाम लेते हुए कहा कि आगामी लोकसभा चुनावों में इन नेताओं को हराना जरूरी है. उन्होंने कहा कि इस सब पर भ्रष्टाचार के दाग है. उन्होंने कहा कि अभी और नेताओं की सूची तैयार की जा रही है. इससे सभी पार्टियों में एकदम से खलबली मच गई और कई नेता बौखलाकर इलेक्ट्रानिक मीडिया के केमरों पर अपनी खीज प्रकट करते हुए दिखाई दिए. इन नेताओं की बॉडी लेंग्वेज से ही लग रहा था कि ये बुरी तरह तिलमिला उठे हैं और चोट खाई नागिन की तरह फुफकारने लगे हैं.

दूसरी ओर राजनीतिक दलों की शह पर बिजली कंपनियां दिल्ली में बिजली कटौती की धमकी देकर लोगों में भ्रम व भय पैदा करने की कोशिशें कर रही हैं. ये कम्पनियां भी बिजली के दामों में कटौती और इनकी सीएजी ऑडिट से तिलमिलाई हुई हैं. बिजली कम्पनियों ने न्यायालय के दरवाजे भी खटखटाए, ताकि सीएजी ऑडिट को रोका जा सके, किन्तु न्यायालय ने कोई भी राहत देने से इन्कार कर दिया, बल्कि ऊपर से दिल्ली सरकार के सीएजी ऑडिट के फैसले को सही ठहराया है. यदि आप चोर नहीं हैं तो ऑडिट से क्यों घबरा रहे हैं और बिजली कटौती की धमकी देकर अब ब्लेकमेल की कोशिश क्यों कर रहे हैं? माना जा रहा है कि इसके लिए उन्हें भाजपा व कांग्रेस उकसा रही है, ताकि बिजली कटौती हो तो लोगों का “आप” से मोहभंग हो. लेकिन केजरीवाल डटे हुए हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि यदि बिजली कटौती हुई तो लाइसेंस रद्द होगा.
निजी स्कूलों में भी भारी खलबली है, क्योंकि आज उच्चतम न्यायालय ने और इससे पहले उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार के फैसलों के खिलाफ रोक से इन्कार कर दिया है. पानी का टेंकर माफिया पहले ही खफा है. इस प्रकार एक के बाद एक ‘आप’ की दिल्ली सरकार के फैसलों से दिल्ली की अधिकांश आबादी खुश है और बल्ले-बल्ले कर रही है, वहीं सियासी पार्टियां मातम की मुद्रा में प्रलाप कर रही हैं. लोकतंत्र के लिए यह अच्छा संकेत है.

अस्थाई स्टेट ट्रांसपोर्ट कर्मियों और संविदा पर काम करने वाले शिक्षकों ने अपने धरने उठा लिए हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा हो गया है कि ‘आप’ की सरकार उन्हें स्थाई करने के लिए जरूरी कदम उठा रही है. मंत्रियों ने इन हडतालियों को सारी फाइलें दिखा दी है कि किस प्रकार उन्हें स्थाई करने की कार्यवाही आगे बढ रही है.
अन्य सियासी पार्टियों के लोग कोई माने या न माने ‘आप’ के भय से दिल्ली में निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर अंकुश तो लगा ही है और एक माह में आप ने जितने भी काम किए हैं, वे कतई कम नहीं हैं. इतने काम करने में तो अब तक सरकारें वर्षों का समय लगाती रही हैं. अब हर आम आदमी का विश्वास ‘आप’ पर बढने लगा है और लोग मानने लगे हैं कि ‘आप’ को अब वक्त और अवसर देना चाहिए. इससे रोज ‘आप’ का चीर हरण करने पर उतारू भाजपा की हवा सबसे ज्यादा खराब हो रही है, क्योंकि उसने ‘आप’ को उलझाने और उसी के चक्रव्यूह में फंसाने की बहुत कोशिशें की है.

मैं पहले ही लिख चुका हूं कि दिल्ली में पहले दिन से ही “आप” का चीरहरण करने और ‘आप’ को कोसने की बजाय भाजपा को ‘इंतजार करो और देखो’ की नीति अपनानी चाहिए थी. ‘आप’ पर जितना आक्रमण किया जाएगा, जितना कोसा जाएगा, ‘आप’ का ग्राफ उतना ही ऊपर उठता जाएगा. नरेन्द्र मोदी का ग्राफ तेजी से ऊपर उठा, उसका कारण भी यही रहा कि कांग्रेस और अन्य दलों के लोग बराबर उन्हें कोसते रहे और कई प्रकार की जांचों में उन्हें घेरने की कोशिशें करते रहे. केवल तीसरी बार गुजरात में भाजपा की सरकार बना लेने के कारण उनकी लोकप्रियता इतनी नहीं बढी. ऐसा होता तो माकपा के ज्योति बसु ने प. बंगाल में सात बार लगातार राज किया, फिर वे कभी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की स्थिति में क्यों नहीं आए, क्योंकि वे कभी विवादास्पद नहीं बने, उन्हें इस प्रकार कोसा नहीं गया, उन्हें दूसरी पार्टियों ने कभी आयोगों और जांचों के दायरे में खडा नहीं किया. जनता पार्टी का अधःपतन और इन्दिरा गांधी का पुनः प्रचण्ड बहुमत से अभ्युदय भी एक मिसाल है. कांगेस और भाजपा ने दिल्ली चुनावों के दौरान ‘आप’ की खूब खिल्ली उड़ाई थी, परिणाम सामने है. अब बौखलाने या तिलमिलाने से कुछ नहीं होगा.

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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