एक पुरूष ने मेरी जिंदगी को बर्बाद किया और दूसरा पुरूष इसे संवार रहा है…

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-आकांक्षा सक्सेना||

आठ साल पहले लक्ष्मी की ज़िंदगी में वो घटना घटी जिसने न सिर्फ़ उनकी दुनिया को बदल दिया बल्कि वो पुरूषों से नफ़रत भी करने लगीं.

ये अप्रैल का महीना था जब राजधानी दिल्ली में वो उस बुक स्टोर पर जा रही थीं जहां वो पार्ट टाइम काम किया करती थीं.140123140013_laxmi1

तभी भीड़भाड़ वाली सड़क पर कोई पीछे से आया और उसने लक्ष्मी के कंधे पर हाथ रखा, जैसे ही लक्ष्मी ने पलट कर देखा, तो उस व्यक्ति ने उनके चेहरे और गले पर कुछ तरल पदार्थ फेंका.

उन पर तेज़ाब फेंका गया था. लक्ष्मी बताती हैं, “पहले तो मुझे ठंडा सा लगा. फिर बड़ी ज़ोर से जलन होने लगी. फिर उस तरल पदार्थ ने मेरी त्वचा को गलाना शुरू किया.”

तेज़ाब फेंकने वाला 32 वर्ष का एक व्यक्ति था जो इस बात से नाराज़ था कि लक्ष्मी ने शादी करने के लिए उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. लक्ष्मी की उम्र उस वक्त 15 वर्ष थी.

वो बताती हैं, “इसके बाद मैं लंबे समय तक पुरूषों से नफ़रत करती रही.”

‘खोखले शब्द’

लक्ष्मी कहती हैं, “प्यार शब्द को मैं कभी समझ ही नहीं पाई थी. प्यार की वो परिभाषा जो बॉलीवुड फिल्मों में दिखाई जाती है, उससे मुझे भय होता था. मैं प्रेम भरे गीत गाया करती थी लेकिन उनके शब्द मेरे लिए खोखले थे.”

उनका ये नज़रिया तब तक रहा, जब तक वो आलोक दीक्षित से नहीं मिली थीं. आलोक दीक्षित कानपुर के रहने वाले हैं और पत्रकार रह चुके हैं.

लक्ष्मी की हमले से पहले की तस्वीर जब वो 15 साल की थीं
लक्ष्मी की हमले से पहले की तस्वीर जब वो 15 साल की थीं

उनकी मुलाकात लक्ष्मी से तेज़ाब हमलों को रोकने की एक मुहिम के दौरान हुई और फिर उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया.

अब ये दोनों दिल्ली के पास एक इलाके में रहते हैं और अपने छोटे से दफ्तर से मिल कर तेजाब हमलों के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहे हैं.

लक्ष्मी की हमले से पहले की तस्वीर जब वो 15 साल की थीं
उनकी इस मुहिम से तेज़ाब हमलों की लगभग 50 पीड़ित जुड़ी हुई हैं. लक्ष्मी इस मुहिम का चेहरा है जो एसिड अटैक की पीड़ितों को मदद और आर्थिक सहायता मुहैया कराती है.

लक्ष्मी बताती हैं, “आलोक मेरे लिए ताज़ा हवा के झोंके की तरह थे. मैं बहुत घुटन और बोझ महसूस कर रही थी. मैंने महसूस किया कि वो मेरे साथ इस बोझ को मिल कर उठाने के लिए तैयार हैं.”

25 वर्षीय आलोक दीक्षित अपनी नौकरी छोड़ कर इस मुहिम से जुड़े हैं. वो कहते हैं कि आपसी सम्मान और एक साथ रहने की भावना प्यार में महकती है.

वो कहते हैं, “मैं लक्ष्मी का बहुत अधिक सम्मान करता हूं. वो बहुत ताक़त देती हैं. उन्होंने मुश्किल हालात में भी लड़ने का फैसला किया जबकि उनके जैसी बहुत सी पीड़ित महिलाओं का साथ उनके परिवार वाले ही नहीं देते हैं या फिर वो ख़ुद ही अपने घरों से निकलना नहीं चाहती हैं.”

आलोक दीक्षित बताते हैं, “उन्होंने दूसरी पीड़ित महिलाओं को भी आत्मविश्वास दिया है जो उन्हें उम्मीद की किरण के तौर पर देखती हैं. लक्ष्मी ने इन महिलाओं को घर से बाहर निकलने की ताक़त दी है. लेकिन कहना होगा कि इन महिलाओं के लिए बाहर निकलना आसान नहीं होता है, लोग उन्हें घूरते हैं.”

‘प्रिंस चार्मिंग’

लक्ष्मी बताती हैं कि उन्होंने आलोक की रोज़मर्रा की जिंदगी में कई रंग जोड़े हैं, ख़ास कर उनके कपड़ों में.

वो बताती हैं, “आलोक बहुत ही नीरस कपड़े पहनते थे. मैंने उनके कपड़ों को पहले से ज़्यादा रंग दिए हैं. उन्होंने हाल ही में सिंड्रेला फिल्म देखी. इससे पहले उन्होंने कभी सिंड्रेला के बारे में नहीं सुना था. मैंने उन्हें बताया कि वही मेरे प्रिंस चार्मिंग हैं.”

एक सवाल जो अकसर इन दिनों लक्ष्मी और आलोक से पूछा जाता है, वो है – क्या वो शादी करेंगे.

आलोक कहते हैं, “हम साथ रहेंगे लेकिन शादी नहीं करेंगे. हम सामाजिक प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, चाहे वो शादी हो या फिर हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाला बर्ताव. हम ख़ुद कैसे इसका हिस्सा बन सकते हैं?”

हालांकि लक्ष्मी को विश्वास है कि किसी न किसी दिन वो शादी के बंधन में बंधेंगे.

वो कहती हैं, “मैं आलोक के फ़ैसले का सम्मान करती हूं और इसका पालन करती हूं. लेकिन कहीं न कहीं मुझे उम्मीद है कि हमारी दोस्ती और प्यार धीरे धीरे शादी की तरफ़ जाएगा.”

लक्ष्मी के लिए अपना प्यार पाने का सफर आसान बिल्कुल नहीं था.

तेज़ाब हमले की पीड़ित
तेज़ाब हमले ने उनके चेहरे को बिगाड़ दिया था. उन्हें कई कष्टदायक ऑपरेशनों से गुज़रना पड़ा जिससे न सिर्फ उन्हें बेहद कमज़ोरी आई बल्कि उनके परिवार की आर्थिक हालत भी पूरी तरह खस्ता हो गई.

मुश्किल हालात

पिछले साल उनके पिता बीमार पड़े गए जिसके बाद उनका निधन हो गया. उनके पिता कुक का काम करते थे और परिवार का गुज़ारा चलाते थे. पिता की मौत के बाद उनके भाई को टीबी हो गई.

घर चलाना लगातार मुश्किल बना हुआ है. उनकी मां के पास कभी कभी इतने पैसे भी नहीं होते कि वो रसोई गैस ख़रीद सकें.

लक्ष्मी ही अकेली कमाने वाली हैं और उनकी आमदनी का भी कोई स्थायी ज़रिया नहीं है क्योंकि तेज़ाब हमला विरोधी उनकी मुहिम मुख्यतः दान से मिले पैसे से ही चलती है.

लेकिन ये सब हालात भी लक्ष्मी को अपने इरादों के लिए संघर्ष करने से नहीं रोक पाते हैं.140123140009_laxmi3

पिछले साल उनकी तरफ़ से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी क्लिक करें राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वो तेज़ाब की बिक्री के लिए नीति तैयार करें.

लक्ष्मी कहती हैं, “मैं तेज़ाब हमले की अन्य पीड़ितों के संपर्क में आई. मैंने सोचा कि ये ठीक नहीं है कि तेज़ाब यूं ही कहीं भी उपलब्ध हो. कोई भी इसे ख़रीद सकता है. इससे तो महिलाओं के लिए ख़तरा पैदा होता है.”

“हम साथ रहेंगे लेकिन शादी नहीं करेंगे. हम सामाजिक प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, चाहे वो शादी हो या फिर हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाला बर्ताव. हम ख़ुद कैसे इसका हिस्सा बन सकते हैं?”
आलोक दीक्षित, लक्ष्मी के साथी

अब आलोक दीक्षित और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर लक्ष्मी ने लोगों में जागरुकता पैदा करने के लिए एक मुहिम छेड़ी है ताकि हमले की स्थिति में वो हस्तक्षेप कर उससे बेहतर तरीके से निपट सकें.

जीने की वजह

लक्ष्मी कहती हैं कि आलोक ने उन्हें एक मूल्यवान ज़िंदगी जीने की वजह दी है.

वो कहती हैं, “जिस दिन मुझ पर तेज़ाब फेंका गया तो मेरी मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आया. मुझे याद है कि वहां जितने भी लोग थे मैं उनसे मदद मांगती रही लेकिन कोई आगे नहीं आया.”

लक्ष्मी के अनुसार, “तेज़ाब की वजह से मैं देख नहीं पा रही थी और पास ही सड़क से गुज़रने वाली गाड़ियों से मुझे टक्कर भी लगी. लेकिन लोगों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था. अगर मुझे समय पर अस्पताल पहुंचा दिया जाता तो मैं इतनी ज़्यादा नहीं चलती.”

लक्ष्मी का कहना है कि आलोक उनकी सेहत का ख़्याल रखते और उनकी ‘विशेष ज़रूरतों’ को अच्छी तरह समझते हैं.

तेज़ाब हमले के बाद जिंदगी बिल्कुल भी आसान नहीं होती. उनकी त्वचा को जहां लगातार संक्रमण का जोखिम बना रहता है, वहीं उनकी मनस्थिति भी बदलती रहती है.

वो कहती हैं, “एक पुरूष ने मेरी जिंदगी को बर्बाद किया और दूसरा पुरूष इसे संवार रहा है. आलोक ने मुझे मूल्यवान जिंदगी जीने और व्यक्ति के तौर पर आगे बढ़ने की वजह दी है.”

(बीबीसी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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