मीडिया की कृपणता…

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-राजेंद्र बोड़ा||

जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल के शुरू होने के दिन के समाचारों से आज के अखबार भरे पड़े हैं. पूरे चार-चार पेजों पर इस फेस्टिवल की चित्रमय झांकी पसरी पड़ी है. इन्हीं अखबारों में काम करने वालों ने दो दिन पहले जोधपुर में कवि, अभिनेता और रंगमंच के कलाकार सज्जन की याद में हुए समारोह को खबर लायक ही नहीं समझा. मीडियाकर्मियों का यह दोहरा चरित्र आम हो चला है.और मीडियाकर्मियों ऐसा चरित्र बाज़ार घड़ रहा है.

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जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल की खबरें बेचने के लिए विशाल बजट वाली विज्ञापन एजेंसी, जिसे पीआर एजेंसी के सभ्य नाम से जाना जाता है, अति सक्रिय है. जोधपुर के समारोह का समाचार कौन बेचे?

कोई कह सकता है लिट्रेचर फेस्टिवल में बड़े नामवर लोग आए हैं. तो भाई आधुनिक उर्दू शाइरी का अग्रिम पंक्ति का नाम शीन काफ निज़ाम और दुनिया में फोटोग्राफी जगत के सबसे ऊंचे नामों में से एक ओ पी शर्मा जैसे लोगों ने भी तो जोधपुर के समारोह में शिरकत की थीं. फिर मीडियाकर्मियों ने भेद क्यों किया? क्या पाठक की थाली में वही परोसा जाएगा जो पीआर एजेंसियों के जरिये बाज़ार चाहेगा?

फोटो सौजन्य: मनोज  बोहरानीचे चित्र में जोधपुर के सज्जन स्मृति समारोह की शुरुआत करते हुए शायर शीन काफ निज़ाम, फोटोग्राफर ओपी शर्मा, लेखक सत्य नारायण और आईदान सिंह भाटी.साथ में पूरा भरा सभागार.

 

literature festival

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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