बदले-बदले से हैं सुशील कुमार शिंदे के बोल..

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-हरेश कुमार||
जब से गृहमंत्री – सुशील कुमार शिंदे को लगने लगा है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष, राहुल गांधी लोकसभा चुनावों में पार्टी की फजीहत से बचने के लिए आदर्श घोटाला में शामिल नौकरशाहों सहित पूर्व मुख्यमंत्रियों पर कड़ी कार्यवायी कर सकते हैं, तभी से गृहमंत्री, शिंदे साहब के बोल बदले-बदले नज़र आने लगे हैं. अब उन्हें शरद पवार अच्छे लगने लगे हैं और महाराज अपने पुराने दिनों को याद करने लगे हैं. गौरतलब है कि शरद पवार ने ही उन्हें पहली बार कोल्हापुर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया था. वरना ये कांस्टेबल से ज्यादा से ज्यादा तरक्की करके एक-दो पोस्ट और पा लेते. आज वे कह रहे हैं कि 1992 में शरद पवार अगर प्रधानमंत्री बनते तो उन्हें अच्छा लगता, यह बात इतने दिनों से क्यों नहीं बोल रहे थे. जब शरद पवार ने सोनिया गांधी को पीएम बनाए जाने के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर लोकसभा अध्यक्ष रह चुके पीए संगमा के साथ मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाई, (हालांकि वे फिर से उन्हीं सोनिया गांधी के साथ आ गए, जिनका विरोध करते हुए वे अलग हुए थे) तो शिंदे कांग्रेस में रह गए और अनुसूचित जाति का होने के कारण अभी तक मलाई मारते रहे हैं। कांग्रेस ने शिंदे को हमेशा अनुसूचित कार्ड के तौर पर इस्तेमाल किया. सबको मालूम है कि शिंदे कितने योग्य राजनीतिज्ञ हैं. इनके बिजली मंत्री रहते देश में उत्तरी ग्रिड की बिजली फेल हो गयी लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इनकी चापलूसी (गांधी परिवार के चरण में पूर्व की सेवाओं) को देखते हुए इन्हें सजा देने के बजाये देश का गृहमंत्री बना दिया. इतना ही नहीं कांग्रेस ने इन्हें देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का मुख्यमंत्री भी बनाकर उपकृत करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा था.sushil kumar shinde
अपने देश में एक कहावत है – का पर करूं श्रृंगार कि पिया मोर आन्हर रे। कहने का अर्थ कि देश की जनता अपना दुखड़ा किससे रोए, सारे दल और उसके नेता व संगठन भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और यह बात हाल ही में देश के गृह मंत्री और विभिन्न पदों पर कार्यरत वरिष्ठ कांग्रेसी नेता – सुशील कुमार शिंदे के उस बयान से जाहिर हो जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि इस देश की जनता घोटालों को जल्द ही भूल जाती है जैसा कि वो बोफोर्स घोटाले को भूल गई.

वैसे भी गृहमंत्री शिंदे का नाम अक्सर किसी न किसी कारण सुर्खियों में बना ही रहता है. हाल के दिनों में जब भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार मोदी की रैली के निकट ही पटना के रेलवे स्टेशन, करबिगहिया और गांधी मैंदान में इंडियन इस्लामिक के सदस्यों के द्वारा बम धमाकों से पूरा देश सहम गया था तो ठीक कुछ देर के बाद गृहमंत्री मुंबई में कंगना रानावत की एक फिल्म- रामलीला का म्यूजिक लॉन्च करने में व्यस्त थे। जब देश के नागरिकों को राजनीतिज्ञों से उम्मीदें होती हैं तो ये अक्सर सामने नजर नहीं आते हैं. दुम दबाकर भाग खड़े होते हैं. ऐसे निकम्मे लोग हमारे देश के सबसे संवेदनशील पद पर बैठे हुए हैं. जैसा कि सभी को पता है कि देश में नक्सली और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद तथा उत्तर-पूर्व हिस्से में अशांति की स्थिति हो गई है, ऐसे में गृहमंत्री जैसे पद की गरिमा को भूलकर शिंदे मस्ती में व्यस्त हैं.

यह बिडंबना ही है कि हमारा देश चारों तरफ से ऐसे देशों से घिरा हुआ है जहां कुशासन का बोलबाला है. एक तरफ, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और नेपाल तथा मालदीव जैसा अशांत देश है तो दूसरी तरफ चीन जैसा विस्तारवादी कम्युनिस्ट देश भी है, जो हमेशा अपनी सीमाओं के विस्तार के लिए प्रयासरत रहता है. पाकिस्तान, मालदीव, म्यामांर से लेकर श्रीलंका तक वो भारत को घेर चुका है तो कभी भारत के घनिष्ठ मित्र रहे नेपाल में भारत के खिलाफ वहां की फ़िजा में जहर घोल चुका है. इस साल अफगानिस्तान से अमेरिका के नेतृत्व में नाटो सैनिकों के वहां से चले जाने के बाद पाकिस्तान की निगाह चीन के साथ मिलकर वहां ऐसी सरकार का निर्माण कराना है जो उसके इशारों पर नाच सके. और इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अफगान के राष्ट्रपति, हामिद करजई के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ गई है और वे चाहते हैं कि भारत इस क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी को समझें. गौरतलब है कि अफगानिस्तान में मूलभूत सुविधाओं के विकास में भारत का बहुत कुछ दांव पर लगा है और अगर वहां फिर से तालिबान के नेतृत्व में नई सरकार सत्ता में आई या करजई सरकार को कुछ हुआ तो इन सब पर पानी फिर जायेगा. सो भारत के कूटनीतिज्ञों को कुछ भी करने से पहले सोच-समझकर कदम उठाना होगा. वरना कहीं ऐसा ना हो जाये कि हम हाथ आये एक और मित्र देश को हाथ से खो बैठे.

वैसे भी कहावत है कि राजनीति में ना तो कोई स्थायी दोस्त होता है और ना ही स्थायी दुश्मन यानि कि अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार, जब चाहे राजनीतिज्ञ पार्टी और निष्ठा बदलने के लिए स्वतंत्र होते हैं. और इनके पास जवाब भी अनोखे होते हैं. आप देख सकते हैं कि किस तरह से बिहार में रामविलास पासवान और नीतीश कुमार के बीच अंदरखाने में खिचड़ी पक रही है, जरूरी नहीं कि यह परवान चढ़ ही जाये. क्योंकि नीतीश कुमार को जब बिहार के मुख्यमंत्री की गद्दी मिली थी तो इस पर कड़ा ऐतराज करते हुए रामविलास पासवान ने लोकजनशक्ति पार्टी का गठन किया था फिर पासवान ने उन्हीं लालू प्रसाद यादव के साथ गठजोड़ किया जिन्हें वे कभी भरी सभाओं में ललकारा करते थे. आगे चलकर यह रिश्ता और मजबूत हुआ, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में जब राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस औऱ लोकजनशक्ति पार्टी में सीटों का तालमेल सही नहीं हुआ तो इन तीनों ही पार्टियों को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ. लोजपा का तो एक तरह से सूपड़ा ही साफ हो गया. कहां पासवान के हर संबंधी विधान सभा, विधान परिषद से लेकर लोक सभा में पहुंच रहे थे तो उन्हें खुद जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास से हार का मुंह देखना पड़ा. समय-समय की बात है. कभी जिसने लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जीत के अंतर के कारण अपना नाम दर्ज कराया हो, वक्त ने ऐसी पटखनी दी कि वो जमीनी धरातल पर आ गए. आज फिर से लालू प्रसाद यादव के द्वारा तरजीह नहीं देने के कारण मुंह फुलाये बैठे हैं और जेडीयू से तालमेल का संकेत दे रहे हैं. लेकिन राजद को भी राजनीतिक हिसाब-किताब का अच्छा अंदाजा लग चुका है, सो वह भी अपने पुराने सहयोगी को छोड़ना नहीं चाहती है. तो दूसरी तरफ जेडीयू, कांग्रेस के साथ संभावित गठजोड़ के खत्म होते और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने को ठंडे बस्ते में जाने पर एक नया राजनीतिक फ्रंट बनाने को बेचैन है और वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, ममता बनर्जी, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, बाबूलाल मरांडी सहित ओडिसा के मुख्यमंत्री, नवीन पटनायक से बात कर रही है.
हाल तक मोदी को समर्थन देने वाली तमिलनाडु की मुख्यमंत्री, जयललिता ने एक नया संकेत दे दिया है. वह खुद पीएम पद का उम्मीदवार बनना चाहती है, तो मोदी को एक और झटका महाराष्ट्र से लगा है और वह है महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष, राज ठाकरे द्वारा यह कहना कि मोदी को गुजरात के अलावा पूरे देश के बारे में सोचना चाहिए और सबसे पहले गुजरात के सीएम पद से इस्तीफा देना चाहिए, हो सकता है कि वे अपने लिए कुछ अधिक सीट चाहते हों क्योंकि उन्हें मालूम है कि आगे चलकर शिवसेना के उद्धव ठाकरे उनसे कहीं राजनीतिक बाजी ना मार ले जायें.

अतीत में, नीतीश कुमार ने भी सत्ता का लाभ लेते हुए रामविलास पासवान के दलित जाति के वोट बैंक को तोड़कर महादलित का एक अलग नया मोर्चा खोल दिया और राज्य सरकार की तरफ से इस जाति के उत्थान के लिए एक पर एक घोषणायें शुरू कर दी. इनका एकमात्र मकसद अपने लिए अधिक से अधिक सुरक्षित और ज्यादा वोट बनाना था, जिससे आगे चलकर पीएम पद पर अपनी दावेदारी को पेश कर सकें. नीतीश कुमार की इसी महात्वाकांक्षी के कारण जेडीयू और भाजपा का 17 वर्षों पुराना गठबंधन एक ही झटके में टूट गया वरना गोधरा कांड के बाद भी उन्हें मोदी में कोई कमी नजर नहीं आ रही थी और वे भाजपा की कृपा से ही रेल मंत्री का पद पा सके थे. नीतीश कुमार के अपनी जाति के वोट – कुर्मी-कोयरी की सहायता से अपने द्वारा पूर्व में अपने द्वारा गठित समता पार्टी को मात्र सात सीटों पर जीत दिला सके थे और तभी लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेगा बिहार में लालू, लेकिन वे बिहार की जनता और अपने कुशासन तथा एकमात्र अपहरण उद्योग और परिवारवाद के कारण जनका की नाराजगी के कारण बिहार की सत्ता से हाथ धो बैठे. इनके बाद में, पश्चिम बंगाल में, तीन दशकों से अधिक समय से चल रहा कम्युनिस्ट पार्टी का शासन भी चला गया. लेकिन नेता सब हैं कि जनता की नब्ज को पहचान ही नहीं रहे या जानबूझकर पहचानने से इनकार कर रहे हैं. अभी हाल ही में एक साल पहले गठित हुई आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा के चुनावों में सभी राजनीतिक पंडितों को भौंचक्का करते हुए शानदार प्रदर्शन किया है, और इसकी सफलता को देखते हुए हर पार्टी दिखावा के तौर पर ही सही अपने-अपने कार्यकलाप में बदलाव ला रही है. आने वाले समय में इसकी झलक सभी को देखने को मिलेगी. छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश में हाल में फिर से सत्ता में आई भाजपा ने इसका इशारा दे भी दिया है तो संघ प्रमुख भागवत ने भाजपा को आम आदमी पार्टी से सबक सीखने और इसे हल्के में ना लेने की अपील की है. हाल तक मोदी की सभाओं में लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे, लेकिन आआपा (आम आदमी पार्टी) के कारण पार्टी को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है. इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि दिल्ली के चुनाव परिणम ने सभी राजनीतिक दलों और इसके रणनीतिकारों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है. देखते हैं आने वाला समय क्या-क्या नया गुल खिलाता है. समय के साथ कितने राजनीतिक गठबंधन बनेंगे और कितने टूटेंगे.
और अंत में –
समाजवादी पार्टी के द्वारा शासित उत्तर प्रदेश के सैफई महोत्सव की अगर चर्चा ना की जाये तो फिर राजनीति की चर्चा अधूरी रह जायेगी. एक तरफ हाल में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से प्रदेश के लोग उबरे भी नहीं थे कि मुलायम सिंह के गांव, सैफई में फिल्मी हस्तियों के नाच-गान ने देश-दुनिया का ध्यान गलत कारणों से ही सही अपनी ओर खींचने में कामयाबी पाई. इसे ही कहते हैं कि जब रोम जल रहा था तो वहां का शासक नीरो चैन की बांसुरी बजा रहा था तो उसी उल्टा प्रदेश के विधायक और मंत्री विदेश में अध्ययन के बहाने दौरे कर रहे हैं. प्रदेश में कुशासन और विदेश में दौरे. इस खेल में हर पार्टी के नेता शामिल हैं. हाल ही में कर्नाटक के मंत्री और विधायक भी विदेश दौरे से कथित तौर पर अध्ययन करके आये हैं. देश के लोग महंगाई और नेताओं की कारस्तानी से परेशान हैं तो किसान को उसकी फसलों की उचित कीमत नहीं मिल रही है और नेताजी अपनी मस्ती में गुल हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “बदले-बदले से हैं सुशील कुमार शिंदे के बोल..

  1. hakikt y hai ki ab congress ki lootiya dhubnewaali hai aur sabhi ek ek kar ke congress ko chhod kar jaanaa chahte hai .bhrshtachar y sab karte hai aur bdnaam rahul ji aur sonia ji ko karte hai .

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