अपनी-अपनी राजनीति, अपनी डफली-अपना राग..

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-हरेश कुमार||

हमारा देश भी कितना अजीब है और हमारे नेताओं के क्या कहने! सारे एक से बढ़कर एक जम्हूरे! बिल्कुल सर्कस के जोकर (हम यहां अपवादों की बात नहीं कर रहे हैं.) की तरह इन्होंने देश की राजनीति को बना कर रख दिया है. वैसे इन राजनीतिज्ञों की मानें तो ये सब उनके विरोधियों की करतूतें होती है, विरोधी उनके अच्छे-भले सामाजिक कार्यों जैसे ठेका से लेकर विकास योजनाओं में मिलने वाले कमीशन से जलते-भुनते हैं, वैसे विराधियों को भी जहां मौका मिलता है, वे मौके की नजाकत को भांपते हुए चौका मारने से नहीं चूकते हैं.neta

नेताजी का कहना है कि हमारे विरोधी नहीं चाहते हैं कि जनता को अच्छा सेवक मिले, सो समय-समय पर उनके बारे में गलतफहमियां पैदा करते रहते हैं. इन सबमें कथित तौर पर अपने काम के प्रति ईमानदार नेताओं का कोई कसूर नहीं होता है. अब देखिए ना किस तरह से मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर देश भर में कुप्रचार किया जा रहा है, जैसे यह कोई पहली और अंतिम घटना हो. लोग तो पैदा ही इसलिए होते हैं कि एक ना एक दिन उन्हें मरना है. यह सृष्टि का शाश्वत सत्य है फिर इतनी हाय-तौबा क्यों?

यूपी के मुख्य सचिव ने क्या गलत कह दिया कि अगर ठंड से किसी की मौत होती तो दुनिया में सबसे ठंडी जगह साइबेरिया में कोई जिंदा नहीं बचता. उनके अनुसार, साइबेरिया में किसी की मौत तो ठंड से नहीं होती, अब महाशय को इतने बड़े ओहदे पर होने के कारण इतना तो पता ही होगा कि वहां रहने वाले लोगों के पास गर्म कपड़े होते हैं. लेकिन यहां रहने वाले लोग तो रात के कटने का इंतजार करते हैं. किसी तरह से रात कट जाये तो फिर अगले दिन के बारे में सोचा जायेगा. यह सब उनकी दिनचर्या का एक अहम हिस्सा बन गया है जैसे. और उपर से हमारे नेताजी हैं कि उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं क्योंकि उन्हें यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि वोटों का जुगाड़ किस तरह से किया जाता है. पूरे देश-विदेश के लोगों ने बिल्कुल नंगी आंखों से देखा – कितनी बेशर्मी से हमारे नेताजी की पार्टी के एक और वरिष्ठ नेताजी अबू आजमी टीवी पर सैफई में होने वाले महोत्सव के बारे में सफाई दे रहे थे. क्या दंगों की वजह से हम इतने बड़े महोत्सव को रद्द कर दें.

जबकि आम आदमी के घर में अगर कोई हादसा हो जाता है तो अगले साल भर के लिए ऐसा कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाता है जिसमें धूम-धड़ाका यानि नाच-गाना/मस्ती हो. जिस तरह से सैफई महोत्सव पर हजारों करोड़ रुपये से अधिक खर्चा किया, अगर उसका दस फीसदी हिस्सा भी दंगा पीड़ितों पर खर्च किया जाता तो उनके सर पर पक्की छत होती.  आज एक और बयान नेताजी के ही पार्टी से खेल मंत्री, नारद राय का आया है. उनके अनुसार, लोग महलों में भी मरते हैं तो फिर राहत कैंपों में लोगों के मरने पर इतना हंगामा क्यों! बेशर्मी के इस पूरे नाच में उपर से नीचे नहाये नेताजी को कौन समझाये. ये नेताजी बलिया जिले से आते हैं जो आजादी के समय से अपने बागी स्वभाव के लिए ज्यादा जाना जाता है. सन् 1857 में मंगल पांडेय (गाय की चमड़ी से प्रयुक्त गोली का विरोध करके) ने इसी जिले से आजादी की पहली लड़ाई शुरू की थी आज देश का दुर्भाग्य है कि इसी जिले का प्रतिनिधित्व करने वाला एक ऐसे सूबे का खेल मंत्री है जिसकी आबादी विश्व में कई देशों की आबादी से अधिक है और देश में सबसे अधिक लोकसभा की सीटें इस सूबे से आती हैं. इस सूबे ने देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिया है. लेकिन 1989 के बाद मंडल और कमंडल की आग में झुलसने के बाद से यह देश का सबसे अस्थिर प्रांत बन गया.

पिछले दो दशकों के बाद इस राज्य के मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी के सबसे युवा चेहरे और समाजवाद की बातें करने वाले मुलायम एंड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के पुत्र अखिलेश यादव पर भरोसा जताते हुए उन्हें राज्य की गद्दी सौंपी, लेकिन क्या बिडंबना है कि मुस्लिम-यादवों के गठजोड़ और कारसेवकों पर गोली चलाने के बाद, मौलाना मुलायम कहे जाने वाले समाजवादी पार्टी के राज में सबसे अधिक अगर कोई असुरक्षित है तो वह है मुसलमान. इनके शासन में अब तक सौ से अधिक दंगे हो चुके हैं. लेकिन क्या मजाल है कि कोई इन पर उँगली उठाये. इन्हें जनता ने प्रचंड बहुमत दिया है. सो पांच साल से पहले कोई हटा नहीं सकता. केंद्र में अपनी सरकार है ही. आय से अधिक संपत्ति में उन्हें सीबीआई ने छूट दे ही दी है.

राजनीति क्या-क्या गुल खिलाती है, इसकी एक बानगी है यह. इसके अलावा, इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि देश भर में हिंदी को बढ़ावा देने और इसके अधिक से अधिक उपयोग पर संसद में बहस में आगे रहने वाले हमारे नेताजी अपने पुत्र की शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से ऑस्ट्रेलिया में कराते हैं, क्योंकि उन्हें हकीकत मालूम है. क्या यह देश वासियों के साथ क्रूर मजाक नहीं है. बेटे को सूबे की गद्दी संभालनी थी और बेचारी जनता बेरोजगारी भत्ते लेने के लिए हमेशा लाइन में खड़ी रहने और नेताजी के झंडे उठाने को विवश.

जब तक आप रोजगार से किसी शिक्षा पद्धति/भाषा को नहीं जोड़ेंगे तब तक इस देश का कभी वास्तविक भला नहीं होने वाला है. कभी विश्व को शिक्षा और लोकतंत्र का पाढ़ पढ़ाने वाला भारत आखिर कहां और किन कारणों से पीछे रह गया. अंग्रेजों के समय में लॉर्ड मैकाले ने सबसे पहले हमारी शिक्षा-व्यवस्था की रीढ़ को कमजोर कर दिया और आज हम देखते हैं कि दूसरे देशों में हमारे यहां से चोरी होकर संस्कृत भाषा में लिखी गई किताबों/महान ग्रंथों और आयुर्वेद पर शोध हो रहे हैं जबकि यह अपने ही देश में उपेक्षा का शिकार हो गई है.

चलते-चलते आज अमेठी में आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास ने रैली की. रैली में उन्हें सुनने के लिए अच्छी-खासी संख्या में भीड़ जमा हुई थी. यह बदलती राजनीति का जीता-जागता नमूना है तो दूसरी तरफ भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार, नरेंद्र मोदी ने गोवा में रैली की. अमेठी में कुमार विश्वास की रैली पर टिप्पणी करते हुए रीता बहुगुणा जोशी की प्रतिक्रिया सुनकर कानों पर से विश्वास उठा जा रहा है. क्या आप में से किसी को सहज विश्वास हो रहा है कि ये हेमवतीनंदन बहुगुणा ( लोकदल-ब के संस्थापक जिन्हें इलाहाबाद से हराने के लिए राजीव गांधी को 1985 में अपने बचपन के मित्र और बॉलीवुड के महानायक, अमिताभ बच्चन को लड़ाना पड़ा था, लेकिन बोफोर्स तोप घोटाला में नाम आने के कारण दोनों की दोस्ती में सदा के लिए दरार आ गई जो राजीव गांधी के जीते-जी कभी खत्म नहीं हो सकी.) की पुत्री हो सकती हैं, जिन्होंने मरते दम तक कांग्रेस की नीतियों का विरोध किया और उन्हीं के पुत्र और पुत्री चापलूसी करके सत्ता का लाभ ले रहे हैं. सत्ता का लाभ लीजिये लेकिन किसी की चापलूसी मत करिये ना.

उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता और पूर्व अध्यक्ष रहीं, रीता बहुगुणा जोशी ने कुमार विश्वास की रैली पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा “कुमार विश्वास कवि है लेकिन राजनीतिक मंच पा कर इस समय अहंकार से भर गए हैं. उनको अपने विवादास्पद बयानों के कारण विरोध का सामना करना पड़ रहा है ना कि कांग्रेस के कारण” हद तो जब हो जाती है जब वे विश्वस को बाहुबली और पैसेवालों से लड़ने की सलाह देने लगती हैं. क्या शीला दीक्षित के हश्र से कांग्रेस तिलमिला गई है या अब तो लगता है कि राहुल गांधी, सोनिया गांधी को दक्षिण भारत से ही लड़ना सही रहेगा. वैसे भी चिकमंगलूर और बेल्लारी आपातकाल से गांधी परिवार के साथ रहा है. इसके अलावा, आज कुमार विश्वास पर अंडे और काली स्याही फेंके गए, इसे एक स्वस्थ लोकतंत्र में सही नहीं कहा जायेगा.

प्रजातंत्र में आपको विरोध का हक है और होना भी चाहिए लेकिन बलपूर्वक अगर आप किसी की आवाज को दबाने का प्रयास करेंगे तो आप जान लीजिये इसमें आपको फायदा कम बल्कि विपक्षी को राजनीतिक लाभ ज्यादा होगा, लोगों की सहानुभूति उनके साथ होगी. सो वाणी और विचारों से तथा उसके गलत कार्यों पर फोकस करिये, विरोध जमकर करिये, आपका यह लोकतांत्रिक अधिकार है ना कि डंडे या अंडे या तोड़-फोड़ से. इससे आपकी मानसिकता के साथ-साथ कुत्सित प्रवृति भी साफ झलकती है.

ताजा आ रही खबरों के अनुसार, सीबीआई कोल ब्लॉक आवंटन पर कुछ कंपनियों के खिलाफ जांच कार्यवायी के बारे में सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने वाली है. लेकिन इसकी जांच की निष्पक्षता हमेशा से कटघरे में है. लोग पूछ रहे हैं कि सीबीआई कोल ब्लॉक आवंटन में पीएम के खिलाफ सबूत कब जुटायेगी. देश के लोगों को इसका बेसब्री से इंतजार है. लाख टके का सवाल यह है कि जिनके पास यह मंत्रालय था, वह कैसे बेदाग हो सकता है.

सीबीआई के निदेशक, रंजीत सिन्हा के बारे में ज्यादा जानकारी देने की जरूरत नहीं है. हर किसी को पता है कि किस तरह से पटना में इन्होंने अपने अधीन चारा घोटाले की जांच को प्रभावित किया था फिर पटना उच्च न्यायालय को इन्हें जांच कार्यों से हटाकर ईमानदार अधिकारी, उपेन विश्वास को जांच का आदेश देना पड़ा था. इन्हीं सेवाओं को देखते हुए माननीय लालू यादव ने सोनिया गांधी से पैरवी करके रंजीत सिन्हा को निदेशक का पद दिलाया था, क्योंकि 2 जी स्पेक्ट्रम, कोल ब्लॉक आवंटन से लेकर कई मामले थे, जिसमें केंद्र सरकार के मंत्रियों की फजीहत हो रही थी, गर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच नहीं होती तो मामला कब का बंद कर दिया गया होता, ठीक उसी तरह से जैसे बोफोर्स की जांच को 250 करोड़ रुपये खर्च करके बंद कर दिया गया. घोटाला 68 करोड़ रुपये का जांच में खर्च 250 करोड़ रुपये से ज्यादा और नतीजा ढ़ाक के तीन पात. देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को ऐसे ही सुप्रीम कोर्ट ने पिंजड़ें में बंद तोता की संज्ञा नहीं दी है. यहां निदेशक सेवानिवृति के बाद अपने लिए राज्यपाल के पद का जुगाड़ करने के लिए ज्यादा उत्सुक रहते हैं. अश्विनी कुमार को उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं.

अब एक नजर बिहार सरकार द्वारा हाल के दिनों में सम्राट अशोक के समय बिहार के चंपारण जिला में निर्मित विश्व प्रसिद्ध केसरिया बौद्ध स्तूप से करीब आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित विराट रामायण मंदिर का निर्माण किए जाने की घोषणा पर। इस घोषणा से लगभग दो हजार साल पुराने केसरिया बौद्ध स्तूप ने विश्व के पर्यटकों का ध्याव अपनी ओर खींचा है तो इस विराट मंदिर को देखने के लिए पूरा भारत उमड़ेगा। इससे इलाके का सर्वांगीण विकास होने की प्रबल संभावना जगी है.

गौरतलब है कि इस मंदिर का निर्माण पटना हनुमान मंदिर की देखरेख में हो रहा है.  तो एक और खबर बिहार से ही है. सभी को याद होगा कि किस तरह से पटना विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर मटुकनाथ ने अपनी ही छात्रा जूली से प्रेम-विवाह किया था. तो पटना ही नहीं देश भर में समाचार माध्यमों ने इस खबर को चटखारे ले-लेकर परोसा था. उनकी पहली पत्नी आभा चौधरी ने अपनी आजीविका के लिए कोर्ट में केस किया था. अब जाकर उन्हें राहत मिली है. कोर्ट ने उन्हें 15 हजार रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया है. आभा चौधरी की वकील श्रुति सिंह बताती हैं – ‘जब पटना विश्वविद्यालय के प्रो.मटुकनाथ पर मुकदमा दायर किया गया था, उस समय उनका वेतन 44 हजार रुपये प्रतिमाह था. इसमें समय के साथ-साथ बढ़ोतरी होती गयी. अभी वे प्रतिमाह करीब सवा लाख रुपये पाते हैं.

लीजिये एक और राजनीतिक खबर जिस पर देश भर के लोगों की निगाहें लगी है –  यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (आधार कार्ड योजना) के अध्यक्ष और इंफोसिस के सह संस्थापक, नंदन नीलेकणि ने शुक्रवार को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का औपचारिक एलान कर दिया है. तो वहीं, भाजपा में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह,  देश की पहली महिला आईपीएस और अन्ना हजारे की सहयोगी किरण बेदी और कर्नाटक के लोकायुक्त रहे संतोष हेगड़े जैसे लोगों के शामिल होने की अटकलें हैं. पूर्व गृह सचिव आरके सिंह और संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के राजदूत रह चुके हरदीप सिंह पुरी भी भाजपा की सदस्यता ले चुके हैं.

अभी हाल ही में, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते और एप्पल कंपनी में साउथ एशिया के सेल्स प्रभारी रहे आदर्श शास्त्री, आईबीएन7 के पूर्व मैनेजिंग एडिटर, आशुतोष समेत जाग उठे हैं लोग मेरे गांव के, अब अंधेरे जीत लेंगे लोग मेरे गांव के! जैसे कई लोकगीतों के रचयिता बल्ली सिंह चीमा आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए हैं. सूत्रों के अनुसार, आने वाले लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी’ 250 से 300 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का एलान पहले ही कर चुकी है.

दिल्ली के विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता से उत्साहित ‘आआपा’ ने स्वच्छद छवि वाले उम्मीदवार मैदान में उतारने की जो पहल की है, उसका असर कांग्रेस और भाजपा पर भी दिख रहा है. दिल्ली में आप पार्टी को मिली सफलता का ही नतीजा है कि कभी चुनाव जीतने के लिए बाहुबलियों को मैदान में उतारने वाली कांग्रेस, भाजपा और अन्य क्षेत्रीय दल भी अब साफ छवि के उम्मीदवारों को पसंद कर रहे हैं. 2014 आम चुनाव में बड़ी संख्या में ऐसे उम्मीदवार मैदान में उतरेंगे, जो अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ेंगे. हालांकि, अभी तक उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं हुई है, लेकिन कई ऐसे नाम हैं, जिनका लड़ना लगभग तय है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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