कांग्रेस क्यों चाहती है प्रियंका को आगे लाना…

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तीसरी पारी से इन्कार के बाद अब कांग्रेस में आम चुनाव को लेकर सक्रियता बढ़ गई है. माना जा रहा है कि कांग्रेस कार्यसमिति की 17 जनवरी को होने वाली बैठक में पीएम उम्मीदवार के रूप में राहुल गांधी के नाम का ऐलान कर दिया जाएगा, लेकिन चुनाव की कमान को लेकर ऊहापोह की स्थिति है. पार्टी सूत्रों की मानें तो कांग्रेस का एक तबका चाहता है कि चुनाव की कमान प्रियंका के हाथों में सौंपा जाए, ताकि पार्टी की छवि को सुधारा जा सके और चुनाव में अपेक्षित सफलता प्राप्त की जा सके. प्रियंका पर पार्टी के भरोसे की कई वजहें हैं.

हमेशा विवादों से दूर रहने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा को गांधी परिवार का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जाता रहा है. लेकिन उन्होंने राजनीति के बजाय परिवार को ज्यादा तरजीह दी है और अपने भाई राहुल गांधी के राह के कांटों को हटाती रही हैं. इनकी राजनीतिक समझ लाजवाब है, इसलिए कहा जाता है कि जब भी राहुल किसी महत्वपूर्ण मौके पर भाषण देते हैं तो वही तय करती हैं कि क्या कहना है और क्या नहीं. प्रियंका कभी विवादों में नहीं रही हैं. उनकी इसी छवि को कांग्रेस अगले आम चुनाव में भुनाना चाहती है.

प्रियंका अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी का रायबरेली और अमेठी में चुनाव प्रबंधन देखती रही हैं. वह कार्यकर्ताओं से बेहतर संवाद करने में माहिर मानी जाती हैं. वह कार्यकर्ताओं की क्षमता का उपयोग करना जानती हैं. इसके साथ ही नाराज लोगों को मनाने में उनका कोई तोड़ नहीं है. दोनों संसदीय क्षेत्र में प्रियंका को सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं का नाम पता है और वही बूथ प्रबंधन में करती हैं. इन्हीं गुणों को ध्यान में रखकर कांग्रेस उनका उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहती है.INDIA ELECTIONS

प्रियंका अपने आकर्षण व्यक्तित्व के कारण युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं. लोगों का ऐसा मानना है कि अगर प्रियंका यदि राष्ट्रीय स्तर पर लोगों से सीधा संवाद करें और कांग्रेस के लिए वोट मांगें तो इसका काफी प्रभाव पड़ सकता है.

अपनी लुक और स्टाइल की वजह से प्रियंका में लोग उनकी दादी दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की झलक देखते हैं. चेहरा, ब्वॉय कट बाल, साड़ी पहनने का ढंग, चलने का अंदाज, लोगों से आत्मीयता से मिलना आदि में दोनों में काफी समानता है. इंदिरा गांधी को कठोर निर्णय लेने वाला नेता माना जाता था और इसी संकट से आज कांग्रेस जूझ रही है, इसलिए पार्टी ऐसा मानती है कि प्रियंका को लोग हाथोहाथ लेंगे.

प्रियंका को वाकपटु माना जाता है. वह भाषण के दौरान जनता से संवाद करती नजर आती हैं. उनकी वाणी में कभी कठोरता नहीं रहती है. वह लोगों से बातचीत के दौरान मुस्कुराती नजर आती है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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