नीतीश को अगले चुनाव में पार्टी की करारी हार की आशंका…

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-हरेश कुमार||

भारतीय जनता पार्टी से बिहार में गठबंधन टूटने के बाद नीतीश कुमार को अगले चुनाव में अपनी पार्टी की हार का खतरा स्पष्ट तौर पर दिखने लगा है. नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू और भाजपा ने मिलकर बिहार में 15 सालों से बिहार पर शासन कर रहे लालू प्रसाद यादव को सत्ता से हटाया था. जबकि इसके पहले लालू प्रसाद यादव कहा करते थे कि जबतक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेगा समोसे में आलू.
NITISH-KUMAR
लेकिन विपरीत परिस्थितियों में हालात इस कदर हो गए थे प्रदेश में कांग्रेस और लोक जनशक्ति पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी तो राष्ट्रीय जनता दल (राजद) मात्र 22 सीटों पर सिमट कर रह गया था तो उसके संसद में प्रत्याशियों की संख्या भी कम होकर 4 रह गई थी तो कांग्रेस के दो सदस्य जीतने में सफल रहे थे और लोजपा को किसी सीट पर विजय नहीं मिली थी. यहां तक कि पार्टी अध्यक्ष, रामविलास पासवान भी चुनाव हार गए थे.

जदयू की दिक्कत यह है कि भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद अगड़ी जाति के लोग उससे बेहद खफा है तो राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाला में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जिस तरह से कांग्रेस ने मुसलमान और यादवों के वोट बैंक माय पर अपना भरोसा जताते हुए अंत समय में नीतीश कुमार से किनारा करते हुए एक बार फिर से लालू प्रसाद के साथ गठजोड़ का संकेत दिया तो कुमार की रातों की नींद उड़ गई ऐसा लगता है कि उनके हाथों के तोते उड़ गए हों. राजनीतिक तौर पर नीतीश कुमार को इस कदम से बहुत बड़ा झटका लगा है. अब उनकी नजर रामविलास पासवान पर लगी हुई है जो लालू प्रसाद यादव के द्वारा ज्यादा तरजीह नहीं देने से आजकल नाराज चल रहे हैं.
अगर, रामविलास पासवान का लोजपा और नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू एक साथ आ जाती है तो नीतीश कुमार का वोट बैंक, पिछड़ी जातियों विशेषकर – कुर्मी-कोयरी के साथ महादलित, दलितों और और कम से कम पसमांदा मुसलमानों का एकमुश्त वोट इस गठबंधन को हासिल हो जाएगा.

मगर नीतीश कुमार की परेशानी यह है कि पासवान अभी राजद पर दबाव बढ़ाने के लिए जदयू के साथ जाने महज संकेत भर दे रहे हैं. पासवान के इस तीखे तेवर के बाद लालू प्रसाद के तेवर भी पहले से बदल गए हैं. और उन्होंने पासवान को मनाने के लिए बिहार प्रदेश राजद अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दिकी को अपना संदेहवाहक के तौर पर भेजा था. मगर अभी तक बात बनी नहीं है. कांग्रेस, राजद, एनसीपी और लोजपा का गठबंधन रहने पर भाजपा और जदयू को कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ सकता है. बदले में एनसीपी के तारिक अनवर को कटिहार सीट पर ये पार्टियां लोकसभा चुनाव में मदद करेंगी. तारिक अनवर इस सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ते रहे हैं.

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में अलग-थलग होने के बाद नीतीश कुमार एक ऐसा फेडरल फ्रंट बनाना चाहते हैं जिससे कि उनकी राजनीतिक साख बनी रहे. उन्होंने खुद पहल करते हुए झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा, बाबू लाल मरांडी से मुलाकात की और फिर मरांडी उड़ीसा के मुख्यमंत्री, नवीन पटनायक से मिले. इसके अलावा, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले से ही फेडरल गठबंधन की पक्षधर रही हैं.

इसमें अगर, लोजपा का साथ हो जाये तो नीतीश कुमार के लिए सोने पर सुहागा होगा. कुमार के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि भाजपा नरेंद्र मोदी को पिछड़े नेता के तौर पर प्रोजक्ट कर रही है. अगड़ी और पिछड़ी जातियां मिलकर कुमार का कितना राजनीतिक नुकसान करेगी यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा.

इससे पहले, पार्टी में कांग्रेस से गठबंधन पर मतभेद के बावजूद नीतीश कुमार व्यक्तिगत रूप से अपने पक्ष में मुस्लिम मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन के पक्षधर थे. लेकिन कांग्रेस के बदलते रुख ने कुमार को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया. कांग्रेस ने भी नीतीश कुमार के साथ आने की लगभग ही भर दी थी और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए नीतियों में बदलाव करने के साथ ही वर्षों से लटके पड़े कई योजनाओं को केंद्र ने तुरंत मंजूरी देनी शुरू कर दी थी. यहां तक कि राष्ट्रीय राजमार्गों के खर्चे भी बिहार को वर्षों से नहीं मिला था. केंद्र ने 12 हजार करोड़ की मंजूरी दे दी और फिर कई अन्य विकास योजनाओं को जैसे कि पंख लग गए.

लेकिन ये क्या! रंग में भंग पड़ना तो तब शुरू हुआ जब लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला में बाहर आए. अब फिर से कांग्रेस ने गिरगिट की तरह से रंग बदलते हुए नीतीश का साथ बीच रास्ते में छोड़ दिया. तभी तो कहा जाता है कि राजनीति में ना तो कोई स्थाई मित्र होता है और ना ही दुश्मन. जैसा कि 17 सालों से जेडीयू और भाजपा का गठबंधन एक पल में ही टूट गया और वे इस तरह से एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार करने लगे जैसै कि कभी आपस में मिले ही नहीं थे.

इस बीच, कांग्रेस के कई स्थानीय नेता लालू प्रसाद यादव के साथ गठबंधन नहीं करना चाह रहे हैं, क्योंकि उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्य किया है. उन्हें लगता है कि लोकपाल बिल पास होने के बाद लालू प्रसाद यादव से गठबंधन महंगा पड़ सकता है. क्योंकि लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला में जेल गए थे. कोई पुण्य कार्य करके नहीं, लेकिन लालू हैं कि अपनी तुलना भगवान कृष्ण से करते रहे हैं.

कहीं ऐसा ना हो जाये कि एक वक्त प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने वाले नीतीश कुमार फिर से अपने पुराने दिनों में वापस ना चले जाये. संस्कृत में एक कहानी है – पुनर्मुषिको भव: यानि फिर से चूहा हो जाओ. इस कहानी में एक साधु ने अपने यहां रह रहे चूहा को शेर बना दिया ता जो शेर बनने के बाद साधु पर ही हमला कर दिया. फिर साधु ने उसे शाप देते हुए पुनर्मूषिको भव: यानि पहले के रूप मं वापस आ जाओ का श्राप दे दिया.

नीतीश कुमार भी भाजपा से हाथ मिलाने से पहले लालू प्रसाद यादव का कुछ बिगाड़ नहीं पाये थे और उन्होंने अपने वोट बैंक को लेकर समता पार्टी का गठन किया लेकिन उसे मात्र 7 सीटों पर विजय मिली थी, फिर भाजपा के साथ हाथ मिलाते ही बिहार में एक नई राजनीतिक संस्कृति का उदय हुआ लेकिन राजनीतिक फायदे-नुकसान को देखते हुए यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चल सका. इसका नुकसान बिहार को भी भुगतना पड़ रहा है. बिहार में लालू यादव का राज्य जिस तरह से आतंक और कुशासन का पर्याय बन गया था और एकमात्र अपहरण उद्योग फलफूल रहा था. वह एक बार फिर से आने की आहट दे रहा है. वर्तमान में राजधानी पटना की कानून-व्यवस्था की स्थिति भी चरमरा चुकी है और अब तो ठीक थाना के सामने ही अपराधी जब जी चाहे अपराध करके निकल पड़ते हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “नीतीश को अगले चुनाव में पार्टी की करारी हार की आशंका…

  1. यह तो तय ही है कि नितीश को एन डी ऐ से अलग होना महंगा पड़ेगा. लालू उन्हें कहीं भी समझोता नहीं करने देंगे. तीसरा मोर्चा एक कल्पना है, हवाई गुबारा है, व इसकी बात करने वाले भी यह अच्छी तरह जानते हैं.पी ऍम का ख्वाब देखने वाले मुलायम भी अब दबी जुबान से मोदी के बढ़ते प्रभाव को मान ने लग गए हैं. व दुश्मन दोस्त की बात कर भा ज पा के निकट सम्बन्ध बनाये रखना चाहते हैं.ताकि समय के अनुरूप पाला बदलने की जरुरत आने पर सत्ता लाभ प्राप्त करसकें.

  2. यह तो तय ही है कि नितीश को एन डी ऐ से अलग होना महंगा पड़ेगा. लालू उन्हें कहीं भी समझोता नहीं करने देंगे. तीसरा मोर्चा एक कल्पना है, हवाई गुबारा है, व इसकी बात करने वाले भी यह अच्छी तरह जानते हैं.पी ऍम का ख्वाब देखने वाले मुलायम भी अब दबी जुबान से मोदी के बढ़ते प्रभाव को मान ने लग गए हैं. व दुश्मन दोस्त की बात कर भा ज पा के निकट सम्बन्ध बनाये रखना चाहते हैं.ताकि समय के अनुरूप पाला बदलने की जरुरत आने पर सत्ता लाभ प्राप्त करसकें.

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