रिलांयस को देनी होगी 1.2 अरब डॉलर की बैंक गारंटी, गैस की कीमतें भी हो सकती हैं दोगुनी…

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-हरेश कुमार||

रिलायंस को आंध्र प्रदेश के कृष्णा-गोदावरी बेसिन से निकलने वाली गैस के लिए नए साल 2014 में अप्रैल से दोगुणी कीमत पाने के लिए सरकार को बैंक गारंटी देनी होगी. अभी रिलायंस को 4.4 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू (प्राकृतिक गैस मापने की इकाई) मिल रहा है जिसे सरकार द्वारा गठित रंगराजन समिति ने बढ़ाकर करीब 8.2 डॉलर करने को मंजूरी दे दी है. रिलायंस इंडस्ट्रीज और उसकी सहयोगी कंपनियों जिसमें ब्रिटिश पेट्रोलियम यानि बीपी पीएलसी व कनाडा की निको रिसोर्सेस को अगले तीन साल के दौरान अधिकतम 1.2 अरब डॉलर की बैंक गारंटी देनी पड़ सकती है.kg basin

यह बैंक गारंटी रिलायंस इंडस्ट्रीज को नए गैस मूल्य पर होने वाली अतिरिक्त आमदनी के बराबर है. सूत्रों के अनुसार अगर यह साबित हो जाता है कि कंपनी ने गैस की जमाखोरी की है या फिर जानबूझकर 2010-11 से अपने मुख्य तेल क्षेत्रों धीरूभाई 1 व 3 से उत्पादन कम किया है, तो इस बैंक गारंटी को भुना लिया जाएगा. लेकिन अगर सरकार को लगा कि प्राकृतिक गैस के उत्पादन में रिलायंस ने जानबूझकर कोई गलती नहीं की है तो रिलायंस और उसकी सहायक कंपनी को उसके पैसे वापस मिल जायेंगे.

गौरतलब है कि मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने 20 दिसंबर को अप्रैल 2014 से गैस की कीमतें दोगुनी करने की अनुमति दी थी, लेकिन इसके साथ शर्त यह थी कि कंपनी को बैंक गारंटी जमा करनी होगी. अब रिलायंस ने इसे स्वीकार तो कर लिया है लेकिन यह निर्णय उसके लिए ना तो निगलते बन रहा है और ना ही उगलते. रिलायंस की स्थिति सांप-छुछूंदर जैसी हो गई है. ना कुछ कहते बन रहा है और ना ही नकारते. हां, दिखाने के लिए उसने सरकार द्वारा मांगी जा रही बैंक गारंटी देने पर अपनी मुहर लगा दी है.

अब देखना है कि सरकारी पक्ष सिर्फ दिखावे के लिए जांच करके लीपापोती कर रहा है या सच में उसकी नीयत सही है और जनता को राहत देने और देश की प्राकृतिक संपदा को बचाना सरकार का लक्ष्य है. जो अभी तक कहीं दिख नहीं रहा. चाहे हम कोल ब्लॉक आवंटन को देखें या 2 जी स्पेक्ट्रम या कोई औऱ घोटाला सबमें देश के खजाने को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. महज कुछ लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए इस देश में जिस तरह से नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों और कॉरपोरेट जगत का गठजोड़ कार्य करता है उससे लोगों को इस जांच से कुछ अलग मिलने वाला दिखता नहीं है. क्योंकि सरकारी जांच निष्पक्ष तरीके से होगी इसकी क्या गारंटी है. सबको मालूम है कि प्राकृतिक गैस का उपयोग उर्वरक बनाने से लेकर बिजली बनाने व अन्य उपयोगों में होता है.

देश में ओएनजीसी, गेल और ओआईएल जैसी तीन बड़ी सरकारी गैस कंपनियों को प्राकृतिक गैस के उत्पादन का विकास करने के लिए आगे करने के बजाये सरकार ने इस लूट के लिए एक नई नीति की घोषणा की जिसे न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी यानी संक्षेप में नेल्प कहा जाता है और इसी को आधार बनाकर हमारे देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों को खोजने और डेवलप करने का अधिकार निजी कंपनियों को दिया गया. सबसे आश्चर्यजनक तो बात यह है कि देश की तीनों गैस कंपनियां जो विदेशों में प्राकृतिक गैस और पेट्रॉलियम की खोज में लगी है, उसे ना देने के लिए बहाना बनाया गया कि सरकार के पास पैसा नहीं है और एक ऐसी कंपनी को गैस की खोज का काम दिया गया जिसके पास इसके लिए ना तो तकनीक थी और ना ही कोई विशेष अनुभव. सरकारी स्तर पर इसे ठेका देने के लिए फाइलों और नीतियों में एक जबरदस्त खेल खेला गया था.

जैसा कि सबको मालूम है कि रिलायंस को गैस की बढ़ी हुई कीमत देने का विरोध हो रहा है. इसका मुख्य कारण जानकारों के अनुसार, कंपनी ने जानबूझकर धीरुभाई ब्लॉक 6 से जानबूझकर उत्पादन में कमी कर दी है और गैस की कीमत बढ़ाए जाने के बाद वह उत्पादन में तेजी लायेगी. दूसरी तरफ, कंपनी का कहना है कि डी6 में पानी और रेत भर गया है जिसकी वजह से गैस का उत्पादन घटा है. इस मामले की जांच सरकार कर रही है.

नए आंकड़ों के अनुसार, डी6 ब्लॉक के डी 1 और डी 3 फील्ड के बाकी बचे भंडार में से अब 0.75 ट्र्लियन क्यूबिक फीट (टीसीएफ) गैस ही उत्पादित की जा सकती है. यहां से फिलहाल 80 लाख घनमीटर गैस रोजाना उत्पादित हो रहा है. इसे देखते हुए अगले तीन साल में 0.3 टीसीएफ गैस उत्पादित होगी. इस पर बैंक गारंटी कुल 1.2 अरब डॉलर बनती है.

रंगराजन फॉर्मूले के लागू होने के बाद गैस का दाम 4.4 डॉलर प्रति एमबीटीयू से बढ़कर 8.2-8.4 डॉलर प्रति इकाई हो जाएगा. इस तरह से 1000 खरब घनफुट के उत्पादन पर पुराने व नए मूल्य का अंतर 4 अरब डॉलर बैठेगा. सूत्रों के अनुसार, मौजूदा उत्पादन करीब 80 लाख स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर रोजाना के हिसाब से डी-1 व डी-3 का उत्पादन अगले तीन साल में 0.3 टीसीएफ होगा. अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 0.3 टीसीएफ की बैंक गारंटी 1.2 अरब डॉलर बैठती है. इसमें से आरआईएल की हिस्सेदारी (जिसके पास 60 प्रतिशत शेयर हैं) 6 करोड़ डॉलर प्रति तिमाही होगी. बीपी की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है जबकि बाकी 10 प्रतिशत निको के पास है.

उल्लेखनीय है कि डी-1 व डी-3 में अप्रैल 2009 में उत्पादन शुरू हुआ और यहां मूल रूप से 10.03 टीसीएफ गैस भंडार का अनुमान था. लेकिन पहले तीन सालों में उत्पादन को देखते हुए पिछले साल इसे घटाकर 2.9 टीसीएफ कर दिया गया था क्योंकि पानी व बालू के जमाव के चलते एक के बाद एक कुएं बंद होने लगे. 2.9 टीसीएफ गैस में से करीब 2.2 टीसीएफ गैस का उत्पादन पहले साढ़े चार सालों में हो चुका है जबकि बाकी 0.75 टीसीएफ का उत्पादन अभी बाकी है.

सूत्रों के अनुसार नई दरें बिना किसी पूर्व शर्त के केजी डी-6 के दूसरे क्षेत्रों में भी लागू होंगी. एमए तेल एवं गैस के अलावा आर सीरिज तथा सैटेलाइट खोजें को भी नया मूल्य बिना पूर्व शर्तों के मिलेगा. पिछले तीन सालों में कम उत्पादन के चलते सरकार पहले ही आरआईएल व इसके साझेदारों पर 1.78 अरब डॉलर का जुर्माना लगा चुकी है. बैंक गारंटी इसके अतिरिक्त है.

एक तरफ, पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली की मानें तो गैस की बढ़ी कीमत 8.4 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू की जगह 6 डॉलर भी रह सकती है. तो दूसरी तरफ, सरकारी कंपनी ओएनजीसी ने गैस की कीमत में बढ़ोतरी के फैसले पर खुशी जताई है. ओएनजीसी के सीएमडी, सुधीर वासुदेवन के अनुसार, इससे गैस की खोज और उसके उत्पादन बढ़ाने में लाभ मिलेगा.

पूर्व पेट्रोलियम सचिव एस सी त्रिपाठी के अनुसार, गैस की कीमतों में बढ़ोतरी सही है. त्रिपाठी के अनुसार, इससे रिलायंस इंडस्ट्रीज और ओएनजीसी जैसी गैस की खोज और उत्पादन में लगी कंपनियों को लाभ होगा.

त्रिपाठी के मुताबिक गैस की नई कीमत का निर्धारण अमेरिका, यूरोप और जापान में गैस की कीमतों को ध्यान में रखकर किया गया है. सूत्रों के अनुसार, भविष्य में अगर जापान अपने न्यूक्लियर प्लांटों को फिर से शुरू करेगा तो गैस की कीमतों में कमी आ सकती है. यहां पर सरकार सरासर झूठ बोल रही है. हमारे देश में उत्पादन नदी-घाटी की बेसिन से होता है और अन्य जगहों पर समुद्र के अंदर से, जो काफी महंगा पड़ता है.

जैसा कि सबको पता है कि नई नीति, नेल्प के अनुसार, वर्ष 1999 में केजी बेसिन जहां भारत का सबसे बड़ा गैस भंडार है, में गैस खोजने और उसे विकसित करने का अधिकार रिलायंस इंडस्ट्रीज को दिया गया था. 2005 तक वहां गैस के अठारह से ज्यादा क्षेत्र मिले और रिलायंस के लिए तो यह वैसा ही हुआ कि दसों ऊंगलियां घी और सर कड़ाही में.

शुरुआत में कहा गया था कि सरकार अपनी प्राकृतिक संसाधनों पर किसी एक कंपनी का एकाधिकार नहीं होने देगी और इसके लिए सरकार अलग-अलग गैस क्षेत्रों में विभिन्न कंपनियों को क्षेत्र की खोज और विकास का अधिकार देगी. वक्त के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और इस तरह से केजी बेसिन इलाके में रिलायंस ने एक तरह से अपना एकाधिकार कर लिया.

किस तरह से रिलायंस ने एक-एक करके अपनी चालों को अंजाम दिया उसका जिक्र करना यहां पर जरूरी हो जाता है. सबसे पहले तो उसने केजी बेसिन पर एकाधिकार जमाया और फिर बिजली का उत्पादन करने वाली सरकारी कंपनी एनटीपीसी यानी (नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन) के साथ गैस की आपूर्ति का एक समझौता किया. वर्ष 2004 में हुए समझौता के मुताबिक रिलायंस अगले 17 सालों तक एनटीपीसी को 2.34 डॉलर प्रति यूनिट की दर से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने पर सहमत हुआ. उस समय विश्व में कहीं भी प्राकृतिक गैस की कीमत इतनी ज्यादा नहीं थी, लेकिन लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए सरकार और रिलायंस की तरफ से कहा गया कि यह समझौता चूंकि अगले 17 सालों के लिए है तो इससे एनटीपीसी को ही लाभ होगा, लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत.

केंद्र में सरकार बदलते ही हालात रिलायंस के ही पक्ष में हो गए. यानी दोनों हाथों से लूटते रहो. रिलायंस ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए 2005 में गैस उत्पादन की कीमतों में बढ़ोतरी का हवाला देते हुए एनटीपीसी को प्राकृतिक गैस की सप्लाई करने से मना कर दिया और मौजूदा राष्ट्रपति और तत्कालीन सांसद, प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली समिति ने तुरंत गैस का मूल्य 4.2 डॉलर प्रति यूनिट बढ़ा दी. जबकि 2008 तक ओएनजीसी सरकार को 1.83 डॉलर प्रति यूनिट सप्लाई कर रही थी एनटीपीसी गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटाखटा रही थी तो सरकार रिलायंस के द्वारा देश की प्राकृतिक संपदा लूटने के लिए पहले दोगुणा औऱ फिर चार गुणा ज्यादा दाम देने पर राजी हो गई थी. ऐसे में सरकारी कंपनी एनटीपीसी की हालत को कोई सामान्य बुद्धि का आदमी भी समझ सकता है कि किस तरह रही होगी.

त्रिपाठी के अनुसार, केजी-डी6 गैस विवाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज और सरकार दोनों की गलती है. रिलायंस इंडस्ट्रीज ने केजी बेसिन में पूरे खर्च को मंजूरी 60 एमएमसीएमडी गैस की मौजूदगी के अनुमान पर ली थी जो बढ़कर 80 एमएमसीएमडी हो सकती थी. पूरा खर्च होने के बावजूद गैस की पर्याप्त मात्रा नहीं मिलने के कारण ही पूरा विवाद खड़ा हुआ.

देश के नौकरशाह किस तरह की भाषा बोलते हैं, यह किसी से छुपा नहीं है, वे अपने आका के लिए नियमों से किस तरह छेड़छाड़ करते हैं और किस तरह उसे बदलने में अपनी भूमिका निभाते हैं उसे समझना कोई दुश्वार नहीं है. सभी को मालूम है कि किस तरह से इस देश में नौकरशाह सरकारी नौकरी में रहते हुए निजी कंपनियों के लाभ के लिए उत्सुक रहते हैं. इससे वे कई लाभ पाते हैं, जो प्रत्यक्ष औऱ अप्रत्यक्ष दोनों होता है. राजनेताओं और नौकरशाहों के निकट संबंधी इन निजी कंपनियों में किस तरह से वरिष्ठ पदों पर काम करते हैं, यह किसी से छुपी हुई बात नहीं है या फिर नौकरशाह भी समय से पहले रिटायरमेंट लेकर उन कंपनियों में अच्छी पगार पर चले जाते हैं। क्या यह किसी से छुपी हुई बात है?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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