नएवर्ष का स्वागत कीजिए, जनाब…

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-अशोक मिश्र||

लीजिए जनाब! महीने, सप्ताह और दिनों की चहारदीवारी पर पैर रखकर कूदता-फांदता नया वर्ष आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. उठिए, उठकर माशूका की तरह लपककर उसका मुंह चूमिए, हंसकर स्वागत कीजिए. नया साल है भई! आपके लिए नई आशाओं, नई कामनाओं और योजनाओं की सौगात लेकर आया है. भूल जाइए कि पिछले साल आपने कितनी रातें भूखे रहकर और सुबह की रोटी की जुगाड़ में सोचते-विचारते गुजारी हैं. यह भी भूल जाइए कि अभी आपको अपने बेटे या बेटी के स्कूल की फीस देनी है. बीवी की शॉल छेद के चलते ‘चलनी’ बन चुकी है और उसमें अब पैबंद लगाने की गुजांइश ही नहीं बची है. यह भी सही है कि महंगाई की मार ने आपकी कमर को लाठी जैसी सीधी रखने की जगह धनुष की तरह दोहरी कर दी है. अब अगर महंगाई का दबाव कुछ और बढ़ा, तो यह बिल्कुल ही टूट जाएगी. अगर यह टूटती है, टूट जाने दीजिए. लेकिन नए साल का स्वागत करने में पीछे रह गए, तो आपके अड़ोसी-पड़ोसी साल भर ताना मारेंगे. बीवी-बच्चों को तो उनके बीच ही रहना होता है, साल भर वे एहसास-ए-कमतरी (इन्फीरियारिटी कॉम्प्लेक्स) के चलते घुट-घुट कर जिएंगे. बच्चे नए साल के बाद जब स्कूल जाएंगे, तो वे अपने सहपाठियों को कैसे बताएंगे कि उनके डैडी उन्हें किस डिस्कोथेक या बार में ले गए. उन्होंने दिसंबर का आखिरी दिन कैसे सेलिब्रेट किया? पापा पड़ोस वाली आंटी के साथ कैसे नाचे? मम्मी बाजू वाले अंकल के साथ डिस्को करती हुई कितनी ‘क्यूट’ लग रही थीं.????????????????????????????????????????????????????????????????

भाई मेरे! भले ही आपकी जेब ‘ठनठन गोपाल’ बोल रही हो, लेकिन आपके पास ‘प्लास्टिक मनी’ यानी क्रेडिट कार्ड तो है न! फिर काहे की चिंता. जानते हैं, मेरी गली के पीछे वाले पीपल के पेड़ के पास जो •िाखारी बैठता है, वह भी क्रेडिट कार्ड होल्डर है. पिछले हफ्ते उसने परेड के सामने भीख मांगने वाली माशूका को पजेरो गिफ्ट किया है. अगर आपके पास यह सब कुछ नहीं है, तो आपसे बड़ा घोंचू इस दुनिया में कोई दूसरा नहीं है. वैसे आपके पास एक मौका है. अभी नया साल आने में कुछ घंटों की देर है, आप चाहें तो किसी बैंक कर्मी या उसके दलाल से टांका भिड़ा लें और फिर क्या! आपकी पांचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में होगा. मैंने आपको नए साल का मौज-मस्ती के साथ स्वागत करने का बेहतरीन आइडिया दे दिया है. अब देर किस बात की है.

जाइए, नया साल सेलिब्रेट कीजिए. भूल जाइए कि इस देश में कितने घोटाले हुए हैं. राजा, राडिया से लेकर सुखराम तक ने अपनी कितनी पुश्तों के सुख से जीने की व्यवस्था कर ली है. यदि मौका लगे, तो आप भी एकाध लंबा हाथ मारिए और देश को ठेंगे पर रखते हुए परिवार और मोहल्लेवालोंको ‘हैप्पी न्यू इयर’ कहें. मेरी तो यही दुआ है कि नया वर्ष आप सबके लिए शुभ हो. उनके लिए भी शुभ हो, जो किसी का गला काटकर अमीर बने हैं. नया साल उनके लिए भी मंगलमय हो, जो अपना गला कटाने के बावजूद जी रहे हैं. नया साल जहां राजा, राडिया, कनिमोझी जैसे भूतपूर्व और वर्तमान मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के लिए शुभ हो, तो वहीं रोज अपना खून-पसीना बहाने के बावजूद लुगाई की फटी धोती को नई में न बदल पाने वालों के लिए मंगलमय हो. लूटने वालों को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं. लुटने वालों को भी नया साल मुबारक हो. हो सके, तो आप भी मेरे लिए बस इतनी कामना कीजिएगा कि सबके सुखी हो जाने के बाद मुझे भी थोड़ा बहुत सुख हासिल हो जाए.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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