मुलायम के तल्ख बयान के बाद राहत शिविर खाली करवाने की सख्ती…

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मुज्जफरनगर के दंगा पीड़ितों  के लिए चल रहे राहत शिविरों में रह रहे लोगों को लेकर समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के तल्ख बयान के बाद प्रशासन ने सख्ती बरतनी शुरू कर दी है. मुजफ्फरनगर के लोई राहत शिविर से लोगों को भेजने का काम तेज हो गया है. पिछले दो दिनों में तीस परिवारों को कैंप से भेजा जा चुका है. सांझक में कब्रिस्तान की जमीन पर तंबू लगाकर रह रहे 30 विस्थापित परिवारों के खिलाफ सरकारी जमीन कब्जाने की रिपोर्ट लिखाई गई है. इस बीच, राज्य सरकार ने माना है कि दंगा प्रभावित परिवारों के लिए मुजफ्फरनगर और शामली में स्थापित शिविरों के कुल 34 बच्चों की मौत हुई है.Muzaffarnagar_riots_relief_camp

गौरतलब है कि पिछले दिनों मुलायम सिंह ने कहा था कि समाजवादी पार्टी की सरकार को बदनाम करने के लिए बीजेपी और कांग्रेस साजिश रच रही हैं. उन्होंने कहा था कि राहत कैंपों में पीड़ित बनकर बीजेपी और कांग्रेस के समर्थक रह रहे हैं.

समाजवादी पार्टी अगस्त-सितंबर में हुए दंगों के आम चुनाव पर प्रभाव को लेकर आशंकित है. इन दंगों में 60 लोगों की मौत हो गई थी और हजारों लोग विस्थापित हो गए थे, जो मुजफ्फरनगर और शामली के राहत कैंपों में रह रहे हैं. अखिलेश सरकार जल्द से इन लोगों को शिविरों से हटाना चाहती है. इस दिशा में प्रशासन भी निरंतर प्रयास कर रहा है, लेकिन दहशत के चलते विस्थापित फिलहाल इन शिविरों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं.

प्रशासन का कहना है कि तीन-चार दिनों में लोई शिविर से लोग सुरक्षित स्थानों पर भेज दिए जाएंगे. जिले के डीएम कौशलराज शर्मा ने बताया कि लोई शिविर से बुधवार को 20 लोग गांव चले गए थे. गुरुवार को नौ और लोग शिविर से भेज दिए गए हैं. उनका कहना है कि सर्दी बढ़ने के कारण हालात बिगड़ सकते हैं. ऐसे में उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाना चाहिए. एडीएम प्रशासन इंद्रमणि त्रिपाठी ने बताया कि शुक्रवार को मुआवजा पा चुके सौ लोगों को शिविर से हटाया जाएगा. उनका कहना है कि इस कैंप में रहने वाले 167 परिवारों को मुआवजा दिया जा चुका है.

muzaffarnagar_camp

प्रशासन भले ही लोगों को राहत कैंपों से हटाने में जुटा है लेकिन इन्हें फिर से गांव या किसी सुरक्षित जगह पर बसाने की कोई योजना उसके पास नहीं है. बुढ़ाना के एसडीएम मुनीश चंद्र शर्मा, जिनके अंदर लोई गांव आता है, का कहना है कि कैंप से निकले लोगों के लिए हमारे पास कोई योजना नहीं है. उन्होंने कहा कि कुछ विस्थापितों ने मुआवजे की राशि से जमीन खरीदी है.

मुआवजे के वितरण को लेकर भी शिकायतें हैं. कुछ लोगों का आरोप है कि मुआवजा उन्हें ही दिया जा रहा है जिनके पास या तो राशन कार्ड है या रिश्वत दे रहे हैं. लोई कैंप में रहने वाले याकूब शेख का कहना है कि समस्या यह है कि संयुक्त परिवारों में से भी किसी एक को मुआवजा दिया जा रहा है. यासीन शेख का कहना है कि अधिकारी हमें बाहर निकल रहे हैं, लेकिन हमें नहीं पता कि यहां से कहां जाएंगे. गांव में हमारे घर और जमीन पर प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर लिया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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