क्या इस बात की गारंटी है कि फिर से नहीं होगा जनता के विश्वास का चीरहरण ?

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राजीव गुप्ता।।

वी.डी.सी. , प्रधानी , स्कूल , ईंट का भट्टा , और राशन – तेल का कोटा भी उन्ही के पास है ।  उनकी कई गाड़ियाँ चलती है ।  कंधें पर दो-नाली लाइसेंसी बन्दूक लटकाए उनके आदमी हाट – बाजार के दुकानदारों से जबरन चुंगी वसूलने के लिए आते है । अपनी ताक़त का अहसास कराने के लिए बाजार में घुसने से पहले वो  हवाई फायर भी करते है । सब कुछ वो ब्लैक कर देते है । घर में बेटी की शादी हो तो भी हमें  हर जरूरी सामान ब्लैक में ही खरीदना पड़ता है ।

साहब, हमें आजतक कभी  न तो राशन कार्ड के मुताबिक कभी पूरा राशन मिला और न ही कभी मिटटी का तेल । वो कुछ भी कर सकते है । हम गरीब – दुखिया की कौन सुनेगा ?  पुलिस वाले भी उन्हें सलाम ठोंकते है। थानेदार और दरोगा साहब तो हर महीने उनके घर पर  मेहमान की तरह आते  रहते हैं। साहब, उनके खिलाफ अदालत में गवाही देने की बात तो दूर की है साहब,पूरे गाँव में किसी की क्या मजाल जो उनके खिलाफ कुछ बोल दे ?

अगर किसी ने हिम्मत जुटाई तो उसका या तो राम – नाम  सत्य हो गया या तो गवाही देने वाला ही जेल चला गया। साहब वो पैसे वाले है। जज साहब को भी वो फीस देकर उल्टा  उसे ही फंसवा कर  जेल भिजवा देते हैं। अन्ना साहब ने यह कसम खाई है कि वो कचहरी के भ्रष्ट जजों के खिलाफ कार्रवाई करवाने के लिए कानून बनवाएंगे इसलिए उनके समर्थन में मै अपनी तीन बेटियों और दो बेटों को घर पर अकेले छोड़कर अपनी पत्नी के साथ यहाँ रामलीला मैदान में अपनी खेती को भगवान्-भरोसे छोड़कर  आया हूँ , बिना किसी बिछौने के भीगी हुई घास पर लेटे हुए , रात्रि लगभग 2 बजे , भिंड जिले के खरका गाँव के मिजाजी लाल जी ने अपनी व्यथा बताते हुए रामलीला मैदान में आने का करण बताया।  आप सब शहर के लोग पढ़े-लिखे हैं, और यहाँ शहर में रहते है आप सब भी कुछ दिन की छुट्टी लेकर हमारे साथ तपस्या कीजिये क्या पता आप सब की सरकार जल्दी सुन ले । साहब आप लोगों की तपस्या से हम बेचारे गरीब-दुखिया को गाँव  में सताया  नहीं जायेगा, हमें भी पूरा राशन मिलेगा , हमारे  बच्चे भूखे नहीं सोयेगे कहते हुए उनकी धर्म पत्नी ने हमसे रामलीला मैदान में आने का आग्रह किया ।

साहब, हमें पूरी मजदूरी मिलेगी , ठेकेदार और प्रधान को हिस्सा नहीं देना पड़ेगा , पीला / लाल राशन – कार्ड बनवाने के लिए पैसा नहीं देना पड़ेगा। एक बात और बताऊं साहब जी बड़े  अस्पताल में ( सरकारी अस्पताल ) डाक्टर को भर्ती करने के लिए पैसा नहीं देना पड़ेगा । साहब हमारी एक ही बहु थी , गर्भवती थी , भर्ती कराने के लिए  बड़े अस्पताल ले गया , डाक्टर साहब ने  भर्ती करने  के लिए मोटी रकम मांगी , मैं नहीं दे पाया तो डाक्टर साहब ने मेरी बहु को भर्ती नहीं किया । अस्पताल के बाहर ही दर्द के मारे छटपटाते हुए बहु ने पोते को जन्म देकर हमसे रूठ कर भगवान् के पास चली गयी ।  अब आप ही बताइए साहब हम गाँव के किसान मेहनत  – मजदूरी करके अपना पेट भरते है , घूस देने के लिए इतना पैसा कहा से लायें ।  “भालत माता ती – तय”  , कहते हुए एक करीब पांच साल का बच्चा हाथ में तिरंगा लिए हुए और “मै अन्ना हूँ” की टोपी लगाये हुए यूं.पी. के एक खालौर गाँव के रामावतार जी की गोद में आकर बैठ गया । यही हमारा पोता है साहब । आप स्कूल जाते हो ? मैंने उस बच्चे पूंछा । वो बच्चा हमारी तरफ देखने लगा शायद उसको समझ नहीं आया । अभी ये तो बहुत छोटा है ये 5 कि.मी. दूर स्कूल कैसे जायेगा ? रात्रि लगभग 3 बजे बीडी पीते हुए , उस बच्चे की  तरफ से जबाब रामावतार जी ने दिया ।

हम नेत्रहीनों को आज भी भीख मांग कर अपना पेट भरना पड़ता है  , और तो और सरकारी सहायता पाने के लिए रकम का लगभग आधा हिस्सा घूस देना पड़ता है । इसलिए मै अपनी नेत्रहीन पत्नी के साथ अन्ना जी के समर्थन आया हूँ , रात्रि करीब 4 बजे फरीदाबाद के सच्चिदानंद जी  ने हमें अपने रामलीला मैदान में आने का करण बताया । हमारे बहुत आग्रह करने पर सच्चिदानद एक देशभक्ति गीत ” ये मेरे वतन के लोगों…” सुनाया  । इसके बाद मेरी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई ।

अन्ना जी के ऊपर सरकार द्वारा किये गए चार जून की रात्रि का जलियावाला बाग – सा अपना घनघोर कु-कृत्य दोहराना चाहती थी परन्तु समय रहते जनता ने सरकार के मंसूबों को भांप लिया और  अन्ना  जी की समर्थन  में  सड़क  पर  आ  गयी  ।  जहां एक तरफ अन्ना समर्थन में छत्रसाल स्टेडियम में आम लोगों के द्वारा दी गयी स्वतः गिरफ्तारी हो रही थी तो दूसरी तरफ सरकार के दांव-पेंचों से दिल्ली  की सड़कों पर अन्ना जी भ्रमण कर रहे थे । अंत में सात दिन के लिए सरकार के वकील-मंत्रियों ने अन्ना जी को सरकारी आवास अर्थात तिहाड़ जेल मुहैया करवा दी और अगले ही कुछ पलों में उन्हें छोड़ दिया गया  । बस यही से भारत का भोला जनमानस सरकार की इस क्रूरता के खिलाफ और भारत के संविधान द्वारा नागरिको को प्रदत्त  मौलिक अधिकार के हनन के  मुद्दे पर सारी  जनता अर्थात सड़क से लेकर संसद तक अन्ना जी के समर्थन में आ गयी । परिणामतः दिल्ली में अनशन न करने देने की जिद पर अड़ी सरकार को मजबूरी में रामलीला मैदान देना पड़ा ।

मेरे मन में यह प्रश्न लगातार उठ रहा था की इतने लोग दिल्ली जैसे शहर में आये कैसे ? कौन थे ये लोग ? इन प्रश्नों का उत्तर जब मै स्वयं रामलीला मैदान गया तो मुझे स्वयं ही मिल गया ।

बहरहाल , भारत की जनता के बारे में प्रायः ऐसा कहा जाता है कि यहाँ की जनता समझदार के साथ – साथ बहुत भोली है । जनता के बीच जाकर उनसे बात करने के बाद लगा मुझे लगा कि लोग सच ही कहते है,  मै इस बात से पूर्णतः सहमत भी हूँ ।  परन्तु 16 अगस्त , 2011 को जिन मांगों को लेकर अन्ना जी ने अपने साथियों के साथ भारत से लगभग 65 % भ्रष्टाचार ख़त्म करने कि बात कही थी,  क्या अन्ना जी की वो मांगे 27 अगस्त , 2011 तक सरकार द्वारा मान ली गयी ?  मसलन :-

1. सरकार अपना कमजोर बिल वापस ले। नतीजा : सरकार ने बिल वापस नहीं लिया।
2. सरकार लोकपाल बिल के दायरे में प्रधान मंत्री को लाये। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।
3. लोकपाल के दायरे में सांसद भी हों : नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र नहीं।
4. तीस अगस्त तक बिल संसद में पास हो। नतीजा : तीस अगस्त तो दूर सरकार ने कोई समय सीमा तक नहीं तय की कि वह बिल कब तक पास करवाएगी।
5. बिल को स्टैंडिंग कमेटी में नहीं भेजा जाए। नतीजा : स्टैंडिंग कमिटी के पास एक की बजाए पांच बिल भेजे गए हैं।
6. लोकपाल की नियुक्ति कमेटी में सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम हो। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।
7. जनलोकपाल बिल पर संसद में चर्चा नियम 184 के तहत करा कर उसके पक्ष और विपक्ष में बाकायदा वोटिंग करायी जाए। नतीजा : चर्चा 184 के तहत नहीं हुई, ना ही वोटिंग हुई।

राजीव गुप्ता

उपरोक्त के अतिरिक्त तीन अन्य वह मांगें जिनका जिक्र सरकार ने अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में किया है वह हैं :-

1.सिटिज़न चार्टर लागू करना,
2.निचले तबके के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना,
3.राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति करना। प्रणब मुखर्जी द्वारा स्पष्ट कहा गया कि इन तीनों मांगों के सन्दर्भ में सदन के सदस्यों की भावनाओं से अवगत कराते हुए लोकपाल बिल में संविधान कि सीमाओं के अंदर इन तीन मांगों को शामिल करने पर विचार हेतु आप (लोकसभा अध्यक्ष) इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजें।

मुझे ऐसा लगता है कि 15 अगस्त 1947  देश  जहां खड़ा था आज भी वही खड़ा है ! कही टीम अन्ना द्वारा किए गए समझौते ने देश को उसी बिंदु पर लाकर तो नहीं खड़ा कर दिया ?  जनता के विश्वास की सनसनीखेज सरेआम लूट को विजय के  नारों की आड़ में छुपाया तो नहीं जा रहा है ? क्या एक बार फिर भोली जनता के विश्वास का चीर – हरण होगा ? ….. फैसला आप करें।

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3 thoughts on “क्या इस बात की गारंटी है कि फिर से नहीं होगा जनता के विश्वास का चीरहरण ?

  1. नमस्कार !

    मै भी आप सबके साथ हूँ….शायद आप लोग नहीं समझ पा रहे जो मैंने कोशिश कि है लिखने की ! .मै भी इस देश का आम आदमी ही हूँ , हम सभी इस भ्रष्टाचार के कैंसर रूपी बीमारी से त्रस्त है …. हम सबको इस बीमारी का इलाज़ चाहिए….ये भी सही है….अर्थात उद्देश्य तो ठीक है और सबका एक ही है कि खुशहाल भारत देखने की ! दिक्कत ये है कि हम सभी जिसे आजकल अन्ना टीम कहा जाता है , हमने उद्देश्य पूर्ति के मार्ग चुनने में या तो ज्यादा आशावादी हो गए थे या तो व्यवस्था से टकराने की तैयारी सही से नहीं कर पाए ……मसलन :-
    १. जबतक मांगे पूरी नहीं हुई अनशन से उठे क्यों…..????
    २. अनशन सिर्फ अन्ना जी ने ही क्यों किया ( और लोगों अर्थात सदस्यों ने बारी बारी से क्यों नहीं किया , कोई व्यक्ति कितने दिन तक भूखा रह सकता है )….?????
    ३. रामलीला मैदान तो पंद्रह दिन ( बाद में बढाया भी जा सकता था ) के लिए मिला ही था , धरना क्यों ख़त्म किया….????
    ४. IBN7 ( हिंदी न्यूज चैनल ) के एक कार्यक्रम , एजेंडा में कांग्रेस के प्रवक्ता श्री शकील अहमद ने कल ( २ सितम्बर , २०११ ) को ताल ठोकते हुए कहा कि हमें अन्ना जी की एक भी मांगे नहीं मानी , ये कहने का अवसर उन्हें हमने क्यों दिया….?????
    ५. कांग्रेस के एक राजनेता श्री संजय निरुपम जी ने नवभारत में एक लेख लिखा है कि ” वो क्या था जिसका जश्न मनाया गया “…… उन्हें ऐसा कहने की नौबत क्यों आई …..?????
    ६. गद्दाफी को हटाने के लिए वहा खून खराबा कई महीनो से चल रहा है ..और हम तो शांतिप्रिय लोग है , सभ्य तरीके से क्या आन्दोलन मंजिल मिलने तक नहीं चला सकते थे…?????
    ७. हमारे आन्दोलन का उद्द्देश्य था – भ्रष्टाचार से मुक्ति , न कि शांतिपूर्ण आन्दोलन चलाना जिसे के चलते हम अपनी पीठ थपथपा रहे है , हमें कोई आन्दोलन की प्रकृति को लेकर किसी से आवार्ड थोड़ी चाहिए ??? उद्देश्य पूर्ति का नारा था – आजादी की दूसरी लड़ाई , इसलिए १६ अगस्त का दिन चुना गया था !

    किसी का कुछ भी मत हो सकता है लेकिन मै रात को दिन कैसे कह दूँ……..? ! सच यह है मै स्वयं , (अप्रैल में जंतर – मंतर पर भी था) छत्रसाल स्टेडियम , तिहाड़ जेल और रामलीला मैदान में भी बड़ी आशा के साथ अपनी नौकरी को दांव पर लगाकर आन्दोलन में भाग लिया था ( मेरे जैसे और भी कई लोग निश्चित ही होंगे ) , पर व्यक्तिगत रूप से निराश हुआ !
    अंत में मुझे ऐसा लगता है कि इसे आर पार की लड़ाई लडनी चाहिए थी , जब तक मांगे न मान ली जाती , अन्ना जी की अनुपस्थिति में भी बारी बारी से लगातार अनशन और धरना चलते रहना चाहिए था और लोकतंत्र को पुनः परिभाषित करना चाहिए था कि ” जनता ही जनार्दन है या सत्ता नहीं ” ! हमने समझौता करके सुनहरा अवसर गवा दिया ….और अब पुनः ऐसा आन्दोलन खड़ा करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी , और तब तक सत्ताधारी भी “सचेत” हो जायेंगे…..! हो सकता है कि मेरे लेख में कुछ त्रुटी हो आप सबके आशीर्वाद और मार्गदर्शन से समय के साथ ठीक हो जायेगी परन्तु मेरी व्यथा ठीक है ऐसा मुझे लगता है ! हम सब मिलकर एक सशक्त और खुश-हाल भारत का निर्माण कर विकसित भारत बनाने में अपना अपना योगदान देंगे , ऐसी मेरी सभी भारत-वासियों से अपेक्षा है !
    आपके आशीर्वाद और मार्गदर्शन का आकांक्षी
    राजीव गुप्ता

  2. हमें गुमराह न करें!
    हमारे एक बुद्धिजीवी भाई ने लिखा है कि अन्ना टीम ने ऐसा क्या किया जो देश खुशियाँ मना रहा है हम अभी भी उसी ९ अप्रेल की जगह में हैं (जन लोकपाल बिल की) जैसे कि : १. अन्ना टीम ने कहा था कि ३० तरीख तक बिल पास हो जायेगा – मगर वह नहीं हुआ | २. स्टैंडिंग कमेटी से बिल बायपास होगा – नहीं हुआ| हम उस बुद्धिजीवी भाई से पूछना चाहते हैं कि आप यह कैसे कह सकते हो कि ९ अप्रेल के बाद कुछ हुआ ही नहीं, हमारी सबसे बड़ी जीत तो यह है कि हमारे देश की जनता ने संसद के सभी सदस्यों को अन्ना जी के प्रति व उनकी अहिंसात्मक लडाई के प्रति नतमस्तक कर दिया व उन्हें सलाम करने पर बाध्य कर दिया, और देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब सर्व सम्मति से बिल के प्रस्ताव को पारित करके स्टैंडिंग कमेटी में भेज दिया गया| क्या उन्हें यह जीत कम नज़र आती है हर महान योद्धा एक बडी जीत के लिये जरुरत पडने पर बुध्दिमत्ता पूर्ण एक कदम पीछे होकर एक एतिहासिक जीत को प्राप्त करने की तैयारी में लग जाता है |
    देश की जनता सब समझ चुकी है और यह भी जान गई है कि हम सही दिशा की तरफ बढ़ रहे हैं, अब हमें कोई गुमराह नहीं कर सकता, हम उस बुध्दिजीवी से पूछना चाहते हैं कि अगर आपका प्रतिभाशाली बच्चा अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुये एक से एक पदक हासिल करता है और किसी वक्त कुछ ऐसा मौका आ जाता है, जब उस जीत को हासिल करने के लिये उसके प्रयासों की ही इतनी प्रशंसा हो जाती है, जिसके सामने पदक की कोई कीमत नज़र ही नहीं आती और तकनीकि कारणों से वह पदक आपके बच्चे को प्राप्त नहीं होता तब क्या आप अपने बच्चे को एक पराजित योद्धा कहेंगे और हतोत्साहित करेंगे, अगर नहीं तो आपका यहाँ दो राय (double standard) रखने का क्या औचित्य है|
    हम जानते हैं कि जब ग्रेजुयेशन का इम्तहान होता है तो उसमें पास होने के बाद डिग्री हमें कुछ समय के बाद प्राप्त होती है| हमारे देश के देशवासी इस बात को समझ चुके हैं कि हमने जीत तो हासिल कर ली है खाली डिग्री (जन लोकपाल बिल पास होना) मिलना ही बाकी रह गया है| डिग्री प्राप्त होने में कुछ मेहनत करनी पडेगी व कुछ समय तो लगेगा ही, यह तो सभी जानते हैं|
    अतः आप जनता को गुमराह नहीं कर सकते|
    जय हिन्द
    शिव नारायण शर्मा

    1. अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल-पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।
      सरकती जा रही है इस अन्ना मंडली की नकाब और डिग्री आने के बाद तो कहीं के नहीं रहेंगे।

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