आप सरकार बनाने को तैयार, जंतर-मंतर, रामलीला मैंदान या राजघाट में होगा शपथ ग्रहण..

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-हरेश कुमार||

दिल्ली में सरकार बनाने को लेकर चल रहा संस्पेंस अब खत्म ही होने वाला है। इस संबंध में आम आदमी पार्टी (आप) की बैठक चल रही है। गौरतलब है कि हाल में हुए विधानसभा चुनावों में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार बनाने के लेकर असमंजस की स्थिति कायम हो गई थी। इसका मुख्य कारण सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का सरकार गठने से इनकार रहा है तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी को कांग्रेस का बिना शर्त समर्थन ने पूरे खेल को दिलचस्प बना दिया था। आप के साथ दुविधा यह थी कि वह अगर सरकार बनाने से इनकार करती तो उस पर यह आरोप मढ़ा जाता कि उसने इस तरह के वादे कर दिए जिसे पूरा करना उसके बूते की बात नहीं थी और ऐसा हो भी रहा था। विपक्षी पार्टियों के नेता इस तरह की बातें मीडिया में करने लगे थे।arvind-6_122712091820

जैसा कि सबको मालूम है 8 दिसंबर को हुए मतगणना के बाद से 70 सदस्यों वाली दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और इसके 32 विधायकों को जीत मिली तो हाल तक अन्ना हजारे के साथी रहे और रामलीला मैंदान में जनलोकपाल को लागू करने के लिए अन्ना हजारे द्वारा किए जा रहे आमरण अनशन के बाद उनसे अलग होकर राजनीतक दल बनाने वाले आम आदमी पार्टी (आप) को 28 सीटें प्राप्त हुई। यह राजनीतिक पंडितों को हैरान करने वाला था। किसी को भी इसकी आशा नहीं थी।
आप के लिए दिल्ली में एक अंडर करेंट काम कर रहा था। भ्रष्ट व्यवस्था से सभी तंग आ चुके थे। बिजली-पानी, महंगाई की समस्या आम आदमी के लिए बहुत बड़ी समस्या बनकर उभरी है लेकिन सत्ताधारी दल को इसकी कोई परवाह नहीं थी। कांग्रेस को इस चुनाव में जनता ने एक सिरे से नकार दिया है और उसे मात्र 8 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। कांग्रेस को सत्ता विरोधी रुझान की आशंका तो थी लेकिन लोगों का गुस्सा इस कदर भड़केगा, इसका अंदाजा नहीं था। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी को 1 सीट और एक सीट जनता दल यूनाइटेड को मिली है।
आप और कांग्रेस की स्थिति सांप और छुछूंदर की जैसी हो गई है। आप के सामने दुविधा यह थी कि उसने कांग्रेस के भ्रष्टाचार, बिजली-पानी बिल को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा था तो कांग्रेस के सामने किसी भी तरह से भारतीय जनता पार्टी क सरकार बनाने से रोकना था। इस बात की संभावना भी प्रबल होती जा रही थी कि अगर ज्यादा समय तक सरकार का गठन नहीं होता तो कांग्रेस के कुछ विधायक टूट भी सकते थे। क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को सरकार के गठन के लिए 4 विधायक चाहिए था और इतने का जुगाड़ करना कोई मुश्किल काम नहीं थी, लेकिन सभी पार्टियों के गले की फांस आप द्वारा किए गए नए प्रयोगों की सफलता बन गई थी। वरना अब तक तो ये काम हो भी गया होता। सभी पार्टियां अचानक से शुचिता पर उतर आईं। अपने को राजनीतिक तौर पर ईमानदारी दिखाने के लिए पार्टियों ने एकदम से रंगे सियार की भूमिका इख्तियार कर ली।

कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता आप के द्वारा सरकार बनाने से पहले ही डर गए हैं। लेकिन वे कुछ कर भी तो नहीं सकते ना। भले ही बाद में समर्थन ले लें। जैसा कि अतीत में इंदिरा गांधी ने चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी ने चंद्रशेखर फिर देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की सरकार से समर्थन वापसी लेकर किया है। कांग्रेस के नेताओं को अपनी भ्रष्टाचार की जांच का डर है। उसे लग रहा है कि उसी की समर्थन से सरकार बनाने वाली आप पार्टी उसी का सूपड़ा साफ करेगी जैसा कि पहले तो चुनावों में किया और अब जांच कराके, लेकिन कांग्रेस की स्थिति तो अब समर्थन देने के बाद सांप-छुछूंदर की जैसी हो गई है। सारी स्थिति से कांग्रेस नेतृत्व अवगत है लेकिन मौजूदा स्थिति में उसके पास आप को समर्थन देने के अलावा कोई चारा भी नहीं है। एक तो उसे चार राज्यों में बुरी तरह हार हुई है और दूसरी तरफ भविष्य में राह आसान नहीं है।

इन सबके पीछे लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक होना रहा है। अगले साल 2014 में मार्च महीने में लोकसभा का चुनाव प्रस्तावित है और कोई भी दल अपने को जोखिम में डालना नहीं चाहता है। राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि थोड़े से लाभ के लिए उसे भविष्य में बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इधर, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि अगले छह महीने में आम आदमी पार्टी को भी आंटें-दाल का भाव मालूम हो जायेगा। फिर पता चलेगा कि सरकार चलाना कितना मुश्किल काम है और कोरे वादे करना कितना आसान है। लेकिन दूसरी तरफ, आप के नेताओं का कहना है कि हम सरकार बनाकर दिखायेंगे कि किस तरह से अपने चुनावी वादों को पूरा करेंगे।

आज दोपहर साढ़े 12 बजे के लगभग आप के नेता अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उप राज्यपाल नजीब जंग से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। इससे पहले 11 बजे प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन करके केजरीवाल जनमत संग्रह के नतीजों के बारे में बतायेंगे। हो सकता है कि बुधवार या गुरुवार तक सरकार का गठन हो जाये।

गौरतलब है कि कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन देने से दुविधा में फंसे आप ने सरकार गठन के लिए मतदाताओं के बीच जाकर जनमत संग्रह कराना उचित समझा जिससे कि आगे चलकर उस पर ये आरोप ना लगे कि जिस पार्टी के खिलाफ उसने चुनाव लड़ा, चुनाव के बाद उसकी के साथ मिलकर सरकार बना रही है। जब यही नौटंकी करनी थी तो फिर हमें क्यों बरगलाया गया। सबको पता है कि हमारी जनता किस तरह से भावनात्मक तौर पर बस एक नारे में अपना रुख बदल देती है। सो कोई भी कदम उठाने से पहले राजनीतिक दलों को सोच-विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह के समर्थकों ने एक नारा दिया था – राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है और फिर आगे क्या हुआ, सब जानते हैं। इससे पहले इंदिरा गांधी ने नारा दिया था – आधी रोटी खायेंगे, इंदिरा सरकार लायेंगे और हुआ भी वही।

सूत्रों के अनुसार, सरकार जंतर-मंतर, राम लीला मैंदान या राजघाट में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जा सकता है। केजरीवाल के अनुसार, वे दिल्ली के लोगों को असली स्वराज देंगे। लोकसभा चुनाव नजदीक है और आप के पास जनता को किए वादों को पूरा करने के लिए बहुत कम समय है। उसे सबसे पहले जनता से किए वादे कि हर घर को 700 लीटर पानी मुफ्त और बिजली कंपनियों का ऑडिट कराना है। आप के मंत्री लुटियंस जोन के बजाये अपने-अपने घरों में रहेंगे और किसी तरह की विशेष सुविधा का उपयोग नहीं करेंगे।

जैसे ही आप के द्वारा सरकार गठन का प्रस्ताव उप राज्यपाल के पास आयेगा वे इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजेंगे और फिर वहां से राष्ट्रपति को भेजा जायेगा और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के साथ ही सरकार गठन के लिए दिन और वक्त तय किया जायेगा। आप के अनुसार, वह अपने सारे वादों को पूरा करेगी औऱ कोई भी वादा ऐसा नहीं है से पूरा नहीं किया जा सके। सरकार बनाने में देरी के कारण 29 तारीख तक तो जनलोकपाल बिल पास नहीं किया जा सकेगा लेकिन सरकार गठन के दस दिनों के अंदर में इस बिल को पास कर देंगे।
अब देखना है कि सरकार में कौन-कौन शामिल होते हैं। चूंकि दिल्ली में विधानपरिषद नहीं है और पार्टी के कई नेताओं ने या तो चुनाव नहीं लड़ा या वे हार गए जिसमें गोपाल राय, शाजिया इल्मी का नाम प्रमुख है तो संजय सिंह, प्रशांत भूषण और योगन्द्र यादव जिन्होंने पार्टी को खड़ा करने में विशेष योगदान दिया है। अभी तक की जानकारी के अनुसार, आप के छह विधायक मंत्री पद की शपथ लेंगे।
कुछ भी हो आप ने कम से कम स्थापित दलों औऱ राजनीतिज्ञों को एक सबक तो सीखाया ही है। उनका गुरुर तो तोड़ा ही है। कम से कम अब तो शीला दीक्षित या कांग्रेस या भाजपा के वरिष्ठ नेता ये तो नहीं कह सकेंगे कि चुनाव के बाद आप के नेता गाजियाबाद शिफ्ट कर जायेंगे। यह कमेंट्स इसलिए किया जा रहा था क्योंकि आप के ज्यादातर नेता जिसमें अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं, चुनावों से पहले गाजियाबाद में ही रहते रहे हैं। हां, वो चुनाव के लिए दिल्ली की मलीन बस्ती सुंदरी नगरी में रह रहे थे। इसे लेकर कई वरिष्ठ पत्रकार चुनावों से पहले कहते फिर रहे थे कि आप के अधिकांश नेता तो उत्तर प्रदेश में रहते हैं, उन्हें दिल्ली की वास्तविक स्थिति यानि समस्याओं के बारे में क्या मालूम। ऐसे लोगों की बोलती ही बंद हो गई है आजकल या उन्होंने पाला बदल दिया है।

चलिए, भारतीय राजनीति में आये नए बदलाव का स्वागत करिए और हम सब आशा करते हैं कि अन्य राजनीतिक दलों के नेता भी इस तरह की प्रक्रिया को आत्मसात करेंगे ना कि जनहित का नाम देकर अपना विकास जो अब तक करते आये हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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