‘भगत’ का गला घोंटने की कोशिश…

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अनिल शुक्ला||

50 बरस के लम्बे अंतराल के बाद बड़ी मुश्किल से पुनर्जागृत हो पाई आगरा की 4 सौ साल पुरानी लोक नाट्य परंपरा ‘भगत’ का गला घोंटने की कोशिश की जा रही है.bhagat

मज़ेदार बात यह है कि कोशिश वही लोग कर रहे हैं जो खुद को इसका अलम्बरदार बनने का दावा करते हैं.’ताज लिट्रेचर फ़ेस्टिवल’ में देश भर से आये हिंदी-अंग्रेजी के साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, फिल्मकारों और मीडिया जनों के सामने होने वाले इसके प्रदर्शन ‘संगत कीजे साधु की’ को कानूनीजामा पहना कर रोकने की कोशिश की गयी. प्रदर्शन से ठीक 2 दिन पहले किसी राकेश अग्रवाल, श्रीभगवान शर्मा वगैरा ने प्रदर्शनस्थल होटल क्लार्क शीराज़ के महाप्रबंधक को वकील के माध्यम से नोटिस भेजकर भगत का प्रदर्शन इस आधार पर न होने देने कि चेतावनी दी कि प्रस्तुति करने वाली संस्था ‘रंगलीला’ और ‘अखाडा दुर्गदास’ ने उनकी ‘परिषद से इजाज़त नहीं ली है’ और कि ‘ इस भगत के ख़लीफ़ा फूलसिंह यादव को ‘परिषद’ ने निष्कासित कर दिया है !’

पांच दशक पहले ‘भगत’ के मृतप्राय हो जाने की कई प्रमुख वजहों में एक इसके ‘ख़लीफ़ाओं’ के संगठन ‘काव्य कला भगत संगीत परिषद’ की अलोकतांत्रिक गतिविधियां भी हैं. दरअसल तब (और दुर्भाग्य से अब भी) इस ‘परिषद’ पर ऐसे तथाकथित खलीफाओं के गुट का कब्ज़ा था जो व्यापार से जुड़े थे, इस लोक नाट्य कला के ‘चौबालों’ की एक लाइन गुनगुनाने की जिन्हें तमीज भी नहीं हासिल थी और ‘ख़लीफ़ा’ का पद जिन्हें पैतृक रूप से प्राप्त हो गया था क्योंकि उनकी तीसरी या चौथी पीढ़ी के बुज़ुर्ग ‘भगत’ की सेवा करने के चलते ‘ख़लीफ़ा’ हो गए थे. 7 साल पहले नाट्य संस्था ‘रंगलीला’ ने ‘भगत पुनर्जागरण’ का जो सांस्कृतिक आंदोलन छेड़ा था खलीफा फूलसिंह यादव, अखाडा वृदावन बिहारीलाल (छीपीटोला) के गुरु गद्दी स्व० सुमेदीलाल जैन और अखाड़ा चौक चमन के निर्देशक डॉ मिहीलाल यादव सहित दर्जनों भगतकर्मी सक्रिय हुए थे. ‘रंगलीला’ का नारा था -‘नए दौर की नयी भगत !’ यानि भगत की पुरानी राग रागनियों को छेड़े बिना इसके कथ्य और शिल्प को आज के समय के हिसाब से तैयार किया जाय. साल में लगातार चल रही ‘रंगलीला’ और ‘अखाड़ा दुर्गदास’ की हर भगत प्रस्तुति को दर्शकों का व्यापक जनसमर्थन और प्रशंसा मिल रही है जबकि लोक कला की दुहाई देने वाले इस ‘गैंग ऑफ फोर’ के यदा कदा हुए उबाऊ और थकाऊ प्रदर्शनों में दर्शक ही नहीं जुटते. इस खिसियाहट मे आप दर्शकों का तो कुछ बिगाड़ नहीं सकते तो चलो उस भगत को ही नहीं होने दिया जाय जिसे देखने वे उमड़ पड़ते हैं ! ‘भगत’, कला के किन्ही 2-4ठेकेदारों की बपौती नहीं, यह आगरा की 400 साल पुरानी विरासत है जिसे बचाना और सहेजना समूचे शहर और देश भर के कलाप्रेमियों का दायित्व है. आइये संस्कृत विरोधी इन अलोकतांत्रिक तत्वों से कला की इस शानदार विरासत को बचाएं !

“भगत” के पुनर्जागरण का संघर्ष इस लिंक को खोल कर पढ़ें…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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