बाबरी विध्वंस के बाद की स्थिति दुहरा सकता है इतिहास, कांग्रेस को सीधा फायदा

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-मीडिया दरबार डेस्क|| 

अशोक सिंघल का बयान अगर परवान चढ़ गया तो बाबरी विध्वंस के बाद का इतिहास दुहरा सकता है जिसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिलेगा। अन्ना अभियान के कर्ताधर्ता शुरू से ही कहते आ रहे हैं कि ये भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाला यह अभियान पूरी तरह गैरराजनीतिक है। पिछली बार जब अन्ना जंतर मंतर पर अनशन कर रहे थे तो भाजपा की निष्काषित नेत्री उमा भारती को मंच पर जाने से न केवल रोक दिया गया था बल्कि उनका जबर्दस्त बहिष्कार किया गया था। इसी तर्ज पर आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव को भी मंच से भारी जनदबाव के बात एक नाटकीय ढ़ंग से मंच से उतार दिया गया था। इसके बाद नेताओं ने खुद ही रिस्क लेना छोड़ दिया और मीडिया के जरिये देश भर में यह संदेश गया कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहा यह अभियान पूरी तरह गैर-राजनीतिक है और इसमें किसी भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी की संलिप्तता नहीं है।

अगर आंदोलन अपने अंतिम चरण तक बिना किसी अप्रिय घटना के पहुंच गया तो इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यही रही। सिविल सोसायटी के बाद मुख्यधारा की मीडिया ने मध्यवर्ग का शगुफा छोड़ा जो बहुत दूर तक गया। कहा गया कि मध्यवर्ग ही इस अभियान को ऑक्सीजन दे रहा है और यह अभियान एक पवित्र रास्ते पे है। ऐसे समय में अशोक सिंघल का यह बयान कि अभियान को खर्चा पानी विश्व हिन्दू परिषद और उसकी शाखा धर्म यात्रा महासंघ दे रहा था, एक बड़ी खबर है, इस खबर का खबर न बनना उससे भी बड़ी खबर यह है।

इस अभियान में जो बातें ताल ठोक कर कही गईं उसमें से सबसे अधिक दिलचस्प इस इस अभियान में युवाओं की भूमिका थी। कपिल सिब्बल के लोकसभा क्षेत्र चांदनी चौक में जनमत संग्रह के दौरान जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय सहित कई विश्वविद्यालयों के छात्रों ने भाग लिया। मीडिया में ये खबर इसी तरह आई और कहा गया कि इस अभियान की कमान युवाओं के हाथ में है। संभव है पिछले कुछ महीनों में पूरा देश एक विशेष सम्मोहन के वश में था और सिंघल के बयान ने उस सम्मोहन तो तोड़ दिया है। बावजूद इसके मीडिया अब भी उस सम्मोहन में ही दिख रहा है।

इसका प्रमाण अशोक सिंघल के बयान को तूल न देना है। जेपी आंदोलन के समय गुजरात में छात्रों की निर्णायक भूमिका, बाबरी विध्वंस के बाद यूपी के विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति का गणित, तेलंगाना में उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्रों की भूमिका, झारखंड बंटवारे के समय वहां के विश्वविद्यालयों का उबाल जैसे उदाहरण जब मौजूद हों तो इन्हें हथियार बनाने की कला होनी चाहिए। यह कला अन्ना अभियान में खूब दिखी। कलाकार भी खूब दिखे और अरविंद गौर इस मामले में बड़े उस्ताद निकले।

इस अभियान में रेडिकल युवाओं की भूमिका न होने की बात पर मै पूरी तरह सहमत हूं। युवा अगर इस अभियान में थे तो प्रबंधन वाली मानसिकता वाले न की रेडिकल। इसका सबसे बेहतर उदाहरण यह है कि इस अभियान में शामिल स्वंयसेवकों को आईकार्ड दिया गया था, जो शायद किसी भी क्रांतिकारी अभियान का हिस्सा मेरी जानकारी में अबतक नहीं रहा है। इसे सिर्फ इन तर्कों के विरूद्ध इस्तेमाल किया जाये कि आंदोलन युवाओं का था।

मैं बहुत हद तक इस बात से सहमत हूं कि युवाओं को इस अभियान ने बतौर मोहरा बनाया। ऐसा उन युवाओं के साथ ही हो सकता था जो रेडिकल न होकर कुछ और प्रजाति के हों। अशोक सिंघल के बयान से अब यह साफ हो गया है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन में किस तरह के युवा थे और जो युवा खुद को इससे जोड़ नहीं पाए उनकी क्या मानसिकता रही होगी और इस अभियान को लेकर उनकी दूरदर्शिता कहां तक गई होगी।

आज अगर दलित विचारक सह सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप मंडल अरविंद केजरीवाल को सरेआम यह चुनौती दे रहे हैं कि वह अशोक सिंघल पर मानहानी का मुकदमा ठोकें तो इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। दिलीप मंडल अपने जमाने में छात्र राजनीति में काफी सक्रिय रहे हैं और झारखंड बंटवारे में अग्रणी भूमिका में रहे हैं। अन्ना टीम क्यूं नहीं अशोक सिंघल के बयानों का खंडन करने का साहस जुटा रही है। दिनेश यादव जैसे युवा के आत्महत्या पर वह टीम क्यूं चुप्पी साधे है जिसने पूरे अभियान में कई बार युवा युवा नाम का जाप किया।

2006 में जाति आधारित आरक्षण के विरोध में यूथ फॉर इक्वलिटी की रैली के दौरान ऋषि राज गुप्ता की आत्महत्या पर नजर दौराइए तो शक और गहरा होगा। गुप्ता की मौत को मीडिया ने आरक्षण विरोधियों के पक्ष में रिपोर्ट किया था। गुप्ता हलवाई जाति के लोग अपने नाम के अंत में लगाते हैं। मीडिया ने यह बताया था कि गुप्ता एक छात्र था। जबकि बाद में पता चला कि वह पांच साल से गुटखा बेचता था। क्या दिनेश यादव की मौत भी ऐसे ही कोई सवाल खड़े करेगी? क्यूं चुप है अन्ना टीम इस घटना पर और क्यूं मीडिया गुम है?

6 दिसम्बर 1992 को जब बाबरी विध्वंस हुआ तो एक बारगी ऐसा लगा कि भाजपा की लहर चलेगी। विध्वंस के बाद राज्य के विश्वविद्यालयों में हुए चुनावों में जिस तरह से स्थापित राजनैतिक दलों के उम्मीदवार हारे, उससे यह निष्कर्ष निकला कि प्रदेश की राजनीति एक नई दिशा तलाश रही है। बनारस, इलाहाबाद, कुमाउं, लखनउ तथा अलीगढ़ विश्वविद्यालय के चुनावों में भाजपा तथा कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार तो बुरी तरह हारे, जनता दल और सपा समर्थित उम्मीदवार भी वामपंथियों का समर्थन पाकर ही जीत पाये। इलाहाबाद, बनारस तथा कुमाउं विश्वविद्यालयों के अध्यक्ष पद पर इंडियन पीपुल्स फ्रंट की शाखा आइसा के उम्मीदवार भारी बहुमत से जीत गए। अन्ना अभियान को अगर उस परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो कांग्रेस को सीधा लाभ मिलता दिख रहा है। गेंद अभी भी अन्ना टीम के पाले में है।

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