सांप्रदायिक हिंसा विधेयक, कितना सही…

admin 4
0 0
Read Time:7 Minute, 36 Second

साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक जो वर्तमान  में पूरी होने की प्रक्रिया  में है विधेयक को कल केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद आज लोकसभा में पेश  किया गया.

1 (1)

इस अधिनियम का प्रारूप  संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा तैयार किया गया है. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने १४ जुलाई २०१० को सांप्रदायिकता विरोधी बिल का खाका तैयार करने के लिए एक प्रारूपसमिति का गठन किया था और २८ अप्रैल २०११ की एनएसी बैठक के बाद नौ अध्यायों और १३८ धाराओं में तैयार हिंदी में अनूदित किया. इस अधिनियम की सबसे अधिक विवादस्पद बात ये है कि इस विधेयक में यह बात पहले से ही मान ली गयी है की हिंसक केवल बहुसंख्यक होते हैं अल्पसंख्यक नहीं.

विधेयक की जो सबसे महत्वपूर्ण बातें है ‘समूह की परिभाषा’ समूह का तात्पर्य भाषाई अल्पसंख्यकों से है जिसमे वर्तमान स्थितियो के अनुरूप अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो को भी शामिल किया गया है पूरे विधेयक में सबसे ज्यादा आपत्ति भी इसी बात पर है की इसमें बहुसंख्यक समुदाय को समूह की परिभाषा से अलग रखा गया है.

इस विधेयक के अंतर्गत आने वाले अपराध उन अपराधो के अलावा हैं जो अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम  १९८९ के अधीन आते है.1 (2)

विधेयक में निर्धारित  किया गया है किसी भी व्यक्ति को उन हालात में यौन सम्बन्धी अपराध के लिए वो दोषी माना जायेगा यदि वह किसी ‘समूह से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति के, जो उस समूह का सदस्य है, विरुद्ध कोई यौन अपराध करता है परन्तु यदि पीडिता उस समूह ही सदस्य नहीं है तो यह अपराध नहीं माना जायेगा. इसका सीधा प्रभाव बहुसंख्यक महिला पर पड़ेगा यदि सांप्रदायिक दंगो की स्थिति में वे यौन अपराध का शिकार होती है तो यह अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा क्योंकि बहुसंख्यक समूह की परिभाषा में नहीं आते है.

विधेयक में घृणा सम्बन्धी प्रचार उन हालात  में अपराध माना जायेगा जब को व्यक्ति मौखिक या लिखित तौर पर स्पष्टतया अम्यावेदन करके किसी समूह या समूह से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्ति के विरुद्ध घृणा फैलता है. लेकिन समूह द्वारा घृणा फ़ैलाने की स्थिति में विधेयक मौन है.

विधेयक के अनुसार जो सशस्त्र सेनाओं अथवा सुरक्षा  बलों पर नियंत्रण रखते है और अपने कमान के लोगो पर कारगर  ढंग से अपनी ड्यूटी निभाने हतु नियंत्रण रखने में  असफल होते है उन्हें भी दण्डित किये जाने का प्रावधान है.

विधेयक में प्रत्यायोजित दायित्व का सिद्धांत दिया गया है, किसी संगठन का कोई  व्यक्ति या अधिकारी अपने अधीन अधीनस्थ कर्मचारियों  पर नियंत्रण रखने में नाकामयाब रहता है तो यह उसके द्वारा किया गया एक अपराध माना जायेगा और वह उस अपराध के लिए प्रत्यायोजित रूप से उत्तरदायी होगा जो कुछ अन्य लोगों द्वारा किया गया है इस तरह किसी संगठन का एक भी व्यक्ति  अल्पसंख्यक समुदाय के विरूद्ध  किसी अपराध में लिप्त  पाया जाता है तो पूरे संगठन को दण्डित किया जा सकता है.

विधेयक में सांप्रदायिक जिम्मेदारी भंग होने स्थिति में वरिष्ठ लोक सेवको  पर जिम्मेदारी तय करने करने सम्बन्धी प्रावधान में गंभीर खामियां है, अगर वरिष्ठ लोक  सेवको के अधीनस्थ ने भी गंभीर अपराध किया है तो इसके लिए सज़ा उन्हें ही मिलेगी.

इस विधेयक में ऐसे  लोकसेवको के खिलाफ एक नेशनल  अथारिटी बनाने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इस प्रावधान के दोनों ही प्रकार के नकारात्मक  और सकारात्मक पहलू होंगे जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

इस विधेयक का बीजेपी, शिव सेना, ऐ आई ऐ डी एम के, तृणमूल कांग्रेस और कई हिन्दू संगठन सहित कई सामाजिक संगठन भारी विरोध कर रहे है. उनका कहना है कि ये केवल अल्पसंख्यको को सुरक्षा प्रदान करती है परन्तु अल्पसंख्यको के आक्रमण से पीड़ित बहुसंख्यको को यह अधिनियम कोई सुरक्षा  प्रदान नहीं करता है.

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश टी थॉमस ने कहा  है कि यह बिल असंवैधानिक और विखंडनशील है, इसलिए इस बिल की कोई जरुरत नहीं है, वास्तव में किसी सरकार  का ऐसा कोई भी कदम जो दो अलग आधारों पर नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करता है तो निश्चय ही उसे विखंडन की मानसिकता से प्रेरित ही कहा  जा सकता है.

केंद्र और राज्य  सरकारे हिंदूवादी दलों और सिमी जैसे संगठन पर कोई  ध्यान नहीं देती है और जब दंगा होता है तो कथित तौर  पर दोषी लोगो की धर पकड़ होती है. सांप्रदायिक दुष्प्रचार किया जाता है तब राजनितिक दल, अधिकारी और पुलिस सोई  रहती है. विधेयक लोकसेवको को दोषी तो मानती है लेकिन राजनैतिक दलों के नेताओ को नहीं, सांप्रदायिक आधार पर काम करने वाली सरकार  को नहीं, कछुए की चाल से चलने वाली न्यायपालिका को नहीं.

इस अधिनियम के तहत  विशेष अदालत, जज और अभियोजक उपलब्ध कराने का प्रावधान है लेकिन अपराधियों को अल्पसंख्‍यकों और बहुसंख्यकों में बांट कर न्याय किया जा सकता है? क्या ऐसे कानून से हिंसा और दंगा रुक जाएंगे? पीडितो को अल्पसंख्‍यकों और बहुसंख्यकों में बांट कर कहाँ तक न्याय कर पाएंगे?

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments
No tags for this post.

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

4 thoughts on “सांप्रदायिक हिंसा विधेयक, कितना सही…

  1. कोई कुछ भी कहे कांग्रेस ने अपना ऐसा वोट बैंक तैयार करने का मानस बना लिया है,जिससे वह सत्ता में बनी रह सके.अब बहुसंख्यक हिंदुबंक कि चिंता नहीं क्योंकि उस पर तो दूसरी पार्टियों की नज़र है, साथ ही वे लोग कांग्रेस की सेक्युलर छवि का अर्थसमझ चुके है. इस लिए एक बार फिर देश को बंटवारे की कगार पर ला खड़ा करेंगे.अब हिन्दू धीरे धीरे अलपसंख्यक हो जायेगा. नसबंदी में विश्वास न करने वाले मुसलमानों की संख्या में प्रगति हुई है यह बात हालिआ रिपोर्ट में उजागर हो ही चुकी है.यह बिल समाज में और दूरियां बढ़ाएगा. जैसा पिछले दिनों मुज़ज़फरनगर के दंगों के बाद देखने को मिल रहा है.

  2. कोई कुछ भी कहे कांग्रेस ने अपना ऐसा वोट बैंक तैयार करने का मानस बना लिया है,जिससे वह सत्ता में बनी रह सके.अब बहुसंख्यक हिंदुबंक कि चिंता नहीं क्योंकि उस पर तो दूसरी पार्टियों की नज़र है, साथ ही वे लोग कांग्रेस की सेक्युलर छवि का अर्थसमझ चुके है. इस लिए एक बार फिर देश को बंटवारे की कगार पर ला खड़ा करेंगे.अब हिन्दू धीरे धीरे अलपसंख्यक हो जायेगा. नसबंदी में विश्वास न करने वाले मुसलमानों की संख्या में प्रगति हुई है यह बात हालिआ रिपोर्ट में उजागर हो ही चुकी है.यह बिल समाज में और दूरियां बढ़ाएगा. जैसा पिछले दिनों मुज़ज़फरनगर के दंगों के बाद देखने को मिल रहा है.

  3. ये बिल किस ने बने क्यों बनाया किस उद्देश्य से बनाया इस की नियति क्या थी इन सवालो के जबबा से ये बाटी साफ़ हो जाती है की सड़यंन्त्र की दिशा क्या है इस का विरोध कोण कर रहे है और कोण मओं रह कर समय की टाक में बैठे है या मोंन रह समर्थन कर रहे है इन बातो से इस्पस्थ्य हो जाता है मुस्लमान कि जमात ने ये बिल सोनिया कि अधियच्छता में बनाया १५ लोंगो कि सदसयता बाली कमिटी में ९मुस्लमान थे हर्ष मंदर भी िे में थे इस बिल कि नीयति थीं बातो के लेकर ही सामने लायी जा रहै है १९४७ से ले कर आज तक जितने दन्गे हुए जीतनी जांचे हुयी उने परिणाम किया थे १००% दंगे मुसलमन पहल कर ने बल सामंज रहा है आक्रामक रहा है एक भी पहल हिन्दू कि नहीं थी ये आने वाला बिल केवल हिन्दुयो को कुचल ने वाला बिल है संभिधान में आज तक यदि लोकतन्त्र है मरियादा है तो उस का कारन केवल हिन्दू ही है अनन्यता इस्लाम केवल हटिया में ही विशवास करता है दुनिया के सारे मुसलिम देश ईएस बात का जिन्दा प्रमाण है संविधान कि मूल भवन को ख़तम करने का ये सद्यन्तर्रा है हिन्दू को मिटने कि ये कोशिश है लूट का माल लूटरे को ही देने का नियॉन य है धर्म परावर्तन करने को मज़बूर करेने का ये सड्यन्त्र है लोग अल्प्शंखियक बना चाहे नगे लोंगो में असुरक्छा कि भवन आएगी लोग धर्म परिवर्तन करेंगे यो किरस्तनिटी को भी बढ़ावा मिलेगा ये सड़यंत्र है हिन्दू ना केवल दको पर उतरेगा बल्कि हत्तीयर भी उठाने को मज़बूर होंगे सोनिया चाहती भी यही है देश टूट जाए हिन्दुयो सावधान रहे देश को बचन है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

लोकमत समूह के कर्मचारियों का शोषण कब तक चलता रहेगा...

मीडिया दरबार को लोकमत श्रमिक संघटना, नागपुर द्वारा भेजे गए एक मेल के अनुसार महाराष्ट्र के प्रमुख अख़बार समूह लोकमत के मालिकों द्वारा समूह के कर्मचारियों का बरसों से शोषण ज़ारी है. कोयला घोटाले के आरोपी सांसद और इस समूह के मालिक विजय दर्डा एक अतराफ़ तो अपने पिता के […]
Facebook
%d bloggers like this: