केजरीवाल के 18 सवाल और दिल्ली सरकार…

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-सत्येन्द्र हेमंती||

मानव निर्मित कोई भी तंत्र प्रकृति के नियमों से पार नहीं पा सकता। प्रकृति की लाठी तो सिर्फ मजबूत काठी के पास ही होती है उसमें सिर्फ हांकने के सिद्धांत पर ही विश्वास किया जाता है। मानव ने प्रकृति के ऐसे सिद्धांतों से लड़कर ही अपनी श्रेष्ठता बनाये रखी है। उसने अपने प्राकृतिक स्व (इड) को काबू कर उस पर सामाजिक चेतना का मजबूत आवरण भी चढ़ाया, उसने लाठी को ही सब कुछ नहीं माना उसने पिछड़ते लोगों का हाथ थामकर अपनी गति पर अंकुश लगाना भी सीखा। राजतन्त्र से लोकतंत्र व समाजवाद तक अपनी चेतना का भावनात्मक सफ़र जारी रखा। लेकिन किसी भी तंत्र और वाद के शिखर ने प्रकृति के लाठी और हांके जाने के सिद्धांत का साथ शायद ही कभी छोड़ा।government

सामाजिक चेतना का स्तर हर व्यक्ति में अलग-अलग व अलग-अलग रूपों में होता है। कमजोर व पिछड़ो का भावनात्मक लगाव कई लोगों को गति देता है तो कई लोगों की गति को अनवरत विराम। पर सवाल उनकी अपनी गति का नहीं बल्कि उस चेतना के प्रगतिशील होने का है जो जनमानस में जन के मानस होने को जिलाए रखता है। प्रकृति में अगड़े व पिछड़े का संघर्ष तो चिरस्थायी है ये तो प्रकृति के साथ ही समाप्त होगा पर संघर्ष की मशाल जितनी प्रदीप्त होगी उतना ही प्रकृति पर सामाजिक चैतन्य व मनुष्यता का प्रभाव विराट होगा।

भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक चेतना के आम्बेडकर, गाँधी व जय प्रकाश नारायण जैसे विराट व्यक्तित्व भी हुए हैं, जिन्होंने गहराती खाईयों को नापने की और पाटने की जीवन पर्यंत कोशिश की। कुछ पाताल जैसी गहराइयाँ कम हुई तो तंत्र के प्राकृतिक स्व वाले तथाकथित मानवों ने नई खाईयां भी बनाई। संघर्ष के नए प्रतिमान बने, नए चैतन्य भी उभरे, उन्होंने भी अपना स्व त्यागा और संघर्ष के धर्म को अपना लिया। कुछ गुम नामी में मशाल हाथों में लिए जीवन होम कर रहे हैं तो कुछ ने मशालों की श्रृंखला बना दी। उनका तेज न तो छुप पाया और न ही उन्होंने उसको छिपाने की कोशिश की। अन्ना से केजरीवाल का संघर्ष इसी कड़ी का है। इस संघर्ष में भी कई जीवन होम हो रहे हैं तो कई स्व भी जुड़ रहे हैं। होम करने वाले अकसर कमजोर और लाचार नजर आते हैं जबकि स्व प्रबल हो तो भीड़ आसानी से जुट जाती है।

अन्ना के जन संघर्ष से उभरे केजरीवाल का संघर्ष भी कहीं न कहीं स्व से ऊपर उठकर जनतांत्रिक मूल्यों का संघर्ष है। उनका संघर्ष प्रारम्भ से ही सामाजिक न हो कर राजनैतिक ही रहा है। उनकी दिशा मध्यम वर्ग के इर्द गिर्द घूमती तंत्र पर करारी चोट करती है। वो उपचार वादी हैं, वो तंत्र में रहकर उसकी दुखती रगों को ढूंढते हैं और फिर उनका उपचार। उनका नजरिया यथार्थ वादी, धनात्मक व दिशा देने वाला है। वे विप्लव वादी नहीं हैं तंत्र को उखाड़ने में यकीन नहीं रखते उनका आचार विचार मध्यम वर्गीय है और सोच व समस्याएं इसके इर्द गिर्द ही घूमती हैं। वे विवादित सामाजिक मुद्दों का जिक्र तक नहीं करते, आरक्षण के मुद्दे पर हमेशा मौन नजर आते हैं, कश्मीर समस्या पर हल्के बयान देने से नहीं चूकते, फिलवक्त दिल्ली मुंबई की शहरी जिन्दगी को ही भारत समझते हैं। मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि होने के कारण उनका संघर्ष मध्यम वर्ग की सोच व सच्चाई को अच्छी तरह से समेटता है। ये उसी का परिणाम है कि उनके संघर्ष में ऐसे युवाओं का योगदान कांग्रेस के लिए ईर्ष्या का कारण बन जाता है।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में केजरीवाल की पार्टी को मिली प्रत्याशित मगर चौंकाने वाली जीत ने उनके इस अधूरे पन को कुछ हद तक उजागर कर दिया कि एक व्यक्ति की सोच समस्त जन व तंत्र को प्रति स्थापित नहीं करती। एक तंत्र को बनने बिगड़ने में कई वर्षों की उठा पटक का योगदान होता है। वर्तमान में उनसे अपेक्षाओं के सैलाब ने उनको कठिन परिस्थितियों जरूर डाल दिया है पर उनका परफेक्शन का नजरिया ही उनके संघर्ष में सबसे बड़ा बाधक सिद्ध हो सकता है। उनका यह मान लेना कि सफलता के लिए गलती न होना शायद उनके यथार्थवादी नजरिये में एक अवरोध उत्पन्न करता है। मेरी दृष्टि में यदि कोई व्यक्ति स्व से ऊपर उठ जाय तो उसका कोई कदम त्रुटिपूर्ण तो हो सकता है पर असफलता का कारण नहीं।

केजरीवाल के सरकार बनाने के सन्दर्भ में उठाये गए 18 सवाल यदि स्व से ऊपर उठकर उठाये गए हैं तो जन सरोकारों के नवोदित केजरीवाल राजनैतिक पटल पर एक नई प्रगतिशील दिशा देते हुए राष्ट्र में जरूर स्थापित होंगे और शायद वो जन सरोकारों के सवालों के अतिरिक्त उनके क्रियान्वित हो सकने वाले जवाब भी दे पाएंगे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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