सावधान मिस्टर केजरीवाल, कहीं ये ‘आप’ का काल न हो जाए…

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-पश्यंती शुक्ला||

केजरीवाल की 28 सीटों की ये विजय पताका उनके सुकर्मों से ज्यादा कांग्रेस, खासतौर से केंद्र की सरकार के कुकर्मों का फल है जिसका सबूत कांग्रेस का 8 सीटों पर सिमट जाना है. क्योंकि ये नहीं भूला जा सकता है कि बयार कितनी भी ‘आप’ की बही हो लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी ही बनी. ऐसे में ये समझना ज़रुरी हो जाता है कि अब जबकि सियासी समीकरणों की बिगड़ती इस गणित में इक्विलिब्रयम दोनों ही तरफ नहीं हो पा रहा है तो दोबारा चुनाव से क्या ये समीकरण थोड़े बदलेंगे? भावनाओं की जिस बयार में बह कर केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की नैया को पार लगाया है उसे दोबारा दोहराना संभव  होगा? ये होना थोड़ा मुश्किल लगता है.arvnd

प्रश्नों की तह मे जाएं तो दोबारा चुनाव समस्या का हल हो सकते है लेकिन क्रांतियां बार बार नहीं होती.  इस बात को अन्ना के रामलीला मैदान के अनशन की अपार सफलता और फिर उसके बाद की हर लड़ाई और अनशन की घोर विफलता ने हाल ही में एक बार फिर साबित कर दिया था. जो लोग रात-दिन नौकरियां छोड़कर रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार की खिलाफत के ढोल नगाड़े पीट रहे थे उनमें से बहुतों ने अन्ना के दूसरे अनशन की खबर को टीवी पर एक बार सुन लेने लायक भी नहीं समझा था. दबी जुबान में अन्ना के खेमे से लेकर आम जनता के बीच फिर ये सुर उठने लगे थे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. खुद केजरीवाल ने भी पार्टी बनाते समय माना था कि ‘हमने वो रास्ता इसलिए छोड़ा क्योंकि लोगों ने आना बंद दिया’.

इस बात को एक बार फिर केजरीवाल को एक बार फिर समझना होगा और उन्हे ये मानना होगा कि जो आम जनता केजरीवाल के ही साथ आई, लड़ी और जीती वो केवल इसलिए नहीं कि उसे केजरीवाल में बहुत भरोसा था बल्कि इसलिए ज्यादा क्योंकि राजनेताओं ने उसके नीचे की ज़मीन खींच कर विश्वास की नींव बिल्कुल हिला दी थी . खासतौर से सत्ता पक्ष ने पिछले दो सालों में मंहगाई, भ्रष्टाचार से लेकर बिजली, पानी, रोज़गार जैसे हर मुद्दे पर कभी उसकी खिल्ली उड़ाई तो कभी शोषण किया था. केजरीवाल ने इन भ्रष्टाचारियों से बदला लेने की एक उम्मीद जगाई और उसे एक दिशा दी. नतीजा नेताओं के रवैये से उकताई जनता एक बार फिर केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के साथ खड़ी हुई और 28 सीटों का तमाचा इन राजनेताओं के मुंह पर  मारकर खुद के बरसों से प्यासे दिल को दो बूंद जिंदगी की दे दीं.

लेकिन जैसे जिंदगी की दो बूंद बार बार नहीं ली जाती वैसे ही आप पर इतना भरोसा जनता दोबारा दिखा पाएगी वो भी तब जब लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की हवा न सही लेकिन फैक्टर तो हावी रहेगा ये एक बड़ा सवाल है? वो युवा वर्ग क्या करेगा जब उसके सामने ईवीएम की दो मशीनें होगीं जिसमें एक में उसके ‘सपनों के सीएम’ की तो दूसरे में ‘सपनों के पीएम’ की किस्मत छुपी होगी? क्या विस की मशीन पर झाड़ू का बटन दबाना और लोकसभा के लिए कमल का बटन दबाना एक ही समय में संभव होगा? विस्तार में सोचूं तो शायद नहीं. उसे एक फ़ैसला लेना होगा और वो ये भी हो सकता है कि पिछली बार मोदी की बात मान ली होती तो शायद दिल्ली अभी भी ईवीएम में अपनी किस्मत नही तलाश रही होती, या फिर ये कि अरविंद की बात मानी जाए क्योंकि देश को बदलना है क्योकिं भ्रष्टाचार का एक ही काल है और वो है केजरीवाल. ऐसी स्थिति में पुरानी विचारधारा उस पर हावी होगी, परिवार के उन बड़े बुज़र्गों का मत हावी होगा जिनसे छुपाकर वो केजरीवाल की वाल में एक ईंट अपनी भी जोड़कर आया था. ये खिसियाहट भी हावी होगी कि जब तुम सब जानते हो कि बीजेपी चाहे तो भी सरकार नही बना सकती क्योंकि न तुम न कांग्रेस उसके साथ आओगे तो टीवी चैनलों में ऐसे कुतर्क क्यों करते हो? जो सपना दिल्ली बदलने का दिखाया था जब उसे सच करने का मौका तुम्हे कांग्रेस से बाहर से समर्थन लेकर मिल सकता था या किरण बेदी की मध्यस्थता से नसीब हो सकता है तो तुमने उसे हमारी हक़ीकत क्यों नहीं बनाया.

ध्यान रहे जनता तर्कों से ज्यादा भावनाओं की मुरीद है तभी तो वो आम है और जो तर्क आप सब दे रहे हैं वो उस आम आदमी को बड़े फीके लग रहे हैं. शायद ये आप भी समझ रहे हैं इसीलिए इस बार आप सरकार बनाने का फैसला बंद कमरे में खुद कर रहे हो न कि जनता के पास जाकर उसकी राय मांग रहे हो. क्योकि उसकी राय तो जगज़ाहिर है जो तमाम टीवी चैनलों के सर्वे दिखा रहे हैं और जो शायद ‘आप’के लिए कुआं और खंदक की स्थिति है. इससे ‘आप’को जल्दी ही बाहर निकलना होगा अन्यथा ये आपका काल भी बन सकती है

 (लेखिका पश्यंती शुक्ला पूर्व पत्रकार हैं तथा टीवी एंकर भी रहा चुकी हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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7 thoughts on “सावधान मिस्टर केजरीवाल, कहीं ये ‘आप’ का काल न हो जाए…

  1. Dade saal mein 4 mantris, AAP PARTY né parliament mein pahunchayé hein bina kisi ki madad aur suport ké , AAPSABKO pataa hein ki midia né bhi sath chod diya, Fir bhi AAMADMIPARTY, 2end n° par rahi, so humein isé nigetive present nahi karna chahiyé.

  2. आप, आप पर शक कर रही है. आप जब पहली बार में २८ सीट ला सकता है तो दूसरी बार पूर्ण बहुमत में भी आ सकता है. पहले तो जनता को विश्वास नही था अब तो वो भी हो गया है.

  3. केजरीबाल की कोशिश में जो सफलता दिख रही है वो केवल कारन केज़रीवाल की ही पुननियाई नहीं है ये १००%सूच है कि जनता कोंग्रेस से तन्ग आ चुकी बिकल्लप्प तो बी जे पी ही थी लेकिन कोंग्रेस के लम्बे दुष प्रचार के कारन झूटी धर्म निरपेक्छा ता के कारन नया मतदाता हमेशा से भ्रम में रहता है वो अधिक समझा ही नहीं सकता कि रानीति कितनी गन्दी है समाज के सरोकारो से ये कितने प्रभावित कि जा सकती है बहुत सटीक लिखा गया है एस लेखा में अब जो वोट डालेगा बो बहुत विचारित सोचा समझा सटीक निर्णय के साथ आएगा जिस में बी जे पी को ही वोट होंगे केज़रिआल को भी यही अपील करनी पड़ेगी कि भाई वोट सोचा कर ही डालना और ये बात बी जे पी के ही हित में जायेगी निश्चित ही तस्वीर बदल जायेगी बहु मत बी जे पी की तरफ ही जाएगा

  4. पर एक बार इस झाड़ू ने सभी दलों की नींद उड़ा दी है,, धीरे धीरे इसमें भी अवसर वादी लोग घुस जायेंगे,राष्ट्रया स्तर पर दल के गठित होते ही ऐसा होना ज्यादा सम्भव है.आप का भी केन्दीय संगठन अभी इतना ज्यादा परिपक्व नहीं कि इन सब पर नियंत्रण रख सके.उनके भी विरोधभाषी बयां आने लग गए हैं.अभी सब जगह आप पार्टी के संगठन खड़े करने की होड़ लगी है जिसमें महत्वकांक्षी लोगों के घुसने की सम्भावनाएं बहुत ज्यादा है.अति उत्साह में कहीं बंटाधार न हो जाये. यदि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़ा तो जल्दबाजी में होगा ही.लोकसभा का चुनाव अच्छे संगठन के बिना लड़ना मुश्किल राजसत्ता कब किसी की, एक छत्र रह पायी है
    जनता के करवट की कीमत हर किसी ने चुकाई है

  5. पर एक बार इस झाड़ू ने सभी दलों की नींद उड़ा दी है,, धीरे धीरे इसमें भी अवसर वादी लोग घुस जायेंगे,राष्ट्रया स्तर पर दल के गठित होते ही ऐसा होना ज्यादा सम्भव है.आप का भी केन्दीय संगठन अभी इतना ज्यादा परिपक्व नहीं कि इन सब पर नियंत्रण रख सके.उनके भी विरोधभाषी बयां आने लग गए हैं.अभी सब जगह आप पार्टी के संगठन खड़े करने की होड़ लगी है जिसमें महत्वकांक्षी लोगों के घुसने की सम्भावनाएं बहुत ज्यादा है.अति उत्साह में कहीं बंटाधार न हो जाये. यदि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़ा तो जल्दबाजी में होगा ही.लोकसभा का चुनाव अच्छे संगठन के बिना लड़ना मुश्किल राजसत्ता कब किसी की, एक छत्र रह पायी है
    जनता के करवट की कीमत हर किसी ने चुकाई है

    पर एक बार इस झाड़ू ने सभी दलों की नींद उड़ा दी है,, धीरे धीरे इसमें भी अवसर वादी लोग घुस जायेंगे,राष्ट्रया स्तर पर दल के गठित होते ही ऐसा होना ज्यादा सम्भव है.आप का भी केन्दीय संगठन अभी इतना ज्यादा परिपक्व नहीं कि इन सब पर नियंत्रण रख सके.उनके भी विरोधभाषी बयां आने लग गए हैं.अभी सब जगह आप पार्टी के संगठन खड़े करने की होड़ लगी है जिसमें महत्वकांक्षी लोगों के घुसने की सम्भावनाएं बहुत ज्यादा है.अति उत्साह में कहीं बंटाधार न हो जाये. यदि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़ा तो जल्दबाजी में होगा ही.लोकसभा का चुनाव अच्छे संगठन के बिना लड़ना मुश्किल राजसत्ता कब किसी की, एक छत्र रह पायी है
    जनता के करवट की कीमत हर किसी ने चुकाई है

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