Home राजनीति सत्ता का दौर बदलेगा जरूर मगर बिना पटके नहीं…

सत्ता का दौर बदलेगा जरूर मगर बिना पटके नहीं…

-सत्येन्द्र हेमंती||
सत्ता समाज का पिरामिड होता है और राजनीति उस पिरामिड पर चढ़ने की सीढ़ी. या कुछ यूँ कहें राजनीति भी समाज का आईना ही होती है. जिस राजनीति में कीचड़ ही कीचड़ नजर आता है वो वास्तव में समाज में ही व्याप्त होता है. मतदाता राजनीति के हर पायदान पर खड़े नेतृत्व का मूल्यांकन करने के लिए अलग अलग दृष्टि व दृष्टिकोण रखता है.

त्रिस्तरीय भारतीय राजनीति की जमीनी राजनीति, मतदाता के व्यक्तिगत स्वार्थों, अपेक्षाओं और उपेक्षाओं पर Legal Eraही आधारित होती है. यहाँ न तो राजनैतिक आदर्शो के लिए ही कोई जगह होती है न ही सामाजिक मुद्दों के लिए. जबकि उसी राजनीति के दूसरे स्तर पर जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषा वाद सहित अनेक संगठित पूर्वाग्रहों का ही बोल बाला रहता है. शायद ही यहाँ पर भी कभी राजनैतिक आदर्शों या सामाजिक मुद्दों ने जगह बनाई हो. पर उसी मतदाता का चश्मा टॉप लेयर राजनीतिज्ञों पर साफ़ होने लगता है और यहाँ पर वह राजनैतिक आदर्शों व मूल्यों की अपेक्षा करने लगता है. मतदाता राजनीति व सत्ता के पिरामिड पर अपने आदर्शों व मूल्यों को बदलता नजर आता है. वो सत्ता के शिखर से जितना दूर होता जाता है उसके प्रति उतना ही आदर्शवादी बनता जाता है.

लोग अकसर इस दुविधा में रहते हैं कि आखिर चुनावों में सामाजिक व आर्थिक मुद्दे चुनाव का आधार क्यों नहीं बन पाते. असल में जिन सामाजिक मुद्दों पर राजनीति की दिशा निर्धारित होती है वो लोगों के जेहन और सोच में पल रहे हैं और वास्तव में वो हमारी सामाजिक स्थिति व आर्थिकी को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं. वे आपकी रोजी रोटी की दिशा तय करते हैं वे आपकी संभावनाओं और संवेदनाओं पर परोक्ष व ठोस प्रभाव डालते हैं. उनकी तुलना में अन्य मुद्दों का प्रभाव नगण्य ही होता है. फर्क सिर्फ इतना है कि उन मुद्दों को प्रकट करने की सामाजिक स्वीकृति होती है जबकि प्रभावी मुद्दे जेहनी और जनूनी.politics

भारतीय समाज की भी परिवर्तन की अपनी गति है. लोकतंत्र में स्थाई सामाजिक परिवर्तन हमेशा ही धनात्मक व प्रगतिशील होते हैं पर ऐसे परिवर्तनों की गति धीमी और उठा पटक लिए होती है. पिछले कुछ समय में प्रगतिशील आन्दोलन हुए, राजनैतिक क्षितिज पर कुछ नए बिम्ब भी उभरे. पर क्या वो सब, जो इनसे अपेक्षित है, प्राप्त हो पायेगा ? शायद हम इसे उस उठा पटक का हिस्सा तो मान सकते हैं, पर यह कोई सामाजिक या राजनैतिक क्रांति नहीं है, जो क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है. ये आन्दोलन इसलिए क्रांति नहीं हो सकते क्योंकि ये समाज में दूसरों से शुरू होते हैं. ये दूसरों से अपेक्षा कर अपने लिए जगह बनाते हैं. समाज का बिल्डिंग ब्लाक तो वही है तब निर्माण में नयापन कपड़े उतार कर चोला पहनना जैसा हो सकता है. सामाजिक बदलाव तो स्वयं से शुरू होता है, नींव के पत्थरों से शुरू होता है और तभी राजनीति में भी बदलाव सम्भव है.

राजनीति का हर दौर अपने लिए जगह बनाता है और उस प्रक्रिया में उन मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं का सहारा लेता है जो वास्तव में तत्कालीन समाज में स्वीकृत होते हुए भी परिवर्तन की प्रक्रिया में होते हैं. तब स्वीकृति तो मौन होती है पर प्रतिक्रिया मुखर. ऐसी प्रतिक्रिया सिर्फ दूसरों की सीमा में होती है और अपने लाभ के लिए. आपात काल से मंडल कमीशन तक, राम मंदिर से अन्ना हजारे तक, परिवर्तन अपनी ही गति से हुआ है और अब भी अपनी ही गति से होगा. सत्ता का दौर बदलेगा जरूर मगर बिना पटके नहीं.

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