मेरठ के उद्योगपति घराने की बहू नेहा दीवान संरक्षण दे रही थी नारायण साईं को..

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कुरुक्षेत्र के पीपली में गिरफ्तार पांच लाख के इनामी नारायण साईं का कनेक्शन मेरठ से भी जुड़ गया है. जिस फोर्ड इको स्पो‌र्ट्स गाड़ी से नारायण साई और उसके साथियों को दबोचा गया है वह मेरठ में पंजीकृत है और उस गाड़ी की मालकिन उद्योगपति दीवान घराने की बहू नेहा दीवान पत्नी अजय दीवान है.narayan-sai-inpolice-custody

नेहा मेरठ के 70 ‘ए’ साकेत में परिवार के साथ रहती हैं. इस गाड़ी (यूपी 15 बीएच 0033) का पंजीकरण इसी वर्ष 17 अक्टूबर को किया गया है. नेहा के पति अजय दीवान उद्योगपति हैं और दीवान रबर इंडस्ट्री समेत कई अन्य व्यवसायों से जुड़े हैं. नारायण साई की गिरफ्तारी के बाद दीवान परिवार घर से गायब हो गया. कोठी पर मीडिया व स्थानीय लोगों का जमावड़ा होने पर जमकर हंगामा हुआ. चर्चा तो यहां तक है कि फरारी के दौरान नारायण साई अपनी मित्र मंडली के साथ मेरठ में दीवान परिवार के साथ रहा था और उसकी उनके घर पर खूब आवभगत हुई थी. हालांकि यहां की पुलिस कुंभकर्णी नींद सोती रही और उसे भनक तक नहीं लगी.

दीवान परिवार की गाड़ी आसाराम के बेटे नारायण साई के पास कैसे पहुंची? इसके बारे में अभी परिवार का कोई व्यक्ति मुंह नहीं खोल रहा है. बताया जाता है कि दीवान परिवार आसाराम बापू व नारायण साई का भक्त है. मेरठ में जब कभी आसाराम का कार्यक्रम होता था तब यही परिवार उसके आयोजन का जिम्मा संभालता था. परिवार के ही किसी सदस्य के माध्यम से यह गाड़ी नारायण साई तक पहुंचाई गई है. चर्चा यह भी है कि दीवान परिवार ने यह गाड़ी नारायण साई को गिफ्ट में दी है. नारायण साईं की गिरफ्तारी होते ही अजय दीवान, उनकी पत्नी नेहा व परिवार के अन्य लोग साकेत कालोनी स्थिति कोठी से गायब हो गए हैं और मोबाइल स्विच ऑफ कर लिए हैं. अजय के भाई सचिन दीवान जरूर कोठी पर मिले लेकिन उन्होंने कुछ भी बताने से इन्कार करते हुए मीडिया व स्थानीय लोगों पर ही रोब झाड़ने की कोशिश की.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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