गोधरा…मुज़फ्फरनगर….अगला क्या…

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– नीतीश के. सिंह||

क्या सत्ता की संतुष्टि सिर्फ खून से ही होती है? या इंसानी मांस से ही सत्ताधारियों का पेट भरता है? आप और हम मानें न मानें लेकिन इशारे तो कुछ ऐसे ही हैं. कितने दिन गुज़रे हैं अभी मुज़फ्फरनगर के दंगों में मारे गए लोगों के घर मातम का असर कुछ कम हुए? अभी तो बच्चों और माओं के आंसू तक सूखे नहीं थे उस दंगों के बाद जो कि एक भ्रमित करने वाले फर्ज़ी विडियो के प्रसार से फैले थे.

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पाकिस्तान की घटना को असम की घटना बताया जा रहा है

गोधरा की रिपोर्ट्स भी ऐसे ही कुछ आंकड़े प्रस्तुत करती हैं जिनमें दंगों कि वजह अफवाह या कुप्रचार बताया गया था. कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर कल आपके सजातीय पड़ोसी की मौत के बाद आपका घर फूंक दिया जाये और उसको मज़हबी दंगों का नाम दे कर पूरे सोशल मीडिया में इसका प्रचार मज़हबी उन्माद फ़ैलाने के लिए किया जाये. ज्ञात हो कि मुज़फ्फरनगर दंगों में उन्माद फ़ैलाने वाला विडियो दंगों के दौरान फिल्माया नहीं गया था बल्कि पाकिस्तान के किसी दंगों का फिल्मांकन था.

लेकिन शायद राजनीति में रिश्तों और संवेदनाओं की कीमत नहीं बची है. तभी तो सोशल मीडिया, जिसको कि अतिवादी और चरमपंथी जड़ें फ़ैलाने के एक उत्कृष्ट माध्यम के रूप में अच्छे से पहचानते हैं, को भ्रामक सामग्री फ़ैलाने के लिए प्रयोग कर रहे हैं. ताज़ा मामला गुजरात के अमरेली की घटना का है, जहाँ विश्व हिन्दू परिषद् के तहसील अध्यक्ष और उनके भाई की रंजिश में 1 दिसम्बर को की गयी हत्या को फेसबुक पर मज़हबी रंजिश के फलस्वरूप की गयी हत्या के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. कुछ कट्टरपंथी साइट्स और पेज इन तस्वीरों को कुछ इस तरह शेयर कर रहे हैं जैसे धार्मिक उन्मादियों ने नया कारनामा करने की ठान ली है और अब बदला लेना ज़रूरी हो गया है. इन तस्वीरों और पोस्ट्स को लगातार शेयर और लाइक्स मिल रहे हैं और लोग प्रभावित हो रहे हैं, लेकिन असल बात कुछ और है.

amreliस्थानीय समाचार पत्रों कि ख़बरों, सूत्रों और पुलिस अधिकारी से हुयी बातचीत की माने तो ये मामला आपसी संपत्ति के विवाद का है और इसे बेवजह धार्मिक चोला पहनाने कि कवायद की जा रही है. स्थानीय समाचार पत्र जहां इसे संपत्ति का विवाद बता रहे हैं, वहीं सौराष्ट्र के पुलिस महानिरीक्षक राधाकृष्णन का कहना है कि यह एक सामान्य अपराधिक घटना है न कि साम्प्रदायिक हमला. सर्वविदित है कि पूर्व में दंगे इसी प्रकार के कुप्रचार के कारण हुए हैं और आने वाले चुनावी माहौल और सरगर्मियों के मद्देनज़र ऐसी खबरें और भी ज्यादा गंभीर हो जाती हैं.

सोशल मीडिया आज के परिदृश्य में काफी महत्वपूर्ण जरिया है और ये बात अपने आप में महत्वपूर्ण है कि की देश राजनीतिक और सामाजिक दिशा तय करने वाला बड़ा वर्ग, यानि कि युवा इन सामग्रियों को लगातार देख और पढ़ रहा है. ऐसे में इन उन्मादी अफवाहों को फ़ैलाने वाले लोगों कि सोच का दुष्परिणाम एक और दंगों के रूप में झेलना पड़ सकता है, और जब देश में मुज़फ्फरनगर और गोधरा तो छोडिये ’84 के दंगों का दर्द अभी तक बरक़रार है तब दंगों की आंच में स्वार्थ की रोटियाँ सेंकने वाले कब बाज़ आयेंगे और कब राजनीती खून से अपनी प्यास बुझाना बंद करेगी ये चिंता का विषय है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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