कितना कारगर है यौन शोषण को रोकने के लिए विशाखा दिशा निर्देश..

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-अनुराग मिश्र||

तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल का मसला अब लगभग अपनी परिणिति की ओर अग्रसर है. मीडिया के भारी दबाव व जनचेतना के चलते अब यह मामला कानून और कोर्ट के दहलीज पर पहुच चुका है. जहाँ समयानुसार व विधि सम्मत कार्यवाही होना लाजमी है.protest-against-tarun-tejpal

पर इन सबके बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा यौन शोषण के संदर्भ में जारी की गयी विशाखा गॉइडलाइन को जमीनी रूप से लागू किये जाने की मांग तेजी से उठ रही है. लगभग हर तरफ से ये आवाज उठ रही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किये गये विशाखा दिशा निर्देशों का पालन किया जाये और हर संस्थान अपने यहाँ महिलाओं की एक कमेटी बनाये जो यौन शोषण से जुड़े मामलो को देखें. इसलिए यहाँ पर विशाखा दिशा निर्देशों के विषय में भी थोड़ी सी चर्चा कर लेना आवश्यक.

विशाखा दिशा-निर्देश वर्ष 1997 में अस्तित्व में आया. जिया मोदी ने अपनी किताब टेन जजमेंट दैट चेंज्ड इंडिया में लिखा है कि विशाखा बनाम राजस्थान राज्य के संदर्भ में आया यह दिशा-निर्देश न्यायिक सक्रियता का चरमोत्कर्ष है. इस दिशा-निर्देश के तहत कंपनी की यह जिम्मेदारी है कि वह गुनाहगार के खिलाफ कार्रवाई करे. सुरक्षा को कामकाजी महिलाओं का मौलिक अधिकार मानते हुए इस निर्देश में यह कहा गया है कि शिकायत के संदर्भ में हर कंपनी में महिला-कमेटी बनाना अनिवार्य है, जिसकी अध्यक्षता न सिर्फ कोई महिलाकर्मी करेगी, बल्कि इसकी आधी सदस्य महिलाएं होंगी. इतना ही नहीं निर्देश में कहा गया है कि हर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने और ऐसे मामलों की सुनवाई का प्रबंध करने की ज़िम्मेदारी मालिक और अन्य ज़िम्मेदार या वरिष्ठ लोगों की हो. निजी कंपनियों के मालिकों को अपने संस्थानों में यौन शोषण पर रोक के विशेष आदेश दें. यौन उत्पीड़न की सुनवाई के दौरान पीड़ित या चश्मदीद के खिलाफ पक्षपात या किसी भी तरह का अत्याचार ना हो.

किन्तु यक्ष प्रश्न तो यही है कि क्या किसी संस्थान में विशाखा दिशा निर्देशों के तहत गठित कोई भी महिला कमेटी यौन शोषण की पीड़ित लड़की को इन्साफ दिला पायेगी ? क्या जिन अधिकारों की बात इस दिशा निर्देश में कही गयी है कमेटी उनका समुचित उपयोग कर पायेगी? वो भी उस स्थिति में जब यौन शोषण का आरोप संस्थान के किसी मुलाजिम पर न लगकर उस व्यक्ति पर लगा हो जो उस पूरे संस्थान का कर्ता धर्ता हो. जाहिर सी बात जवाब न में ही होगा क्योकि कमेटी भी उसी संस्थान का हिस्सा होगी जिसके मालिक या कर्ता धर्ता पर इस तरह के आरोप लगे होंगे. लिहाजा प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से कमेटी आरोपी के ही प्रभाव में होगी.

इसका सीधा और ताजा उदहारण तेजपाल काण्ड ही है, जहाँ तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी पर ये आरोप लगा कि तेजपाल को बचाने के लिए उन्होंने पीड़िता पर दबाव बनाया कि वो चुप रहे.

अब जरा सोचिये यदि तहलका में विशाखा दिशा निर्देशों के तहत कोई महिला कमेटी बनी भी होती तो क्या वो पीड़िता को इन्साफ दिला पाती? क्या तरुण तेजपाल और शोमा चौधरी के प्रभाव क्षेत्र से वो कमेटी मुक्त होती? जाहिर जवाब न ही होगा. इसलिए ये कहना कि कार्यस्थल पर यौन शोषण के उत्पीड़न को विशाखा निर्देशों के तहत गठित कमेटी के माध्यम से रोका या नियंत्रित किया जा सकता है सिर्फ आत्म संतुष्टि का एक जरिया मात्र होगा न की समस्या का समाधान.

बेहतर होगा कि यौन शोषण से जुड़े मामलो को कानून की दहलीज पर ही सुलझाया जाये. और इस देश की सशक्त न्यापालिका ही या तय करने दिया जाये कि दोनों पक्षों (यौन शोषण की पीड़िता और आरोपी) में कौन सही है और कौन गलत.

हालाँकि एक कटु सत्य यह भी है कि यौन शोषण के 70 फीसदी मामले अगर सही होते है तो 30 फीसदी मामले फर्जी और साजिशन फंसाने वाले भी होते है. इसलिए यह भी जरुरी है कि यौन शोषण मामलो की जाँच के समय इस बात का ध्यान रखा जाये कि मीडिया हाइप के दबाव में किसी निर्दोष को सजा न होने पाये क्योकि ऐसे मामलो सबसे ज्यादा दबाव मीडिया का ही होता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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