मीडिया इरेशनल और पगलाए लोगों के हाथों में कैद है…

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-जगदीश्वर चतुर्वेदी|| 

टीवी चैनलों की खबरें और टॉकशो यही संदेश देते हैं कि हमारे देश का मीडिया इरेशनल और पगलाए लोगों के हाथों में कैद है. किसी व्यक्ति विशेष या चर्चित व्यक्ति के नाम का अहर्निश प्रसारण पागलपन है.

एक जाता है दूसरा आता है. पहला पागल तब तक रहता है जब तक दूसरा पागल मिल नहीं जाता. यह मीडिया पागलपन है. हमें जनता की खबरें चाहिए, पागलों की खबरें नहीं चाहिए. यदि यह रिवाज नहीं बदला तो समाचार टीवी चैनलों को पागल चैनल कहा जाएगा.news channels

टीवी पागलपन वस्तुतः मीडिया असंतुलन है. मीडिया अपंगता है .

मीडिया संचालक अपने को समाज का संचालक या जनमत की राय बनाने वाला समझते हैं. सच इसके एकदम विपरीत है. अहर्निश प्रसारणजनित राय निरर्थक होती है. और चिकित्साशास्त्र की भाषा में कहें तो पागल की बातों पर कोई विश्वास नहीं करता . उन्मादी प्रसारण राय नहीं बनाता बल्कि कान बंद कर लेने को मजबूर करता है .

मीडिया पागलपन के तीन सामयिक रुप “मोदी महान”, “कांग्रेस भ्रष्ट” और “तेजपाल बलात्कारी”.

टीवी वालों, खबरें लाओ. एक बात का अहर्निश प्रसारण खबर नहीं है. चैनलों को देखकर लगेगा कि भारत गतिहीन समाज है. यहां इन तीन के अलावा और कुछ नहीं घट रहा!

भारत गतिशील और घटनाओं और खबरों से भरा समाज है.चैनल चाहें तो हर घंटे नई खबरें दिखा सकते हैं. लेकिन पागल तो पागल होता है! एक बात पर अटक गया तो अटक गया!!

टीवी एंकर अपने को समाज का रोल मॉडल समझते हैं और टॉक शो में उनकी भाव-भंगिमाओं को देखकर यही लगेगा कि इनका ज्ञान अब निकला! लेकिन ज्ञान निकलकर नहीं आता! वहां सिर्फ एक उन्माद होता है जो निकलता है. उन्माद का कम्युनिकेशन हमेशा सामाजिक कु-संचार पैदा करता है. यह एंकर की ज्ञानी इमेज नहीं बनाता बल्कि उसकी इमेज का विलोम तैयार करता है एंकर ज्ञानी कम और जोकर ज्यादा लगता है. उससे दर्शक खबर या सूचना की कम उन्मादी हरकतों की उम्मीद ज्यादा करता है. अब लोग टीवी खबरें और टॉक शो पगलेपन में मजा लेने के लिए खोलते हैं. हमारे समाज में पागल लंबे समय से सामाजिक मनोरंजन का पात्र रहा है. पागल के प्रति समाज की कोई सहानुभूति नहीं रही है.

न्यूज मीडिया में तेजपाल प्रसंग आने के बाद से अचानक यह फिनोमिना नजर आया है कि संपादकों-पत्रकारों में निजी तौर पर यह बताने की होड़ लगी है कि “हम तो तेजपाल जैसे नहीं हैं”. “सारा मीडिया भ्रष्ट नहीं है. ”

अब इन विद्वानों को कौन समझाए कि मीडिया पर संस्थान के रुप में ध्यान खींचा जा रहा है, यह निजी मामला नहीं है.

मीडिया कैसा होगा यह इस बात से तय होगा कि राजनीति कैसी है, राजनीतिकतंत्र मीडिया के बिना रह नहीं सकता और मीडिया राजनीतिकतंत्र के बिना जी नहीं सकता . ये दोनों एक -दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़े हैं.

भारत की राजनीति इस समय रौरव नरक की शक्ल ले चुकी है. ऐसे में निष्कलंक मीडिया संभव नहीं है . राजनीति जितनी गंदी होती जाएगी, मीडिया भी उतना गंदा होता जाएगा.

राजनीति की गंदगी से मीडिया तब ही बच सकता है जब वह खबरें खोजे, राजनीति और राजनीतिक दल नहीं. हमारे मीडिया ने खबरें खोजनी बंद कर दी हैं. राजनीतिक संरक्षक-मददगार खोजना आरंभ कर दिया है. फलतः मीडिया में खबरें कम और दल विशेष का प्रचार ज्यादा आ रहा है. यह मीडिया गुलामी है.

टीवी चैनलों के टॉकशो में आने वाले लोग हैं राजनेता, बैंकर, पत्रकार, वकील, राजनयिक, सरकारी अफसर आदि हैं. ये सारे लोग झूठ बोलने की कला में मास्टर हैं. ये ही ओपिनियनमेकर कहलाते हैं मीडिया में. इनमें अधिकांश मनो- व्याधियों और कुंठाओं के शिकार और गैर-जिम्मेदार होते हैं. मीडिया” इनकी खबर जनता की खबर”, “इनकी राय जनता की राय”. “इनके सवाल जनता के सवाल “. यही पैटर्न मीडिया ने पैदा किया है.

इस तरह के लोग जब मीडिया में जनमत की राय बनाने वाले होंगे तो सोचकर देखिए समाज में किस तरह की राय बनेगी ? मनो-व्याधियों के शिकार की राय कभी संतुलित और सही नहीं होती. वह खुद बीमार होता है और श्रोताओं को भी बीमार बनाता है . यही वजह है आम लोगों में टॉकशो को लेकर राय बहुत खराब है.

त्रासद बात यह है कि मनोव्याधि ग्रस्त ये लोग अपनी तमाम व्याधियां सामाजिक व्याधि बना देते हैं. वे स्वयं सत्तासुख पाने के लिए राय देते हैं और “जनता में भी सत्तासुख असली सुख है”.यही भावबोध पैदा करने में सफल हो जाते हैं.

जबकि सच यह है जनता के भावबोध, दुख, सुख और खबरें अलग हैं और उनका टीवी मीडिया में न्यूनतम प्रसारण होता है. अधिकांश समय तो ये मनो व्याधिग्रस्त लोग घेरे रहते हैं.इसी अर्थ में न्यूज चैनल पागल चैनल हैं.

(जगदीश्वर चतुर्वेदी की एफबी वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. SHAME LESS DEBATES—-MINDLESS COUNTERS-IRRITATING TONAL QUALITYS-ANCHOR is SUPER COURT JUSTICE ????…Whats HAPPENING to INDIAN MEDIA….Why SHOUTING on ANY PANELISTS—–BUT NOT on CHEATED PARTY like AAP—-INSULTING Every OTHER POLITICAL PARTY in INDIA…….I HATE as CITZEN of THIS NATION…..GABBAR SINGH was KIND .if HE is in To ANCHOR as TIMES NOW or HEADLINES TODAY–X NEWS….My Dear MEDIA Hav SOME Patintce TILL FEB 8 th 2015 As U UNDER RATED MAY 16 th 2014……
    ANNA-CRAZY-VISWAS-…U made Them STARS of NOTHING…..PLZ Dont INSULT ALL the SENIOR Politicians….RESPECT THEM…ALL R NOT THEIEVES……EVERY PARTY has BAD & GOOD,,,,,,
    …………………………………DONT MISREAD-MISJUDGE….DONT SHOUT in the DEBATES…OtherWISE ONE DAY SOME CHANNEL STARTS ..DOGS BARKING SHOW……
    ………………………………………………………..Dialogue STAR PRAVEEN CHAKRAVARTHY

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