”आगे से कभी ऐसे आन्दोलन की कवरेज नहीं करूंगी, चाहे नौकरी क्यों न छोड़नी पड़े…”

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कभी तिहाड़ जेल तो कभी रामलीला मैदान.. अन्ना के आंदोलन पर रिपोर्टिंग और पल-पल की ख़बरें जुटाने के लिए तैनात रहे पत्रकारों के लिए यह अनुभव थोडा अलग रहा। हालांकि मीडिया, खासकर खबरिया चैनलों ने इन तेरह दिनों में अपनी दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी टीआरपी में जमकर व्यवसाय किया, लेकिन  किसी मीडिया इवेंट की तरह तैयारी कर की गई कवरेज में मीडियाकर्मियों के लिए मिले-जुले अनुभव रहे।

पत्रकार स्मृति के मुताबिक कई समर्थक सिर्फ हुड़दंग मचाते हैं और अश्लील टिप्पणियां करते हैं।

आम लोगों को चाहे ऐसा लगे कि पत्रकार होने की वजह से अन्ना हज़ारे के आंदोलन को नज़दीक से देख पाना एक बेहतरीन अवसर है, लेकिन इनके मुताबिक ये अनुभव खट्टा ज़्यादा और मीठा कम है। रामलीला मैदान में बीबीसी के पत्रकार ने कवरेज में जुटी महिला पत्रकारों के दुख-दर्द पर एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें कईयों ने साफ कहा कि अगर ऐसा आंदोलन दोबारा हुआ तो वे इसे कवर करने कभी नहीं जाएंगी। जरा सुनिए बीबीसी के पत्रकार की आपबीतीः

स्कूली बच्चे: अन्ना के नाम पर हुड़दंग?

मधुलिका एक समाचार एजेंसी में काम करती हैं. वो मुझसे बात करना शुरू करती हैं तो अचानक कई लड़के हमें घेर लेते हैं. हम उस भीड़ से बाहर निकलकर एक कोने में जाते हैं तो वो आराम से बात कर पाती हैं। मधुलिका के मुताबिक एक महिला के पत्रकारिता का हिस्सा बनते ही ये मान लिया जाता है कि वो बद्तमीज़ी से निपटने को तैयार है। ऐसे में अक़्सर ये समझाना मुश्किल हो जाता है कि भीड़ एक महिला पत्रकार को कैसे परेशान करती है। रामलीला मैदान में चल रहे आंदोलन पर वो कहती हैं, “यहां जैसे स्कूली बच्चे और युवाओं की तादाद बढ़ती जा रही है, वो नारेबाज़ी करने, महिलाओं को देखने, बेरोकटोक उनकी तस्वीरें खींचने के लिए आ रहे हैं, जैसा करने की छूट वो सड़कों पर महसूस करते हैं.”

स्मृति एक टेलिविज़न समाचार चैनल में काम करती हैं, यानि दिन या रात किसी भी समय काम हो सकता है। लेकिन उनका मानना है कि रात के समय रामलीला मैदान में शराब पीकर लोग जमा हो जाते हैं और ऐसे में महिला पत्रकार किसी हाल में यहां काम नहीं कर सकतीं। हालांकि दिन में काम करने के भी उनके बहुत सुखद अनुभव नहीं हैं। स्मृति बताती हैं, “पहले तो यहां जुटे लोगों को देखकर लगता था कि सभी समर्थक हैं, पर अब जो लड़के यहां इकट्ठा होते हैं उनसे बात करो तो ना उन्हें आंदोलन के बारे में, ना अन्ना के बारे में ही कोई जानकारी होती है।”

एक और टेलिविज़न समाचार चैनल में काम करने वाली सरोज कहती हैं कि उन्हें अनशन के नवें दिन जब रात के समय रामलील मैदान आना पड़ा तो वो अचानक जनता के बीच घिर गईं। उन्होंने फोन कर अपने दफ़्तर में कहा कि अब वो वहां नहीं ठहर पाएंगी। सरोज ने कहा, “उस वक्त को मैं सचमुच डर गई थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था, शराब की बदबू और ढेर सारे लोग, आख़िरकार एक पुरुष सहयोगी को बुलाया तो उनकी मदद से ही मैं मैदान से सुरक्षित निकल पाई।”

अनु कहती हैं, “यहां अब मेला सा लगा है, जैसा इन लोगों का आचरण हैं, ये लोग नहीं समझते कि ये बर्ताव इस आंदोलन को ही नुकसान पहुंचाएगा।”
अनु के मुताबिक माहौल बदल गया है, पहले जगह छोटी थी, और सब आराम से भजन और संगीत के ज़रिए अपनी बात रखते थे, लेकिन अब इस बड़े मैदान में विशेष तौर पर कुछ लोगों के ख़िलाफ या अन्ना के समर्थन में ही सही, पर ग़लत तरीके से नारे लगाए जा रहे हैं।

जन्तर-मन्तर की छवि ने अनु के मन में एक अलग ही उम्मीद जगाई थी, पर प्रदर्शन के इस बदलते स्वरूप ने उन्हें निराश किया है। रामलीला मैदान में भद्दे नारों और बद्तमीज़ लड़कों से कई बार रूबरू मैं भी हुई और अनु के आकलन को समझ सकती हूं। एक रात कुछ मोटर साइकिल सवार लड़कों ने पुलिस के साथ मार-पीट भी की. इससे पहले एक पुरुष पत्रकार के साथ भी कुछ समर्थकों ने मार-पीट की थी। अन्ना के अहिंसक घोषित किए गए इस आंदोलन से निबटने के लिए पुलिस को निहत्थे रहने की ताकीद की गई थी इसीलिए हमलावर मोटरसाइकिल सवार उनसे आराम से बदतमीजी कर चले गए।

आंदोलन से आकर्षित होने वाले लोगों की संख्या के साथ-साथ उसका स्वरूप बदला है ये समझ बढ़ रही है। ज़ाहिर है इससे अन्ना के समर्थकों के बीच पत्रकारिता, महिलाओं और पुरुषों के लिए भी और चुनौतीपूर्ण प्रतीत हो रही है।

दिव्या आर्य

(पोस्ट बीबीसीहिन्दी.कॉम में प्रकाशित खबर पर आधारित। यह रिपोर्ट बीबीसी की दिल्ली संवाददाता दिव्या आर्य ने  26 अगस्त को पब्लिश किया  था)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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47 thoughts on “”आगे से कभी ऐसे आन्दोलन की कवरेज नहीं करूंगी, चाहे नौकरी क्यों न छोड़नी पड़े…”

  1. If something bad was going on they should have broadcasted that also, why couldn’t they do that? Was there someone to stop them? And if they cannot go and cover movement like that they have no right to be a journalist. Its first duty of journalist to bring out truth and face hardship involved in this act.

  2. महेरबानी करके बरखा दत्त या वीर संघवी या राजदीप सरदेसाई या प्रणय रॉय मत बनना. ये लोगोने जूठे और fabricated रिपोर्ट्स दे करके मीडिया की creditibility को पूरा का पूरा ख़तम कर दिया हैं. इसमें एक और नाम भी शामिल हैं करण थापर. जूठे रिपोर्ट्स बनना, जो इन्हें पसंद न हो ऐसे व्यक्ति को टार्गेट बनना. जूठे रिपोर्ट्स दिखाना, ऐसे interview प्रसारित करना इनकी आदत रही हैं. रिपोर्टर हो तो रिपोर्टर ही रहो कोई निर्णयकर्ता आपकी भूमिका में शामिल नहीं हैं let people decide what they वांट, dont पुट your words in their मौत.

  3. आप सच में एक पत्रकार है ना ? आप ने ये खबर उसी वक़्त समाज के सामने लाई क्यों नहीं ? उसी वक़्त दूध का दूध और पानी का पानी होता ना ….

    आज दस पंधरा दिन के बाद आप चिल्लाएगी तो क्या असर होनेवाला हैं ? ये तो आप को भी अच्छी तरहसे पता होना चाहिए !

    मैडम अब चिल्लाने से कुछ फायदा नहीं होनेवाला बल्कि आप खुद अगली बार फिर अनशन कवर करोगी इतना पक्का हैं !

  4. मेरे प्यारे पत्रकारिता से सम्बंधित सभी सदस्य को प्रणाम ,
    मैं आप की मुश्किल को समझ सकता हूँ आप कह रहे है की एक लड़की पत्रकार कहती है की लड़के लड़कियों की फोटो खीचने के लिए या कुछ कहने के लिए आप को घेरा है या हो सकता है किसी ने कुछ गलत भी कहा होगा / लेकिन अगर आप इस बात से घबरा जाएँ तो आप तो पत्रकारिता ही नहीं सकते और न ही आप को पत्रकार होना चाहिए आप को वाही नौकरी करनी चाहिए जो आप को आराम दे सके / आप में से ही ऐसे भी अपने महान पत्रकार है जो वहां जा कर भी खबर देते है जहाँ गोलियां चल रही होती है और वे बेचारे नहीं दिखाते उनके अन्दर हिंदुस्तान का खून दौड़ रहा होता वो अपना कम बखूबी करते है / कृपया किसी को बदनाम न करे ………….

  5. यह तो सिर्फ १ ट्रेलर हे….पूरी पिक्चर अभी बाकी हे मेरे dost

  6. अगर आपने कभी किसी पोलिटिकल पार्टी की रैली की कवरेज की हो तो आपको पता लग जायेगा की अन्ना और पोलिटिकल क्लास मैं क्या अंतर है | मैं सिर्फ यह कह सकता हूँ की , आपको इस बात को मंच तक पहुचाना चाहिए था, अन्ना सारे उलट पहेलवानो को अपनी तीखी खड़ी बोली से ठीक कर देते ||
    अन्ना की अपील, सर्कार के नोटिस से ज्यादा असरकारक हो चुके है |

  7. Look, Kiran ji predicted the first day that the POLITICAL PARTIES, especially the Congress will send its Youth wing to create nuisance and try to spread violence. If these few reporters had a bad experience, that doesnt mean that the entire Ramlila Maidan was full of such ppl.

    वैसे भी राडिया TAPES के बाद मुझे इन रिपोर्टर्स पर ज़रा सा भरोसा नहीं रहा.
    केवल एक ही रिपोर्टर जो भरोसे के काबिल है :- जुलियन असांज 😛

    1. अन्ना का इस आंदोलोन में कुछ असामाजिक तत्वं द्वारा कुछ महिला पत्रकारों को हुई परेशानी निंदनीय है. पर इसकेलिए इस आन्दोलोंकारियों को दोषी ठहराना उचित नहीं है. अन्ना हजारे का ये आंदोलोन किसी संस्था द्वारा प्रायोजित नहीं वल्कि इस देश की जनता के लिए जनता द्वारा किया गया आंदोलोन था. भष्टाचार से पीड़ित जनता का आक्रोश था जिसे बदनाम करने की कौशिश की जा रहीहै. और कौन ऐसा कर सकता है? जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं नहीं चाहते की भ्रष्टाचार का बिरोध हो.क्योंकि भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया तो इनकी अययासी,सत्ता का सुख ख़त्म हो जाएगी.
      और इन महिला पत्रकारों को भी ऐसी भीड़ में काम करते समय अपनी पहनावा पर ध्यान रखना चाहिए क्योंकि अश्लील फिल्म,टीवी और विग्यांपन देख देख कर अपनी सभ्यता संस्कृति को भूलती जा रही भीड़ में असामाजिक तत्व भी हो सकते हैं या कोई उन्हें प्रायोजित भी कर सकता है.
      अतः इसके लिए अन्ना के आंदोलोन को या इस से दिल से जुड़े लोगों को गाली देना बिलकुल अनुचित है.

  8. औल अन्ना हजारे साथियों इस ब्लॉग पे बिलकुल ध्यान न दे ये सिर्फ साधारण जनता को गुमराह करने के लिए बनाया गया है. मैंने सिर्फ शुरुवात का एक या दो ब्लॉग पढ़े है इससे मुजहे ये लगा की जिस लड़की या मीडिया कर्मी के साथ ये हुवा है उसका कोई फ्रूफ है क्या उसके पास? अगर उसके साथ ये रेट पे या बस में या ट्रेन में या कॉलेज जाते समय होता तो क्या वो फिर से उस चीज़ से सफ़र नहीं करती या वो काम छोड़ देती. अभी भी समज लो की आन्दोलन देश की सामान्य जनता का था लोग अपने आप ही आन्दोलन से जुड़े थे कोई किसी को बुलाने नहीं गया था वह सभी प्रकार के लोग थे और सब अपनी तरह से आन्दोलन को सुप्पोर्ट कर रहे थे अभी इसमें कुछ गलत लोग आन्दोलन बिगढ़ ने की मंशा से आये हो तो इसमें अन्ना हजारे क्या कर सकते है ? अभी किसी के बातो में आकर या फिर अपने निजी स्वार्थ के लिए देश की हालत को मत बिगढ़ो और सही का साथ पकड़ो अगर तुम्हारी आत्मा जिन्दा है तो वरना भगवान सब बराबर करेगा.

    1. पंकज बेटा यह बता तेरी माँ और बहन के पास क्या प्रूफ है के उनके साथ रेप नहीं हुआ है ??? अन्ना के ह**** पिल्लो के तरह बकवास करना बंद कर

  9. आप को आई मानसिक परेशानिया ज़रा अन्ना को भी सुनावो,शायद वो आगे ऐसा सामान्य जनता को परेशान करनेवाला आन्दोलन न करो.लेकिन यह संभव नहीं लगता क्यों की अन्ना के माथे पे अभी आपही के मीडिया का भुत सवार है.आखिर आप लोगो ने ही यह भुत को सर पे बिठाया है ना.

  10. bat bhut kadawi hai, lekin kam chunoti ka bhee hai. bashak channal ke malik ko es bat se koi matlab nahi hoga. fesla jaldi lena, lekin jadbaji mat karna.

  11. आज लड़कियों को हर जगह पर सतर्क रहने की जरुरत है, मीडिया लाइन में तो लड़कियों इस बात के लिए संघर्ष करना चाहिए. पत्रकार बनना और संघर्ष से जूझना उसके बाद जो उचित लगे उसको समाज के सामने लाना एक पत्रकार का गुण है . अगर महिला पत्रकार रामलीला मैदान नही जाती तो वो इसको यहाँ खबर कैसे बना पति और हम यहाँ इस पर बहस कैसे कर पआते ?
    समाज की मअन्सिकता को एक नै दिशा देना हम पत्रकारों का फर्ज है
    – सुभाष व्यास
    मुख्य संपादक
    सलाम दिल्ली
    हिंदी समाचार पत्र

  12. हम भारतीय जितने सुसंस्कृत है उतने ही अपसंस्कृति वाले । आंदोलनों के किसी भी स्वरूप को हम भलीभॉति नहीं समझ सकते । खासकर भीड़ की संस्कृति को लेकिन यह बर्ताव जो हमारी लोकतंत्र के चौथे खम्भे का हुआ है वो अमानवीय है। आज हम टिप्पणी तो करते है लेकिन उसके कार्यकर रहे पत्रकारों के दर्द को नहीं समझतें हैं । आज यह जो बर्ताव महिला पत्रकारों के साथ हुआ है तो यह साफ है कि यह आन्दोलन के सच्चे समर्थक नहीं थें क्योंकि इन्हें सचमुच भारत और उसके क्रांतिकारियों के इतिहास की भी जानकारी नहीं है इसलिए ऐसे लोग आंदोलनों की सही छवि को धूमिल करते थे।

  13. शरम आनी चाहिए उन लोगो को जो एक महिला पत्रकार के बारे में ऐसी अनाप शनाप बाते कर रहे है! और उन लोगो को जो महिलओके साथ बत्तमीजी से पेश आते है! ऐसी बाते करते वक़्त और ऐसे कृत्य करते वक़्त जरा सोचिये के आपके घर में भी माँ-बहने होती है! अगर उनके साथ किसीने कोई बुरा बर्ताव किया या कुछ बुरा भला कहा तो आप पर क्या बीतेगी!
    एक लड़की अपने अनुभव के बारे में बता रही है, तो आप उसको बुरा साबित कर रहे हो! इसका मतलब यह हुआ के महिलाओ पर कितना भी अन्याय हो तो वो चुपचाप सहे! किसीसे कुछ ना कहे! अगर कहती है तो उसपर उंगलिया उठाई जा सकती है! और यह सोचकर वह अन्याय के खिलाफ आवाज़ ही ना उठाये!
    यह कुछ comment पढ़ने के बाद फिरसे एक बार यह साबित हो गया है के आज भी भारत में पुरुष प्रधान संस्कृति है!
    इस लड़की ने कही पर भी अन्नाजी के खिलाफ या उनके आन्दोलन के खिलाप कुछ नहीं बोला है! उसने आन्दोलन में जो भीड़ थी उनमेसे कुछ ऐसेभी लोग थे यह कहा है! कुछ निक्कमे, बदमाश लोग भी शामिल थे! जिन्हें इस आन्दोलन से कोई लेना देना नहीं था! बस इस तरह की नीच हरकते करने के लिए शामिल हुए थे! वह इस आन्दोलन को बदनाम नहीं करना चाहती वह बस अपने अनुभव के बारे में बता रही है! ताके आगे से हर महिला इस से कुछ सिख ले सके!
    और इस तरह से मेरा महिलओसे निवेदन है की वह कोशिश करे की किसी भीड़ का हिस्सा ना बने! क्यूंकि ऐसे नीच लोग उसमे शामिल हो सकते है! और महिला पत्रकारों के साथ कुछ सुरक्षा व्यवस्था भी होनी चाहिए! ताके ऐसे कृत्य उनके साथ ना हो पाए!

  14. इस पर मेरा निवेदन यह है :-
    संसार की किसी भी “स्त्री” के साथ अशोभनीयता का व्यवहार अस्वीकार योग्य है….ऐसे कृत्य निंदनीय है |

    स्त्रियों को कानूनी अधिकारों से बराबर का दर्जा लेते वक्त ध्यान रखना चाहिए | “स्त्री” वो शक्ति है जिससे पुरुष की अग्नि प्रज्जलित हो जानी है__इसलिए स्त्रियाँ को स्वयं को अधिक संभल कर चलना चाहिए | अर्थात स्त्रियों के लिए गरिमामय हो वो कार्य (जैसे :- कला, कविता-पुस्तकें लेखन, नृत्य-नाटक, शिक्षा, बैंक, प्रक्रति और पर्यावरण, प्रेम, सुसंस्कार, स्त्रियों का संतुलन, एक बच्चे को अच्छा देशवासी बनाना जिसकी वह आगे चलकर किसी स्त्री के साथ अशोभनीयता का व्यवहार नहीं करे__आदि..) करने को महत्व देना चाहिए |

    स्त्री की व्यवहार-गति (प्राकर्तिक-गति) कानूनी अधिकारों से नहीं चलती है |

    { स्त्री–ऊर्जा दाता है___पुरुष–ऊर्जा ग्रहण करता है }

    1. १८ वी सदी से बाहर आ जाए दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है महिलाये वह सब करने वाली है जो १८ वी सदी में महिलाओ के लिया प्रतिबंधित था पुरुष वोह सब करेगा जो उस के लिया प्रतिबंधित था

  15. एक पत्रकार को हर बात का हुनर होना चाहिए, हर क्षेत्र को समझना जरुरी है ।

  16. ऐसे लोगों को वेसे भी पत्रकारिता के क्षेत्र दूर ही रहना चाहिए ,, क्यों की यह कोई ग्लेमर की दुनिया नहीं रणभूमि है ,, और रन भूमि में सबकुछ सहना पड़ता है ,इन्हें पत्रकारिता में नहीं फिल्मो में होना चाहिए ,, थोड़े लिखे को जियादा समझना …

  17. मेरे प्यारे मीडिया दरबार !बहुत बहुत प्यार !आपने ठीक कहा है खबर वही होती है जो “निगेटिव “होती है. उस बी बी सी की बात आप कर रहें हैं जिसके लिए “दादी के साथ बलात्कार “की खबर खबर होती है. लानत है ऐसी पत्रकारिता पर ।
    शरद यादव ने जो कहा है वह विशेषाधिकार हनन नहीं है ?
    शरद यादव ने पहले अन्ना अनशन पर बहस के दौरान अपने दुर्मुख से अन्ना जी के खिलाफ व्यक्तिगत बहुत कुछ कहा था, आन्दोलन की खिलाफत करते हुए और अब संसद के बाहर संसद के मूल भूत ढाँचे पर ही प्रहार कर रहें हैं ।
    गुजरात की एक वृद्ध महिला राज्यपाल को बूढी गाय और राष्ट्रपति को सफ़ेद हाथी कहना ,संसद के बुनियादी ढाँचे ,संविधानिक पदों पर सीधा प्रहार है .क्या संसद के बाहर शरद यादव जी का किया गया यह अनर्गल प्रलाप “विशेषा -धिकार हनन “और संसद की अवमानना का मामला नहीं है ?या सिर्फ वही मामले संसद की अवमानना और विशेषाधिकार के अंतर्गत आतें हैं जो राम लीला मैदान से जन संवाद ,जन आक्रोश बन मुखरित होते हैं ?
    क्या विशेषाधिकार उस रूमाल की तरह है जो सांसदों की जेब में पड़ा है और जिससे जब मर्जी नाक पौंछ करसांसद उसे दोबारा जेब में डाल लेतें हैं ?

    “उमर अब्दुल्ला उवाच :”
    माननीय उमर अब्दुल्लासाहब ने कहा है यदि जम्मू -कश्मीर लेह लद्दाख की उनकी सरकार विधान सभा में तमिल नाडू जैसा प्रस्ताव (राजिव के हत्यारों की सज़ा मुआफी ) अफज़ल गुरु की सजा मुआफी के बारे में पारित कर दे तो केंद्र सरकार का क्या रुख होगा ।
    जब इसके बाबत केंद्र सरकार के प्राधिकृत प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा गया जनाब टालू अंदाज़ में बोले ये उनकी वैयक्तिक राय है,मैं इस पर क्या कहूं ?
    बात साफ़ है राष्ट्री मुद्दों पर कोंग्रेस की कोई राय नहीं है ।
    और ज़नाब उमर अब्दुल्ला साहब ,न तो नाथू राम गोडसे आतंक वादी थे और न ही राजीव जी के हत्यारे .एक गांधी जी की पाकिस्तान नीति से खफा थे ,जबकि जातीय अस्मिता के संरक्षक राजीव जी के हत्यारे राजीव जी की श्री लंका के प्रति तमिल नीति से खफा थे .वह मूलतया अफज़ल गुरु की तरह आतंक वादी न थे जिसने सांसदों की ज़िन्दगी को ही खतरे में नहीं डाला था ,निहथ्थे लोगों पर यहाँ वहां बम बरसवाने की साजिश भी रच वाई थी .संसद को ही उड़ाने का जिसका मंसूबा था .ऐसे अफज़ल गुरु को आप बचाने की जुगत में हैं क्या हज़रात ?

  18. वाह, बहुत बढ़िया.. hamaari बीबीसी की रिपोर्टर जी ने बहुत ही मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है अपने साथियों का.. लेकिन उस से भी ज्यादा दर्दनाक है अन्ना के तथाकथित समर्थकों के कमेन्ट.. जरा ध्यान से पढ़ें… unhen ये रिपोर्टिंग करने वाली लड़कियां या तो झूठी और टाइम पास करने वाली लग रही हैं, या फिर सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाली रूपसियाँ.. जब इंटरनेट पर ही उनका ये हाल है तो सड़क पर या भीड़ में क्या होता होगा इसका अंदाजा आसानी से लग सकता है… क्या ये ही लाएंगे देश में बदलाव? फिर तो हम भ्रष्ट ही सही हैं.

  19. में ये समझ रहा हूँ की केवल इन महिला पत्रकार ने केवल एक छूते से पहलु जो की केवल नकारात्मक तरीके से लिया गया है – को कवर किया है …
    केवल नेगटिव छवि बनाने का प्रयास किया है … जैसे एक विराट सागर के किसी गंदे से कोने के बारें में लिखकर ..सारे सागर को ही गन्दा कह दिया | उसकी महानता उसके ढेर सारे पहलु को नाकारा कर …

    सेकड़ो आम जनता के समर्पण , उनके corruption के खिलाफ आक्रोश, उनके निस्वार्थ अनशन पर … वाहवाही नहीं दिखी .. मुझे लगता है .. ये मोहतरमा … किस लिए रामलीला मैदान में आई थी .. उसका अजेंडा या मोटिव ही ..इनको क्लेअर नहीं था …
    पत्रकारों या किसी भी प्रोफ़ेस्सिओनल से ऐसा अपेक्षित नहीं है

    और यह किसी पत्रकार का दृष्टिकोण नहीं लगता है ..
    आज कही ज्यादा सशक्त महिला पत्रकार इस मीडिया industry में है जिन्होंने कई रियल विकत परिस्थितयों में अविस्मरनीय कार्य किया है लेकिन कभी भी अपने proffesion पर ऊँगली नहीं उठाई

    इस तरह के वक्तव्य केवल भटकाने और नकारात्मक छवि बनाते है …सार्थक नहीं लगते

    एक आम नागरिक !!

  20. हर अनुभव अच्छा बुरा कुछ सीख देकर जाता है। हर पेशे के अपने मजे हैं। रिर्पोटिंग में हर समय राजनेता की तरह गाड़ी और स्वागत नही होता। अगर बुरा था तो ये कैसी रिर्पोटर है कि अपनी रिर्पोट में इन्होने अपने दर्द को पूरा और प्रत्यक्ष रूप में न सही लेकिन अप्रत्यक्ष रूप में, नही व्यक्त कर सकीं! मेरी जानकारी में तो कोयी रिर्पोटर ऐसा नही सुनने में आया कि उसने खराब हालात के चलते मीडिया लाइन ही छोड़ दी। एक अच्छे रिर्पोटर के लिए अच्छा और बुरा समय दोनों एक ही तरह की पाठशाला होती है। हां अगर आप पूर्वाग्रह न पाल ले कि हर जगह मलाई ही खाने को मिलेगी। इस तरह के मामले ही मीडिया की भूमिका और महत्व को परिभाषित करता है।

  21. अन्ना के आन्दोलन में कवरेज कारण आयीं महिला पत्रकारों की व्यथा बिलकुल ठीक है किन्तु इस बात से भोई नक्कारा नहीं जा सकता की ऐसे आन्दोलनों में सब तरह के लोग होते हैं और देखिये की आन्दोलन को सफल बनाने और समर्थन देने वाले तो थोड़े ही होते हैं बिग्स्द्ने वाले ज्यादा ! और ये कार्क्रम आयोजित करने वाले इसके लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं ! हमारे भारत में शीश गिनकर काम होते हैं सो आयोजकों को भी ऐसे लोगों को झेलना पड़ता है.हालाँकि यह बात अलग है की अगर ऐसा होता है तो गलत है .वैसे यह भी देखा जाना चाहिए की ऐसे आंदोलनों में आपकी ड्रेस कैसी है! आधी बीमारी तो कपड़ों के बनावट और कपडे की महीनता पर भी निर्भर करता है.

  22. पत्रकार के रूप में ये वो रूपसी बालाएं हैं जो गलती से गलत जगह पर अपना योगदान दे रही हैं. मैं निश्चित तौर पर यह दावे के साथ कह सकता हूँ की ये पत्रकार वो बालाएं हैं जो “विश्व सुंदरी का खिताब” जीत सकती हैं क्यूंकि वहाँ रामलीला मैदान में एक से एक खुबसूरत बालाएं उपस्थित थीं जिनको इस देश-दुनिया ने टेलीविजन पर देखा है. लेकिन उन बालाओं के साथ कोई भी आन्दोलनकारी कुछ भी अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया, कोई छेड़छाड़ नहीं हुयी और ना ही इस तरह की कोई शिकायत हुयी. यहाँ तक की जिस दिन अन्ना हजारे और उनकी टीम रामलीला मैदान से गयी उस समय भी वहाँ हजारों की संख्या में लोग जुटे हुए थे. फिर भी ऐसी कोई घटना नहीं देखने-सुनने को मिली. शायद इसलिए भी नहीं संज्ञान में आया की जो बालाएं आन्दोलन का हिस्सा थी वो इन पत्रकारों से ज्यादा खुबसूरत नहीं रही होंगी……..हा हा हा…..इसलिए इन पत्रकार-बालाओं को मैं ये सुझाव दूंगा की वो “विश्व सुंदरी” के आयोजन में भाग लें और निश्चित रूप से जीत उन्ही की होगी.

  23. आज मीडिया को सफलता का आसन माध्यम माना जाता है. लोगों को लगता है की टीवी journalist बन कर पूरे देश में एक चमकदार चेहरे के साथ brand name बना जा सकता है. कई इसके सफल उदाहरण भी हैं. अन्ना हजारे मामले को भी support देने और hit बनाने में मीडिया का बहुत बड़ा योगदान रहा. लोग (महिलाएं) अगर इस field में ये सोच कर आती हैं की उन्हें air -conditioned ऑफिस में चाय, काफ्फी, पिज्जा, burger और चिप्स के साथ सिर्फ key board से खेलना पड़ेगा और मीटिंग्स attend करनी पड़ेगी, उन्हें ही ये प्रोब्लेम्स हो सकती है, जिन्हें मीडिया रिपोर्टर का सही जॉब प्रोफाइल पता होगा उन्हें कभी इस तरह की स्थिति से परेशानी नहीं हो सकती, क्योंकि मीडिया रिपोर्टर्स को सिर्फ रेड कारपेट बिछे समारोह की ही coverage नहीं करनी होती है. उन्हें और भी मुश्किल हालत में अपना काम करना होता है. यहाँ तो सभी कुछ arrenged way में था. एक आध उद्हरानो को छोड़ कर सभी channels का coverage, (दिन-रात) male correspondents ही कर रहे थे.
    जिनका ये कहना है की वे अब आगे से ऐसे किसी इवेंट को कवर नहीं करेंगी, चाहे जॉब ही क्यों न चली जाये, उन्हें आगे से सचमुच ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि सिर्फ इसी coverage के बिना पर वे किसी बड़े चैनल में बड़े से पोस्ट पर जॉब पा लेंगी, जिसमे उन्हें साईट पर जा कर कवर नहीं करना पड़ेगा. तो है ना फायदे का सौदा? चैनल पर भी चमको और बाद में उससे बड़ी जॉब भी पा लो!

  24. Among four pillars of democracy, merely the media is the Watchdog of democracy. It is Watchdog (entire Media) who is entirely corrupt and it is the Watchdog (entire media) of India who is solely responsible for every kind of Corruptions in country. It is mandatory precondition that Corruption is possible only if the Media is corrupt and without it not a single corruption is possible in any democracy. Thus, it is the media, Print and electronic both who are the main accused for spread of corruption but it is shame for our democracy that those entirely corrupt media shamelessly have been left out and no one dares to speak anything against the corrupt. The judiciary, the vital & central pillar considered sentinel of democracy which firmly discards the news and news reports and the Courts had always disbelieved on all and every news and news report since, it has no any aunthacity and credibility in eyes of law or court till date with few exceptions. It is therefore, entire media had been given certificate of being corrupt and non credible and had lost faith and trust of Sentinel of democracy. However, illiterate and ignorant majority of India had madly followed the corrupt and dishonest media. And, Indian media taking the benefit of the same has produced the reality show of team Anna and delivered it thorugh idiot boxes (TV Channels) simply reminds the remake of film “Pipli Live”. And, thus, corrupt media by projecting dramatist (seasoned social activist) Anna and his likes as Saviour of country, who not only degraded the Indian democracy and parliamentary democracy by openly abusing the entire Politicans (Parliamentarians/ Legislatures) as corrupt, incompetent, lutera, Illiterate, Ganwar and so on and politics as dirtiest business. Thus, entirely corrupt media had committed brutal murder of democracy where all those true social cum political activist like Irom Sharmila, the iron lady of North East have been wholly ignored for almost 11 years. It had merely happened because the entirely corrupt media had ignored it. So, Indian democracy immediately calls for putting entire media behind the bar, since, the media are prima fecie found guilty and accused of being wholly corrupt which single handedly had caused corruption to take its firm root in India.

  25. लोग आज कल एक पत्रकार और संवाद दाता का फर्क नहीं कर पाते…इतना घालमेल हो गया हे..की पूछो मत..डायरी हाथ में ली और बन गए संवाद दाता..ना भाषा का पता ना शब्दों के इस्तेमाल का ज्ञान..जो देखा नमक मिर्च लगा के छाप दिया.इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इसे बल दिया हे फैक्ट्री में बनाए गए पत्रकार सड़क पर आ गए हे ..ऐसा तो होगा ही.पत्रकार को भाषा का साहित्य का समकालीन सम्माज के तौर तरीकों का ज्ञान होना आवश्यक होना चाहिए..जो कोई बोले वो ही लिख देना एक पत्रकार का काम नहीं हे. क्या छापना चाहिए यह देखना भी उनका काम हे.सअब्वाद संयमित होना सम्माज के हित में होता हे….साहित्य ही समाज का दर्पण हे..इतना नहीं..साहित्य की जिम्मेदारी हे की वो लिखा जाए जो समाज के हित में हे….सुभाष नीरद, मुज़फ्फरनगर, uttarpredesh…lekin इतना कहूँगा की उच्च्रंखता के लिए अन्ना मण्डली जिम्मेदार he

  26. आ૫ को ગળેશ चતુર્થી की હાर्दीक शुभकाँमनाए !
    हमारे देश में परिवर्तन की लहर चल रही हे …. लेकिन इसका अंजाम क्या होगा कोई नहीं जनता …
    ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंख में भर लो पानी…
    जो शहिद हुए है उनकी जरा याद करो कुर्बानी….
    जनता को कुर्बानी का बकरा बना दिया गया है….
    अन्ना को अन्ना नहीं लोगो ने गाँधी है कहा क्या उचित है ? क्या गाँधी बिना देश की कल्पना व्यर्थ है ?
    अन्ना का आन्दोलन में बड़ी कमी थी , इसकी भीड़ को पता ही नहीं था की अन्ना आखिर क्या मांग रहे है , ख़ैर हमरी पत्रकार साथी घटना की में कड़ी भर्त्सना करता हु ……
    हरि ॐ जी स्वागत है…..धन्यवाद

  27. मधुलिका जी !
    आप को जो भी कटु अनुभव इस अन्ना के अन्दोलन में कवरेज के दौरान हुए हैं ! वे तो बहुत और भी जगहों पर भी हो सकते हैं क्या १००%युवा शालीन हैं ? …..
    इस तरह के आयोजनों में जहाँ अच्छे कार्यकर्ता / समर्थक होते है वही पर कुछ आवारा किसम के लोग भी होते हैं , जिनका काम शराब पीना और पीकर महिलाओ से बत्तमीजी, चोरी करना ,जेबें काटना एवं drugs बेचना !

    ऐसे असामाजिक तत्वों से इससे जयादा हम उम्मीद भी नहीं कर सकते, ऐसी घटना ना हो इनसब बातो की जिमेदारी पुलिस/ प्रशाशन एवं आयोजन कर्ताओ पर होती है !

    भविष्य में आपके साथ दुर्व्यवाहर ना हो इसी कामना के साथ …….

    नरेश कुमार शर्मा “मुख्या संपादक ”
    खुली-बात हिंदी समाचार पत्र

  28. ramlila maidan par mahaj 50 hazahar aandolankariyon ki bhir ko 24 hr ke natkiye propeganda khabron ke bute 120 crore logo ke des par trp ka aapna agenda thop diya.corruption ke khilap lokpriya samartan ki pitth par sawar hokar des ke corporate media ne sabit kar diya ki vo tv darshko ya pathko ke bal par hazaroo logo ko sarak par uttar hi nahi sakte balki des ki puri rajniti ko apne news rooms me badhak banakar bhi rakh sakte hai.

  29. I am agree with Jia Sharma.Ye to Indian Crowd he.Yahan Rally,Dharna …me eisa commen he.Bhartiya bheed tantra kuch eisa hi he. Isko Anna ke andolan se nahi add kiya jana chahiye.

  30. मधुलिका जी ! आप को जो भी कडुए अनुभव इस अन्ना के अन्दोलन में कवरेज के दौरान हुए हैं ! वे तो बहुत और भी जगहों पर भी हो सकते हैं क्या १००%युवा शालीन हैं ? …..नहीं ! यदि १०% युवा शालीन /समझदार हो जायेगा !तो महिलाओं को कोई समस्या ही नहीं रहे गी ! आप को मौका लगे तो किसी ‘युवक कांग्रेस ‘की रैली का कवरेज जरुर करना फिर वहाँ के अनुभव बताना कैसा रहा ………..!

  31. सही खबर है चौरसिया जी.. मैंने इसे बीबीसी हिन्दी में भी पढ़ा था। उसकी महिला रिपोर्टर भी परेशान हुई थी अन्ना क्रांति के लफ्फुओं से.. शायद आप उन तेरह दिनों तक सड़क पर नहीं निकले थे.. सड़क पर झंडा हाथ में लेकर एक मोटरसाइकिल पर तीन-चार आवारा लड़के लोगों की मां बहनों के पास से कैसे चीखते चिल्लाते गुजरते ते आपने नहीं महसूस किया शायद.. आप उन्हें रोक दें तो भ्रष्टाचारी हो गए.. पुलिस के पास शिकायत कीजीए तो जवाब मिलता था, क्या करें उपर से ऑर्डर है, कुछ नहीं करने का.. अब समझ में आ रहा है, सब कांग्रेस की मिलीभगत का नतीजा था..

  32. मुझे नहीं लगता के ऐसे आन्दोलन की कवरेज लेने महिलाओं को भेजना चाहिए, यह प्रथम गलती न्यूज़ agency की है के उन्होंने भेजा

    1. में आपकी बात से सहमत नहीं हूँ. पत्रकार तो अपना काम करने वहां गई थी.उनके साथ हुआ दुर्व्यवहार संविधान के चौथे स्तम्भ पर प्रहार हे तथा उसके लिए मीडिया प्रबंधन जिन्होंने टी आर पी के लिए इस बे सर पैर के आन्दोलन को इतना वजन दिया और अन्ना मण्डली जिसकी नेतिक जिम्मेदारी इसको देखने की थी उन पर होनी चाहिए.अगर केजरीवाल,कीरों बेदी,और बाप बेटे का कोई घर का सदस्य उस भीड़ में इस हालत से दो चार होता तो उनसे पूछते.आन्दोलन karna जितना आसन हे प्रबंध उतना ही कठिन..अब देश के वो लोग इसे देखें जो भावना में बहे जा रहे..थे.सुभाष नीरद,मुज़फ्फरनगर,उत्तर प्रदेश.

    2. Jia ji mai bhi aap se shmat nahi hu,, ham apna kam karenge hi ,,, sja to galti karne walo ko milni chahiye,,,, kam karne walo ko kyu???

  33. जितने मनुष्य उतनी शख्सियत, उतने चेहरे। सबका रहन-सहन अलग, नजरिया अलग, पहचान अलग। रोज ना जाने कितनी शख्सियत आंखों के आगे से गुजर जाती हैं। हर दिन हमें तरह-तरह के लोग रास्ते में टकराते हैं। जितने तरह के लोग उतने ही तरह के व्यक्तित्व। सभी की अपनी एक अलग पहचान, अपना एक अलग सोचने का ढंग और साथ ही अपनी-अपनी खूबियां और खामियां।

  34. स्मृति ,शिप्रा, मधुलिका या सरोज कोई हों निस्संदेह वर्तमान समय में उच्छृंखल लोग हर जगह मिल जाते हैं और अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी औकात पर आ जाते हैं | उन्हें किसी आंदोलन से कुछ लेना देना नहीं होता है |वे आंदोलन का इंज्वाय करने जाते हैं इससे आंदोलन भी बदनाम होता है, और आंदोलन में शामिल सभी वर्ग के लोगों की बदनामी होती है |केवल महिला पत्रकार ही नहीं पुरुष पत्रकार भी इनके दुर्व्यवहार के शिकार हो जाते हैं | निश्चय ही पत्रकारिता का काम चुनौतियों एवं जोखिम से भरा होता है |टीनएजर्स को अपनी सोच बदलनी होगी इसके लिए टीन एजर्स ही सक्षम हैं बशर्ते वह देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझें |

    1. जब गाँधी जी आन्दोलन करते थे तो उनके आन्दोलन में kabhi भी कोई अपिर्य घटना नहीं होती थी…….और कुछ अंग्रेजो का कहना था की वे ऐसी सख्सियत थे जिनके मात्र उपस्थिति भर से लोगो के दुर्विचार दूर हो जाते थे………………एक बार जब गाँधी जी ने साउथ अफ्रीका में आन्दोलन किया था तब उनके साथ यात्रा में २००० लोग थे और बराबर की मात्रा में स्त्री और पुरुषो की संख्या थी………….और अंग्रेजो ने आस्चर्या जताया था की किसी ने कुछ गलत करने की या फिर कामवासना भी उनके मन में नहीं आई……..ऐसे थे हमारे गांधीजी ………नाकि अन्ना हजारे जिनकी उपस्थिति में ऐसा हुआ…………….जब रामदेव बाबा का आन्दोलन था तब ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी क्योंकि वहां का वातावरण सुध्ध था और लोगो में केवल देश के लिए उत्साह था………………………चलो कोई भी हो ये आग जलती रहनी चाहिए…….और तब तक बुझनी नहीं चाहिए जब तक ये देश इंडिया से भारत न बन जाये……………………जय हिंद वन्देमातरम…..

  35. मेने भी अपना सार्वजनिक जीबन एक पत्रकार के रूप में शुरू किया बड़े मीडिया चेनल आम आदमी की बातो को प्रकाशित नहीं करते इसी लिय हमने अभी छोटे छोटे अखबारों को जोड़ने का काम भी शुरू किया है अंपनी टी आर पी बढाने हेतु एक ही समाचार को बड़ा चदा कर पेश करते है यही हमे पिपली लाइफ फिल्म में दिखया गया है जिस अन्ना जी को हमारे मीडिया ने ७४ साल की उम्र में दुनिया के सामने दुसरे गाँधी के रूप में प्रस्तुत किया जबकि एसे बहुतलोग है जिन्होंने पूरा पूरा जीबन ही देश सेवा में लागा दिया लेकिन उनका कोई इतिहाश ही नहीं बनता जेसे दिनेश यादव जिसने अपनी जान तक गंबा दी लेकिन किसी ने उसके योग दान को प्रमाणित करने की हिम्मत नहीं की एक सरकारी अधिकारी ने तीन साल तक आन्ना के साथ कामकिया बह मेरे मित्र है मुझे एक मीटिंग मिले में नाम नहीं बताऊंगा बह कह रहे थे हम आन्ना जी को फस ना चाहे फसा सकते है सरकार ने जिस काम को उन्हें पैसा दिया बह उन्हने नहीं किया बार बार फंड ट्रांसफर किया गया पैसा दुसरे काम में खर्च किया गया कहने का मतलब हे मीडिया ने आन्ना को जिस प्रकाश दूसरा गाँधी बना दिया बह जब चाहे किसी को आस मान पर बेडा दे या जब चाहे मिटटी में मिला दे यह उसका अपना छुपा हुआ अजेंडा है आज आम जनता को छोटे छोटे अखबारों की खबर पर बिसबास करना चाहिय जय विकसितभारत

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