झुंझुनू में अपनों की बगावत में उलझी कांग्रेस..

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-रमेश सर्राफ धमोरा||

झुंझुनू, राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डा.चन्द्रभान को पार्टी द्वारा झुंझुनू जिले के मंडावा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ाने की घोषणा के बाद झुंझुनू जिले की राजनीति में यकायक गर्मी आ गयी है. डा. चन्द्रभान को मंडावा से प्रत्याशी बनाने के लिये कांग्रेस को अपनी ही पार्टी की मौजूदा विधायक रीटा चौधरी का टिकट काटना पड़ा. अपनी टिकट कटने से नाराज रीटा चौधरी ने कांग्रेस से बगावत करने की घोषणा के साथ ही निर्दलिय चुनाव लडऩे की घोषणा कर कांग्रेस प्रत्यासी डा. चन्द्रभान कह राह में कांटे बिछा दिये हैं.RITA

हालांकि रीटा चौधरी ने पिछला विधानसभा चुनाव मात्र 504 मतों से ही जीता था मगर उसके बाद उन्होने क्षेत्र में कई विकास कार्य करवाकर क्षेत्र के मतदाताओं में अपनी गहरी पैंठ कायम की हैं. रीटा चौधरी के पिता स्व.रामनारायण चौधरी मंडावा से कांग्रेस के सात बार विधायक, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधानसभा में विपक्ष के नेता व राजस्थान सरकार में वर्षो मंत्री रह चुके थे. उन्होने अपने जीते जी ही रीटा को अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी घोषित कर विधायक दिया था.

झुंझुनू जिले की राजनीति में रामनारायण चौधरी व सांसद शीशराम ओला में हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा था. जिले में 2008 में पहली बार विधायक बने चिकित्सा राज्य मंत्री डा. राजकुमार शर्मा व रीटा चौधरी केन्द्रीय मंत्री शीशराम ओला को चुनौति दे रहे थे इस कारण ओला उनका टिकट कटवाना चाहते थे. वैसे भी झुंझुनू जिले की कांग्रेस टिकटो के वितरण में ओला की पूरी चली है. उन्होने झुंझुनू, मंडावा, उदयपुरवाटी, नवलगढ़, फतेहपुर की टिकट अपने समर्थकों को दिलवा कर यह दिखा दिया की झुंझुनू में आज भी वही सबसे बड़े नेता हैं. बाकी रही पिलानी सीट से भी उन्ही कं समर्थक को टिकट मिलने की चर्चा है.

ओला ने पहले नवलगढ़ से डा. राजकुमार शर्मा का टिकट कटवाकर अपनी समर्थक प्रतिभा सिंह को दिलवाया और अब डा. चन्द्रभान की आड में रीटा चौधरी का. चूंकि डा. चन्द्रभान भी लम्बे समय से मंडावा आना चाहते थे ,ऐसे में ओला के समर्थन से उनका मकसद कामयाब हो गया. जनचर्चा है कि कांग्रेस आलाकमान को केन्द्रीय मंत्री ओला ने डा. चन्द्रभान को जिताने की लिखित गारंटी दी तब जाकर उन्हे टिकट क्लीयर हो पाया है. डा. चन्द्रभान 1990 में जनता दल के टिकअ पर मंडावा से विजयी हुये थे मगर 1993 में उन्होने मंडावा छोड़ कर नवलगढ़ से चुनाव लड़ा था जहां वो हार गये थे. उसके बाद उन्होने झुंझुनू जिले को छोड़ दिया था.उन्हें खुद व अपने बेटे के अलावा कुछ नहीं दिखता. वे चाहते हैं कि जिले के सर्वेसर्वा वे ही रहें. यही कारण है कि सुमित्रासिंह ने पार्टी छोड़ी, भंवरसिंह ने पार्टी छोड़ी और युवा नेतृत्व डॉ. राजकुमार शर्मा और खुद रीटा चौधरी की टिकट कटवा दी.चौधरी की मानें तो शीशराम ओला ने कांग्रेस के साथ धोखा करते हुए भाजपा से समझौता किया है कि जिले की सात विधानसभा सीटों में से तीन सीटें भाजपा की जितवा देंगे. बशर्ते उनके मुताबिक टिकटों का वितरण हो.

रीटा चौधरी ने सवाल दागा कि 1990 में जनता दल की टिकट से मंडावा की जनता ने उन्हें जीताकर विधानसभा में भेजा था. लेकिन उसके बाद वे मंडावा तो छोड़ों झुंझुनू जिले की भी सुध नहीं ली. मंडावा से जीतकर उन्होने क्षेत्र के विकास के लिये क्या काम करवाये वो तो बताये. अब जब अपने अस्तित्व की लड़ाई आई तो खुद के साथ मेरा राजनैतिक जीवन बिगाडऩे के लिए मंडावा आ गए. रीटा ने कहा कि उनके पिता का देहान्त हुए एकसाल ही हुआ है और उनको कांग्रेस ने अनाथ महसूस करवा दिया है. उनके पिता ने हमेशा कांग्रेस का ही साथ दिया और इंदिरा परिवार के साथ आजीवन रहे. उन्होने कांग्रेस की विचारधारा का पालन किया. उस व्यक्ति के परिवार के साथ अन्याय हुआ है. जिससे क्षेत्र की जनता आगामी चुनावो में उसका करारा जवाब देगी.

कांग्रेस के डॉ.चंद्रभान प्रदेश अध्यक्ष है. वे जिस इलाके मंडावा से चुनाव लडऩे जा रहे हैं उसकी दोनों ब्लॉक कमेटियों ने ही डॉ.चंद्रभान से किनारा कर लिया है और साफ-साफ शब्दों में कहा है कि वे मंडावा विधायक रीटा चौधरी के साथ रहेंगे.

रविवार को मंडावा व अलसीसर ब्लॉक कांग्रेस कमेटी की बैठक विद्यार्थी भवन में आयोजित की गई. बैठक में विधानसभा चुनाव में बिना क्षेत्रीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सूचित किए और बगैर सहमति के डॉ. चंद्रभान को कांग्रेस प्रत्याशी बनाए जाने की निंदा की गई. बैठक में चर्चा की गईकि रीटा चौधरी को प्रत्याशी बनाए जाने की मांग की गईथी, लेकिन उसे दरकिनार कर डॉ.चंद्रभान को चुनाव मैदान में उतारा है. इसलिए दोनों ही ब्लाक कांग्रेस कमेटियों ने रीटा चौधरी का साथ देने का निर्णय लिया. इस मौके पर ओमप्रकाश कैरू, बनवारीलाल, सलीम सिगड़ी, जगदीश पूनियां, हरिराम, विमला खीचड़ सहित अन्य कार्यकर्ता मौजूद थे.

मंडावा विधानसभा क्षेत्र के युवा कांग्रेस अध्यक्ष नरेशकुमार बुडानिया, महासचिव मनोज सुंडा तथा शशिकुमार आदि ने भी प्रेस बयान जारी कर कहा है कि युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता विधायक रीटा चौधरी के साथ हैं. यहां के कार्यकर्ताओं का मान सम्मान व कार्य हमेशा से रीटा चौधरी ने किए है. प्रदेश अध्यक्ष डॉ. चंद्रभान ने कभी किसी कार्यकर्ता के कोई कार्य नहीं किए हैं. जन भावना को देखते हुए समस्त यूथ कांग्रेस कार्यकर्ता व पदाधिकारी चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी रीटा चौधरी का समर्थन करेंगे.

हांलाकि राजनीति में डा. चन्द्रभान के कभी शीशराम ओला से तालमेल नहीं रहा मगर ओला द्वारा अपनी गारंटी पर चन्द्रभान को टिकट दिलाना कई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म देता है. लोगो में चर्चा है कि ओला अपना पुराना दाव खेल कर जिस तरह पिछली बार सुमित्रा सिंह का पत्ता साफ किया, कहीं उसी तरह से इस बार एकसाथ डा. चन्द्रभान व रीटा चौधरी का भी पत्ता काट कर अपने सभी पुराने हिसाब एक चुकता कर लें.

चुनाव परिणाम तो भविष्य के गर्भ में छुपे हैं मगर झुंझुनू जिले में कांग्रेस ने खुद ही इतने कांटे बो दिये लगते हैं कि आने वाला समय कांग्रेस के लिये मुश्किलों भरा ही लगता हैं. कांग्रेस के अपने ही बागी डा.राजकुमार शर्मा,रीटा चौधरी,वित्त आयोग के सदस्य जे.पी.चन्देलिया अन्तत: कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचायेंगें.

कांग्रेस की सूची में  राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डा.चन्द्रभान का नाम मंडावा से आने के बाद क्षेत्रीय विधायक रीटा चौधरी ने कहा है कि वे निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ेगी. यह जनता की मांग है. जिसे वे टाल नहीं सकती. उन्होंने डॉ.चंद्रभान और सांसद शीशराम ओला  पर निशाना साधते हुए उन्होने कहा कि शीशराम ओला जिले में कांग्रेस का बंटाधार कराने में लगे हुए हैं. जैसे हालात हैं, उनसे तो वे पूरे जिले में कांग्रेस को डूबो देंगे. उन्होंने कहा कि डॉ. चंद्रभान को ओला ने मुख्यमंत्री बन जाने का ख्वाब दिखाया है. बकौल रीटा चौधरी शीशराम ओला ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाम डॉ.चंद्रभान को चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री का दावेदार बन जाने का ख्वाब दिखाया है. जिसके बाद डॉ.चंद्रभान मंडावा में चुनाव लडऩे के लिए आ गए.

रीटा चौधरी से उनकी टिकट काटे जाने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें कोई कारण दिखाई नहीं देता कि उनकी टिकट क्यों काटी गई है?  उन्होंने कहा कि राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डा.चन्द्रभान ने जब चुनाव लडऩे का मन बना ही चुके थे तो उन्हें रोकने वाला भी कौन था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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