चुनावी रैलियों में जागरूक जनता की अपेक्षाएं…

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-कन्हैया झा||

2014 के लोकसभा चुनाव के लिए सभी राजनैतिक दलों द्वारा अपने अपने स्तर पर तैयारियां जोरो पर चल रही है. राजनैतिक दल अपने अनुभवों, विचारों तथा जनता की हित के लिए घोषणा पत्र तैयार करती हैं. दलों  में विभिन्न संप्रदाय, वर्ग, समूह, जाति, व्यवसाय से लोग शामिल होते हैं, इसलिए जनता की क्या अपेक्षायें है, वे उसे कितना जानते हैं. आज देश की जनता के सामने महंगाई तथा भ्रष्टाचार मुद्दों के साथ साथ नवयुवकों के लिए रोज़गार, कामक़ाज़ी महिलाएं शासन से सुरक्षा की अपेक्षा रखती हैं. अगले वर्ष मई 2014 में होने वाले चुनावों के लिए जनता देश की प्रमुख राजनैतिक दलों को उपरोक्त मुद्दों पर परख कर ही शासन करने के लिए बहुमत देना चाहेगी. प्रमुख दोनों दलों ने प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार घोषित या अघोषित रूप से लगभग तय कर लिए हैं. सम्पूर्ण चुनाव इन्हीं नेताओं के इर्द गिर्द घूमता दिखेगा.public

जनता की पहली जरूरत भोजन है जिसके लिए जरूरी है कि खाद्यान वस्तुओं के दाम न बढें. इसके मुख्य कारणों में से कृषि क्षेत्र की धीमी विकास गति तथा उसका मानसून पर निर्भर होना है. नब्बे के दशक के सुधारों का इस क्षेत्र को कोई लाभ नहीं मिला. गेहूं तथा चावल की पिछले दो दशकों की विकास दर तो पह्ले के दशकों से भी कम है. जब देश में प्रतिष्ठित शोध संस्थान ICAR  उपलब्ध है तो कृषि क्षेत्र के तकनीकी सुधारों अर्थात उन्नत बीजों की उपलब्धि आदि को बाज़ार के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए. भारत बड़ी मात्रा में दालों का आयात करता है, क्योंकि बेहतर बीज न मिलने से उत्पादन पिछले कई दशकों से स्थिर है. रूपए के गिरने से भी खाद्यानों के दामों में तेज़ी आती है. सिंचाई परियोजनाओं को बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है. सूखे से बचने के लिए भू-जल के अंधा-धुंध दोहन को उचित क़ानून तथा उसके सख्ती से लागू करा जाना चाहिए.

खाद्य मंत्रालय द्वारा कुछ वर्ष पहले किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार देश के 40 प्रतिशत किसान  खेती को फायदे का सौदा नहीं मानते. परन्तु खाद्यान बाज़ारों में  जमाखोरी, सट्टाबाजारी, निर्यात आदि अनेक प्रकार की उठा-पटक से लोग-बाग़ खूब पैसा बना रहे हैं. सट्टाबाजारी में बड़े विदेशी धन का भी निवेश तेज़ी से बढ़ रहा है. अधिकाँश में तो छोटी जोत के किसान, जिनकी संख्या बहुत ज्यादा है, फसल की “विपत्ति बेच” अर्थात distress selling  करते हैं.

राजा के लिए दंड की महिमा का वर्णन महाभारत में आता है. आधुनिक सन्दर्भ में भी यदि शासन ने दंड को मजबूती से नहीं पकड़ा तो भ्रष्टाचार फैलेगा. इस सन्दर्भ में विकेंद्रीकरण बहुत जरूरी है अर्थात ऊपर का स्तर नीचे के स्तरों के कार्यों की निगरानी करे. परन्तु पिछले दो दशकों में ऊपर के स्तर पर काम बढ़ा है. देश की विकास योजनाओं में केंद्र का प्रभुत्व अब कहीं अधिक है. केंद्र शासित प्रदेशों तथा राज्यों को बजट सहायता का “प्लान” भाग पिछले दो दशकों में 46 प्रतिशत से कम होकर केवल 21 प्रतिशत रह गया है. केंद्र तथा राज्यों के बीच राष्ट्रीय विकास परिषद् में यह एक खिंचाव का विषय बन गया है. नब्बे के दशक के शुरू में 73 तथा 74 वें संशोधनों से कानूनी तौर पर विकेंद्रीकरण के लिए रास्ता साफ़ किया गया था, परन्तु इस दिशा में केंद्र तथा राज्य स्तर पर दो दशकों की प्रगति लगभग नगण्य है.

विश्व बैंक आदि वैश्विक संस्थायें विकासशील देशों पर उनके बाज़ारों को मुक्त करने के लिए दबाव डालती रहती हैं. ढाई लाख से ऊपर पंचायतों तथा चार हज़ार नगरपालिकाओं को सत्ता में भागीदार बनाकर देश वैश्विक दबाव को झेलने में समर्थ बनेगा. साथ ही भ्रष्टाचार रोकने के लिए मजबूती से दंड का उपयोग कर सकेगा.

देश की आधी जनता आज भी कृषि पर निर्भर है अर्थात देश के 50 प्रतिशत नवयुवक ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं. इस कृषि आधारित जनता का जीडीपी में योगदान 15 प्रतिशत से भी कम है अर्थात इन नवयुकों की पारिवारिक आय बाकी देश के मुकाबले लगभग 20 प्रतिशत है. इस कारण से शैक्षिक तथा कौशल योग्यताओं से भी ये नवयुवक वंचित रहते हैं. देश के अधिकाँश गाँवों में बिजली की व्यवस्था भी अभी उद्योग धंधों के विकास के हिसाब से ठीक नहीं है. इसलिए निजी क्षेत्र तथा बैंक भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश अथवा लोन देने के प्रति उत्साहित नहीं होते. इस क्षेत्र के सशक्तिकरण की बहुत आवश्यकता है जिसके लिए निवेश चाहिए. मनरेगा जैसी लगभग 1 लाख करोड़ रूपए की योजना रोज़गार दे रही है, परन्तु निवेश नहीं.

लाइसेंस राज ख़त्म होने से अर्थ व्यवस्था में पिछले दो दशकों में अधिकाँश निवेश निजी क्षेत्र से आया है, जो आज कुल निवेश का 73 प्रतिशत है. परंतू यह निवेश उन्होनें “पूंजी सघन” अर्थात capital intensive क्षेत्रों में किया है. इसलिए इस विकास को “बिना रोज़गार” का विकास अर्थात jobless growth कहा गया है. यही कारण है कि आज शहरों में भी तकनीकी एवं प्रबंधन पढ़े हुए बेरोजगारों की संख्या भी बहुत अधिक है.

आवश्यकता उपरोक्त दोनों क्षेत्रों की विशेषताओं को जोड़कर कुछ करने की है. ग्रामीण क्षेत्र में भूमि है    तथा कच्चे माल के रूप में खाद्यान हैं, जबकि शहरों में कौशल है. विकेंद्रीकरण से पंचायतों के रूप में प्रशासन भी उपलब्ध कराया जा सकता है, जिसे जिला स्तर पर कमिश्नर के आधीन कर राज्य सरकारें विकास योजनाओं का, जहाँ भी संभव हो, गठन कर सकती हैं.

इस मुद्दे का एक पहलू दुर्घटना के दौरान पुलिस की कार्यवाही है, जिसमें जन-आक्रोश को सूझ-बूझ से संभालना भी शामिल है. दूसरा पहलू न्यायालय द्वारा शीघ्र-अतिशीघ्र अपराध तय करना और अपराधी को कठोर दंड देने से जुड़ा है. उपरोक्त दोनों विषयों पर उचित सूधार की आवश्यकता काफी समय से महसूस की जा रही है. अपराध की अमानवीयता के कारण सरकार के शीर्ष नेताओं द्वारा जनता को आश्वासित करना अत्यंत आवश्यक है. वेदों में तो यहाँ तक कहा है कि राजा के लिए महिलाओं की सुरक्षा देश की सुरक्षा से भी ज्यादा जरूरी है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. जनता की अपेक्षाओं पर कब कौन खरा उतरा है, सब अपना या अपने लोगों के हित साधने व अपने पैसे बनाने में लग जाते हैं. आचार्य होता है कि पक्ष प्रतिपक्ष के सब नेताओं कि धनसम्पत्ति पांच साल में दुगनी या उससे ज्यादा हो जाती है, पर आम आदमी कि जमा पूंजी भी ख़तम होती जा रही है.इन पर महंगाई का कोई असर नहीं होता. आखिर ऐसा कौनसा मंत्र इन्हें हाथ लग जाता है कि लाखों की पूंजी करोड़ों में पहुँच जाती है अब भला इन्हें जनता की क्या जरूरत क्यों किसी की अपेक्षाओं को पूरा करे क्यों उनकी और देखें.

  2. जनता की अपेक्षाओं पर कब कौन खरा उतरा है, सब अपना या अपने लोगों के हित साधने व अपने पैसे बनाने में लग जाते हैं. आचार्य होता है कि पक्ष प्रतिपक्ष के सब नेताओं कि धनसम्पत्ति पांच साल में दुगनी या उससे ज्यादा हो जाती है, पर आम आदमी कि जमा पूंजी भी ख़तम होती जा रही है.इन पर महंगाई का कोई असर नहीं होता. आखिर ऐसा कौनसा मंत्र इन्हें हाथ लग जाता है कि लाखों की पूंजी करोड़ों में पहुँच जाती है अब भला इन्हें जनता की क्या जरूरत क्यों किसी की अपेक्षाओं को पूरा करे क्यों उनकी और देखें.

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