कथाकार विजयदान देथा AKA बिज्जी की मृत्यु पर फैला शोक…

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राजस्थानी के प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा, जो साहित्य जगत में ‘बिज्जी’ के नाम से लोकप्रिय रहे थे, के  देहावसान ने सभी साहित्य प्रेमियों के बीच शोक लहर प्रवाहित कर दी.. आज फेसबुक पर ‘बिज्जी’ का रंग चढ़ा है.. प्रस्तुत हैं फेसबुक पर ‘बिज्जी’ को कुछ साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों के श्रद्धा सुमन….

प्रसिद्ध साहित्यकार नन्द भारद्वाज ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि:

बडे़ दुख की खबर है कि राजस्‍थानी के मूर्धन्‍य कथाकार विजय दान देथा हमारे बीच नहीं रहे। अपने आत्‍मीय जनों और पाठकों के बीच ‘बिज्‍जी’ के नाम से विख्‍यात विजयदान देथा ऐसे अनूठे क‍थाकार रहे हैं, जिन्‍होंने राजस्‍थानी की पारंपरिक लोक-कथाओं को लिखित रूप देते हुए जहां ‘बातां री फुलवाड़ी’ के 14 खंडों में प्रस्‍तुत किया, वहीं अपनी मौलिक राजस्‍थानी कहानियों और अन्‍य कृतियों के माध्‍यम से साहित्‍य-जगत में अपनी विशिष्‍ट पहचान भी बनाई। वे जीवन-पर्यन्‍त राजस्‍थानी भाषा के विकास और उसकी संवैधानिक मान्‍यता के लिए प्रयत्‍नशील रहे, पर वह सपना आज भी अधूरा है। बिज्‍जी के निधन से निश्‍चय ही एक अपूरणीय क्षति है, जिसे किसी तरह पूरा नहीं किया जा सकता। उन्‍हें विनम्र श्रद्धांजलि।bijji

तो कवि कृष्ण कल्पित  ने ‘बिज्जी’ की याद को कुछ इस तरह अपनी वाल पर उकेरा है:

भारतीय कथाकाश का सर्वाधिक जगमग सितारा
कल रात टूट गया, पार्थ !

बिज्जी जिनका नाम था
बोरुन्दा था गाँव
जब तक थे ऐसे रहे
ज्यों पीपल की छांव

काल कुचलकर चल दिया
बातों की फुलवारी
कौन लिखेगा कौन सुनेगा
बाताँ थारी-म्हारी

विजयदान चित-चोर था
चरणदास था चोर
ज्ञान-क़िले में सेंध थी
टूट गयी पर डोर !

अलविदा बिज्जी-१(१५२)//कृक//

‘एक शराबी’ जब छपी
ग्यारह सौ के नोट
बिज्जी का ईनाम था
ज्यों सर्दी में कोट !……………..’एक शराबी : एक शराबी की सूक्तियां’.

तो प्रसिद्ध साहित्यकार मोहन श्रोत्रिय ने बिज्जी को कुछ इस तरह अपनी श्रद्धांजलि दी है..

लगता है साहित्य, संगीत, कला से जुड़े बड़े लोग मौत के निशाने पर हैं.

बिज्जी का लोक-कथा-संचयन के ज़रिये, और फिर मौलिक कथा-लेखन के ज़रिये जो अवदान है वह अविस्मरणीय है.

उनका उठ जाना बहुत बड़ी क्षति है. कुछ जगहें जो खाली हो जाती हैं, कभी नहीं भरी जा सकती. श्रद्धांजलि !

इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर दिलीप सी मंडल अपनी वाल पर विजयदान देथा को अपनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं..

रवींद्र नाथ टैगोर के बाद बिज्जी ही भारतीय उपमहाद्वीप के एकमात्र ऐसे लेखक रहे, जिनका नाम 2011 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामित हुआ था. हालांकि वे इस सम्मान से एक कदम दूर रह गए.

चर्चित कथाकार राजेंद्र यादव विजय दान देथा यानी बिज्जी के बारे में कहते थे, ‘‘बिज्जी जैसा कोई दूसरा नहीं.’’

बिज्जी अब नहीं रहे.
साहित्यकार अतुल कनक ने अपनी वाल पर कुछ इस तरह नमन किया है..

मेरा पहला राजस्थानी उपन्यास जूण जातरा पढ़कर उन्होंने मुझे फोन किया और कहा कि छोरे यदि तू ऐसा ही लिखता रहे तो मेरे हिस्से की भी उमर ले ले। मेनें कहा था -दाई सा , हम तो ये दुआ करते हैं कि हमारे हिस्से की उमर भी आपको लगे। उन्होंने बीच में ही बात काट कर कहा था कि ये तो बात कहने के ढंग हैं रे, वरना कौन किसी की उमर लेता देता है। आज जब बिज्जी (विजयदान देथा) के महाप्रयाण का समाचार मिला तो यही सोच कर संताप है कि क्या सचमुच मैं अपने हिस्से की उमर का एक अंश भी उन्हें नहीं दे सकता था?
बिज्जी की स्मृतियों को नमन…….

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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